जीवन को आगे बढ़ाने में नेक, नियति और संतोष जरूरी : डॉ विजय श्रीजी

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रायपुर। मनुष्य जीवन भर संसार में जीवन जीते हुए सांसारिक संबंध और वस्तु प्रेम से जुडा होता है। मनुष्य जीवन इस जीवन की यात्रा है जिसका लक्ष्य है मुक्ति कह स्थिति तक पहुचने की। यही जीवन का अन्तिम लक्ष्य होता है लेकिन मनुष्य संसार के सुखो में ही सुख का अनुभव करते रहता है। आत्मज्ञान होने पर ही संसार सुख से मोह छूट पाता है। जैसे जैसे बुद्वि, ज्ञान बढ़ता है वैसे वैसे आत्म स्वरूप का ज्ञान होता हैं। गुरूवर्या ने कहा कि जीवन का चरम लक्ष्य जन्म मृत्यु से मुक्त होकर मुक्ति पाना है, देव की गति प्राप्त करना हैं आपने बताया मनुष्य का जन्म पाना दुर्लभ होता है, मनुष्य जीवन ही एकमात्र जीवन है जिसे अपने पाप पुण्य कर्मो का बोध होता है जबकि अन्य जीवों में यह प्रतिभा नही होती। वह अपनी सोच और कर्मो को सुधारते हुए अपनी गति सुधार सकता है उसका दूसरा लक्ष्य यह होता है कि पुण्य कर्मों के द्वारा जीवन को वह दिशा दे कि मृत्यु पश्चात उसे अगला श्रेष्ठ जीवन मिल सके, तिरयंच की गति प्राप्त न हो। देवता को मृत्यु के बाद पुन: देवता का जीवन नही मिल सकता लेकिन देवता मृत्यु पश्चात मनुष्य जीवन पा सकता है। मनुष्य जीवन में ज्ञान होता है और उस ज्ञान के द्वारा वह अपने जीवन को श्रेष्ठ बना सकता है – यह गुण दूसरे प्राणियों में नहीं होता। इसलिए इस जीवन यात्रा में आगे बढ़ने के लिए केवल मुक्तिपाने का लक्ष्य बनाना चाहिए। लेकिन सांसारिक चक्र में पडें हुए वह अतिम समय मे जैसे भाव और विचार रखता है उसे अगला जीवन उसी के अनुसार मिलता है। आपने उदाहरण देकर बताया कि शरीर के साथ कोई वस्तु, चिपचिपी वस्तु, चिपक जाती है तो उसे शरीर से अलग कर पाना मुश्किल होता है, वैसे ही सांसारिक जीवन जीते हुए मनुष्य अपने साथ ऐसे अनेक चीजो को जीवन के साथ चिपका लेता है जिसका छूट पाना कठिन होता है, बेहतर हैं ऐसे तत्वों को हम अपने जीवन में चिपकाना छोडे और उससे मुक्त होकर जीवन को जीवन – मरण के दौर से छुटकारा दिलाने का यत्न करें वही श्रेयस्कर होगा। आत्मा को परमात्मा की ओर बढाना है, मुक्ति का पाना है तो भावना और चिन्तन दोनो सुधारना होगा। आपने उदाहरण दिया कि व्यक्ति के अन्दर मुक्ति पाने की लालसा या तड़प होना चाहिए और उस दिशा में प्रयास भी आवश्यक है तभी मुक्ति पाना संभव है। एक व्यक्ति नौ सौ रूपया अर्जन करता है प्रसन्न रहता है, घर का खर्च छ: सौ रूपया में चलाता है, तीन सौ रूपया बचाता है लेकिन वह अपने कम वेतन मे संतुष्ट व खुश रहकर और वह उसमें से भी तीन सौ रूपया का भी मदद जरूरमंद को कर सकता है, इसलिए उसे अधीक की जरूरत नही, इससे लालसा बढ़ जायेगी, जिसका अन्त नही हो सकेगा, और जीवन लोभ, मोह और चेष्टाओ में उलझा रहेगा। यह जीवन के लिए श्रेयस्कर नही है इसलिए जीवन में धर्म धारण के साथ नेक नियति और संतोष बना रहना चाहिए । यह उद्बोधन साध्वी डॉ. विजयश्री ने रिंग रोड नं. 1 पर एयरटेल कार्यालय के समीप सुरेश संघवी के निवास में दिया। उक्त जानकारी प्रचार प्रसार प्रभारी विमल पटवा ने दी।