नई दिल्ली, 16 जनवरी 2026। विविधता ही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। भारत ने यह साबित किया है कि लोकतांत्रिक संस्थाएं और लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं लोकतंत्र को स्थिरता, गति और व्यापक स्तर प्रदान करती हैं। भारत इस विविधता का उत्सव मनाता है। यहां लोकतंत्र की नींव मजबूत है। भारतीय लोकतंत्र एक विशाल वृक्ष की तरह है। इसकी गहरी जड़ें सहारा देती हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुरुवार 15 जनवरी को राष्ट्रमंडल देशों की संसदों के अध्यक्षों तथा पीठासीन अधिकारियों के 28 वें सम्मेलन के उद्घाटन में यह बातें कहीं। उन्होंने कहा कि जब भारत आजाद हुआ तो उस दौर में यह आशंका व्यक्त की गई थी कि इतनी विविधता में, भारत में लोकतंत्र टिक नहीं पाएगा लेकिन भारत ने इसी विविधता को लोकतंत्र की ताकत बना दिया।
भारत ने साबित किया कि लाेकतांत्रिक संस्थान और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ही लोकतंत्र की स्थिरता, गति और पैमाना तीनों आते हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत में लोकतंत्र का अर्थ अंतिम व्यक्ति तक योजनाओं का लाभ पहुंचाना है। उन्होंने कहा, हम लोक कल्याण की भावना से हर व्यक्ति के लिए बिना किसी भेदभाव के काम कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि भारत में लोकतंत्र से इसलिए परिणाम मिलता है क्योंकि सरकार के लिए देश की जनता ही सर्वोपरि है। उन्होंने कहा, हमने जनता की आकांक्षाओं को, जनता-जनार्दन के सपनों को प्राथमिकता बनाया है। उसके रास्ते में कोई बाधा ना आए, इसके लिए प्रक्रिया से लेकर प्रौद्योगिकी तक, हर चीज का लोकतांत्रिकरण किया है और यह लोकतांत्रिक भावना हमारी रगों में, हमारे मन में है, हमारे संस्कार में है। लोगों का हित, लोगों की भलाई और उनका कल्याण, ये हमारा संस्कार है, और ये संस्कार हमें हमारे लोकतंत्र ने दिए हैं।
भारत में महिलाएं केवल भागीदार ही नहीं बल्कि नेतृत्व की भूमिका में हैं। यह सशक्तिकरण आप को शीर्ष पद राष्ट्रपति से लेकर गांवों में निम्न स्तर तक दिखाई देगा। पीएम मोदी ने भारतीय लोकतंत्र की विविधता का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां सैकड़ों भाषाएं बोली जाती हैं। विभिन्न भाषाओं में नौ सौ से अधिक टेलीविजन चैनल हैं। हजारों समाचार पत्र और पत्रिकाएं प्रकाशित होती हैं। बहुत कम समाज इतने बड़े स्तर पर विविधता का प्रबंधन कर पाते हैं।
यहां वाद-विवाद, संवाद और सामूहिक निर्णय-निर्माण की एक लंबी परंपरा रही है। भारत को लोकतंत्र की जननी कहा जाता है। हमारे पवित्र ग्रंथ वेद पांच हजार वर्ष से भी अधिक पुराने हैं। उनमें ऐसी सभाओं का उल्लेख है, जहां लोग मुद्दों पर चर्चा करने के लिए एकत्र होते थे। विचार-विमर्श और सहमति के बाद निर्णय लिए जाते थे। हम भगवान बुद्ध की भूमि हैं। बौद्ध संघ में खुले और सुव्यवस्थित विचार-विमर्श होते थे। निर्णय सहमति या मतदान के माध्यम से लिए जाते थे।
















