जग है दों दिन का मेला : स्वामी जयदेव जी महाराज

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रायपुर। श्री प्रेम प्रकाश आश्रम के 23 वर्ष पूर्ण होने पर श्रीमद भागवत गीता और श्री प्रेम प्रकाश ग्रंथ साहेब के पाठों भोग साहब सम्पन्न हुआ । अपने अमृतमयी उपदेश में श्री स्वामी जयदेव जी महाराज नें अपने गुरु आचार्य श्री सतगुरु स्वामी टेंऊँराम जी के वचनों का अनुसरण करते हुए बताया की इस मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन उसका स्वयं का मन होता है। इस मनुश्य के मन मेे दोष अपार है करोडो में कोई विरला इंसान है जो मन को अपने अनुसार चलाता है। अन्यथा हर इंसान के अंदर अहम (मैं) भरा होता है जबकि सारी सृष्टि वह परमात्मा चलाता है। लेकिन मनुष्य सोचता है की वह चला रहा है। आज के इंसान नें विज्ञान के क्षेत्र में बहुत तरक्की की है लेकिन आज तक मन को बस में करने की कोई उपलब्धि हासिल नहीं कर सका है। मन को बस में करने का एक हीं उपाय है की मैं और मेरा का त्याग कर दें ।

संसार को सारी मूलभूत सुविधाएं तो वह परमात्मा देता है इंसान केवल सोचता है की मैं कर रहा हूँ । आगे स्वामी जी नें बताया की प्रभु कैसे संसार के सब जीवो को ध्यान रखते है, कैसे प्रभु समुन्द्र की गहराई में बैठे जीवो का पेट भरते हैं, जंगल में जो चराचर जीव है उन सबका जितना पेट है वो परमात्मा भरते है तो मनुष्य़ का पेट वो क्यो नहीँ भरेंगे। लेकिन आज का इंसान उस परमात्मा को याद करने के बजाय, उसका शुकर करने के बजाय जरा सा दुख मिलने पर भगवान को कोसना शुरू कर देता है। वह इस बात को भूल जाता है जितना परमात्मा नें दिया है उसका कभी धन्यवाद तो किया नहीं । अब जरा सा दुख अगर कर्मो के अनुसार आया तो हे भगवान ये तूने क्या किया। कहता है सुख दुख सब कर्मो के अधीन है। परमात्मा नें तो यह मानुष चोला नेक कर्म करने के लिए दिया है लेकिन आज का मनुष्य़ इसे भोग , विषयों और विलासता में व्यर्थ कर रहा है। इस बात को भूल जाता है कि जग है दों दिन का मेला।