रायपुर में राजस्थान दिवस पर राजेंद्र ओझा को ‘भारतीय भाषा संवर्धन सम्मान’ से नवाजा गया। जानें कैसे उन्होंने भारत की 252 बोलियों और दुर्लभ भाषाओं को सहेजने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। एक अनूठी कहानी जो आपको अपनी जड़ों से जोड़ देगी।
रायपुर, 30 मार्च 2026। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ‘राजस्थान दिवस’ पर भाषाई संरक्षण के क्षेत्र में एक नई मिसाल पेश की गई। स्थानीय वृन्दावन सभागार में राजस्थान क्लब, रायपुर द्वारा आयोजित कार्यक्रम में प्रख्यात भाषा प्रेमी राजेंद्र ओझा को ‘भारतीय भाषा संवर्धन सम्मान’ से नवाजा गया।
यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि लुप्त होती भारतीय बोलियों और भाषाओं को बचाने के उस जुनून का सम्मान है, जो ओझा जी पिछले कई दशकों से जी रहे हैं।
कौन हैं राजेंद्र ओझा
कार्यक्रम के संयोजक कैलाश रारा ने राजेंद्र ओझा के कार्यों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि वे एक आधुनिक ‘भाषा संग्रहालय’ की तरह काम कर रहे हैं। ओझा जी केवल भारत की आधिकारिक 22 भाषाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे देश के सुदूर अंचलों में बोली जाने वाली उन 252 बोलियों को भी सहेज रहे हैं, जो धीरे-धीरे आधुनिकता की भेंट चढ़ रही हैं।
संग्रह की मुख्य विशेषताएं
- भारत के लगभग सभी राज्यों की प्रमुख भाषाओं के साथ-साथ स्थानीय बोलियों की दुर्लभ पुस्तकें और पत्रिकाएं।
- विभिन्न क्षेत्रों के कैलेंडर, पंचांग और हस्तलिपियां जो उस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान बयां करती हैं।
- लुप्तप्राय बोलियों को दस्तावेजी रूप देकर नई पीढ़ी तक पहुंचाना।
राजस्थान दिवस पर भाषा-सेतु का संगम
राजस्थान दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित इस कार्यक्रम ने छत्तीसगढ़ और राजस्थान के बीच एक सांस्कृतिक सेतु का काम किया। वक्ताओं ने कहा कि किसी भी समाज की आत्मा उसकी भाषा में बसती है, और राजेंद्र ओझा जैसे लोग उस आत्मा को जीवित रखने वाले रक्षक हैं।
कार्यक्रम के दौरान लोकेश कावडिया, प्रसिद्ध साहित्यकार गिरीश पंकज, राजकुमार राठी, अनिल द्विवेदी और डॉ. मृणालिका ओझा ने अपने विचार रखे। इस अवसर पर राजेश जैन राही, डॉ. लक्ष्मीनारायण लाहोटी, छबिलाल सोनी और ममता जैन सहित शहर के प्रबुद्ध नागरिक और साहित्य प्रेमी बड़ी संख्या में उपस्थित थे।
लुप्त होती बोलियों को बचाने की अपील
सम्मान ग्रहण करने के बाद राजेंद्र ओझा ने भावुक होते हुए कहा कि तकनीक के दौर में हम अपनी जड़ों यानी अपनी मातृभाषा और बोलियों से दूर होते जा रहे हैं। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे अपनी स्थानीय बोलियों को बोलने में शर्म महसूस न करें, बल्कि इसे गौरव के रूप में अपनाएं।
















