जो भाव ईश्वर से मिला दे वही सच्ची प्रार्थना

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रायपुर। ईश्वर और हमारे दिल के बीच ऐसा भाव जो दोनों को जोड़ दे वही सच्ची प्रार्थना है। किसी चीज के अभाव में मनुष्य ईश्वर के पास मांगने जाता है, मजबूर होकर जाता है, आमतौर पर लोग इसे ही प्रार्थना मान लेते है। जो भी हमारे पास है उस पर संतोष करें और कुछ न मांग यही हमारी परीक्षा है। अच्छे कर्म और श्रम करो बाकी सब कुछ ईश्वर पर छोड़ दो। हार्टफुलनेस में प्रार्थना मनुष्य की जटिलताओं को निकाल कर आध्यात्मिकता से जोड़ने का काम करती है। प्रार्थना को मन विचलित करें तो बार-बार करें। हृदय में यह पूरी तरह से अनुभव करें कि हे नाथ, तू ही एकमात्र ईश्वर व शक्ति है जो उस लक्ष्य तक ले जा सकता है। हार्टफुलनेस ध्यान शिविर के आखिरी सत्र में प्रार्थना का आशय बताते हुए वैश्विक मार्गदर्शक कमलेश डी पटेल (दाजी) ने कहा कि ईश्वर से यदि मांगना ही है तो एक बार सब कुछ मांग लो, यह नहीं कि जब चाहे मांगने खड़े हो गए। वैसे हम है तो इच्छाओं के गुलाम और यही हमारे उन्नति में बाधक भी है। ईश्वर से संबंध जोड़ना चाहते है तो इच्छाएं बीच में आ जाती है। प्रार्थना को ध्यान से जोड़ें, ध्यान में जो अवस्था बनती है उसे बनाए रखें। यदि इन यादों का कवच नहीं होगा तो हृदय सुरक्षित नहीं रहेगा। शरणागति का भाव लेकर नम्रता से मांगेगे तो प्रार्थना सफल होगी, घमंड लेकर कुछ नहीं मांग सकते। दिल से सोचकर प्रार्थना करें। ईश्वर तो सब कुछ देने तैयार है लेकिन स्वयं के लिए ही मांगता है इंसान, दूसरों के लिए कभी नहीं। कभी यह करके भी देखो कितनी शांति मिलेगी।
गलती के लिए मांगे माफी
प्रार्थना करें ईश्वर का तो अपने से हुए गलती के लिए माफी मांग लें और यदि सही किया तो कृतज्ञता व्यक्त करते हुए आगे और अच्छा काम करने का आशीर्वाद मांगे। लेकिन यह तब संभव होगा जब आप अपनी इच्छाओं को टालेंगे।
आर्शिवाद तो सिर्फ ईश्वर देते हैं
कथित तौर पर चोलाधारी गुरुओं को आड़े हाथ लेते हुए दाजी ने कहा कि सिर पर हाथ रख दिया और दक्षिणा लेकर अपनी झोली भर ली तब कोई आर्शिवाद फलीभूत नहीं होगा। आर्शिवाद तो सिर्फ ईश्वर से मिलता है।
जो मन को अच्छा लगे वही करो
ऐसा नहीं कि आपने ध्यान शिविर में हिस्सा लिया तो उसी की मानो, आपके मन को जो अच्छा लगे वही करो। ध्यान के साथ ईश्वर की पूजा करना अच्छा लगता है तो वह भी करो। प्रार्थना से चेतना में बदलाव आ जाता है।