Diwali 2018: आखिर क्यों कहा जाता है दिवाली की रात को तंत्रशास्त्र की महारात्रि

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दिवाली का दिन वैसे तो सुख-समृद्धि के त्योहार के रूप में देखा जाता है लेकिन इस दिन का तांत्रिकों के लिए भी खास महत्व है. अमावस्या की इस रात को कालरात्रि, महानिशा, दिव्यरजनी और महाकृष्णा भी कहा गया है और तांत्रिक और अघोरी शक्तियां इस रात में शक्तियों को सिद्ध करते हैं. तंत्रशास्त्रों में भी इसका जिक्र मिलता है कि कुछ खास दिनों में की गई तंत्रिक साधना विशेष फल देती हैं, इनमें दशहरा, नवरात्रि और दिवाली हैं. दीपावली की रात इन सबसे खास शक्तिशाली मानी जाती है और इसे तंत्रशास्त्र की महारात्रि कहा जाता है.

इस रोज जब सूर्य अस्त हो चुका हो और चंद्रमा भी अमावस्या के कारण निस्तेज हो जाए, उसी वक्त तंत्रविद्या के जानकार शक्तिअर्जन का काम शुरू करते हैं. दिवाली पर तांत्रिक अनुष्ठान की कई बातें ऐसी हैं, जिस बारे में आम लोगों को नहीं के बराबर जानकारी होती है.

साल 1885 में छपी बज़्म-ए-आखिर में मुंशी फ़ैज़उद्दीन देहलवी ने मुगलों के काल में भी दिवाली के दिन तंत्र साधना का जिक्र किया है. इससे बचने के लिए दिवाली के दिन किसी भी कर्मचारी को महल परिसर से बाहर जाने का इजाजत नहीं होती थी. महल में कोई भी सब्जी इस रोज नहीं मंगाई जाती थी. अगर कोई बैंगन, कद्दू, चुकंदर या गाजर खाना चाहे तो पहले उसे छीलकर तब ही इस्तेमाल किया जाता था. ऐसी मान्यता थी कि इन फल-सब्जियों के जरिए महल के हरम की औरतों पर बाहरी व्यक्ति काला जादू कर सकता है.

वूडू ब्लैक मैजिक दिवाली पर की जाने वाले तांत्रिक अनुष्ठानों में से एक है. इससे काली शक्तियों को बस में किया जाता है ताकि अपने शत्रुओं का अनिष्ट किया जा सके. हालांकि शिक्षा का प्रचार-प्रसार होने के बाद से इस तरह की चीजों से लोगों का यकीन कम हुआ है लेकिन कुछ खास तबकों में अब भी ये प्रैक्टिस की जाती है.

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