अनीति से अर्जित धन अशांति का कारण: साध्वी वैराग्यनिधिश्री

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रायपुर। श्री ऋषभदेव जैन मंदिर, सदरबाजार में बुधवार को कैवल्यधाम तीर्थ प्रेरिका गुरूवर्या साध्वी मणिप्रभाश्री की शिष्या साध्वी वैराग्यनिधिश्री ने ‘अंतराय कर्म: मार्ग में बाधाएं विपत्तियां क्यों?’ विषय पर श्रद्घालुओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि अनीति से अर्जित धन अशांति, कलह, क्लेश का कारण बनता है। लोभ कषाय के कारण व्यक्ति के विवेक चक्षु बंद हो जाते हैं। दूसरों की वस्तु को कपटपूर्ण हर लेना, उसका उपभोग करना भोगान्तराय कर्म का बंध कराता है। लोभवश बारम्बार किसी एक ही वस्तु के उपभोग करने पर भी भोगान्तराय कर्म का बंध होता, जिसके उदय में आने पर उस वस्तु के उपभोग से वंचित होना होता है, जैसे कि मीठे खाद्य पदार्थों के अत्यधिक सेवन से व्यक्ति को मधुमेह रोग का शिकार होना पड़ता है। अत्यंत परिश्रम और निरंतर प्रयत्नों पर भी इच्छित वस्तु का प्राप्त न होना लाभान्तराय कर्म का उदय है। वहीं योग्यता होने पर भी सामने वाले से सम्मान, प्रेम व यश की प्राप्ति न होना यह भोगान्तराय कर्म का उदय है। उदासीनता में जाना, डिप्रेशन में होना यह वीरान्तराय कर्म का उदय है। उन्होंने बताया कि वस्तु की प्राप्ति नहीं होना यह द्रव्य के अंतराय के कर्म का उदय अवश्य है किन्तु वस्तु की प्राप्ति की कामना, तृष्णा का होना यह अलग विषय है। इच्छाओं का सम्यक निरोध करना यह सम्यक चारित्र है। धर्म कार्य में, सुकृत्यों में दान करने के बाद उसका पश्चाताप करने वाला भविष्य में सब कुछ होते हुए भी प्राप्त सामग्री का भोग-उपभोग नहीं कर पाता, यह भी भोगान्तराय कर्म का उदय है। उन्होंने बताया कि दूसरों को देने में जब अंतराय दिया जाता है तब ऐसी स्थिति में स्वयं के जीवन में भी अंतराय उपस्थित हो जाता है। धर्म संस्कारों की विपन्नता, इंद्रिय संयम की कमी के कारण से कर्मों का बंध होता है। कर्मों का बंध यदि कर लिया है, इसका भान हो जाने पर यदि कोई उन कर्मों का क्षय करना चाहता है तो उसके लिए ज्ञानी महापुरूषों ने उपाय भी बताए हैं, यथा- चाहे दुख हो या सुख हो, प्रभु परमात्मा का अपने ईष्ट भगवंतों की भक्ति, सुमिरन, पूजन, सेवा करते रहें। अभावग्रस्तों, गरीबों, असहायों, जरूरतमंदों को यथासंभव सहयोग करें। परमात्मा की पूजा, गुरू की भक्ति, अनुकम्पा दान भावोल्लास से करें। सुपात्र दान कर साधर्मिक भक्ति करें। साधर्मिक भक्ति भी अंतराय कर्म का क्षय कराती है। यदि पूर्व भव में कर्म बंध हुए हैं और इस भव में हमारा व्यवहार, हमारा स्वभाव सबके साथ प्रेम और मैत्रीपूर्ण है तो ऐसी स्थिति में हम कर्म के परिणामों को घटाने में सक्षम हो सकते हैं।