स्वर्णमयी लंका न मिले वो अवधपुरी की धूल मिले…

स्वर्णमयी लंका न मिले वो अवधपुरी की धूल मिले…

रमेश पाण्डेय

  • संघ के कार्यों में जीवित रहेगी शांताराम जी की विरासत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वरिष्ठ प्रचारक श्रद्धेय शांताराम सर्राफ जी का 5 सितंबर 2025 को 93 वर्ष की आयु में निधन हो गया। पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ चल रहे वे शाम 5:45 बजे जीवन की अंतिम सांस ले चुके थे। उनका यह अवसान न केवल संघ परिवार के लिए अपितु सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए एक अपूरणीय क्षति है।

जागृति मंडल, रायपुर में उनके पार्थिव शरीर पर पुष्पांजलि अर्पित करने के लिए असंख्य स्वयंसेवक, भाजपा नेता एवं सामाजिक कार्यकर्ता एकत्र हुए। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने भी उनके अंतिम दर्शन कर श्रद्धांजलि दी और कहा कि शांताराम जी का जीवन समाज सेवा एवं राष्ट्र निर्माण का प्रतीक था।

इस दुखद घटना के बाद उनके मुखारविंद से प्रस्तुत हुई कविता “स्वर्णमयी लंका न मिले वो अवधपुरी की धूल मिले…” बार-बार याद आ रही है, जो उनके हृदय की गहन देशभक्ति एवं मातृभूमि के प्रति समर्पण को प्रतिबिंबित करती है। यह कविता वह अक्सर गुनगुनाया करते थे। इन पंक्तियों में स्वर्णिम लंका की वैभवपूर्णता के बजाय अवधपुरी (अयोध्या) की पवित्र धूल को प्राथमिकता दी गई है, जो भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिकता एवं त्याग की भावना को उजागर करती है। शांताराम जी का जीवन संघ की विचारधारा का जीवंत उदाहरण था।

वे मृदुभाषी, घोष में शंख वादक एवं उत्कृष्ट गीतकार थे। उनकी आवाज में संघ के गीतों की मधुरता एवं शंखनाद की गंभीरता ने असंख्य युवाओं को प्रेरित किया। उनका निधन संघ के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय का समापन है, लेकिन उनकी विरासत सदैव जीवित रहेगी। शांताराम सर्राफ जी का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था, जहां भारतीय मूल्यों एवं संस्कृति का बीजारोपण बचपन से ही हुआ। वे बचपन से ही राष्ट्रप्रेमी विचारों से ओतप्रोत थे।

शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने बैंकिंग क्षेत्र में नौकरी आरंभ की, जो उस समय एक सम्मानजनक एवं स्थिर व्यवसाय था। लेकिन संघ की विचारधारा ने उनके हृदय को छू लिया। आरएसएस की शाखाओं में भाग लेते हुए उन्हें लगा कि व्यक्तिगत सुख से ऊपर राष्ट्रसेवा ही सच्चा जीवन है। बैंक की नौकरी छोड़कर प्रचारक बनना कोई साधारण निर्णय नहीं था।

1950-60 के दशक में, जब भारत आर्थिक रूप से संघर्षरत था, तब शांताराम जी ने गृहस्थ जीवन त्यागकर पूर्णकालिक प्रचारक का मार्ग चुना। यह निर्णय उनके त्याग की भावना को दर्शाता है। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी की प्रेरणा से प्रभावित होकर उन्होंने अपना जीवन संघ के चरणों में समर्पित कर दिया। मध्यप्रदेश के सागर जिले से उनका कार्यक्षेत्र आरंभ हुआ, जहां उन्होंने जिला स्तर पर शाखाओं का विस्तार किया।

उनकी मेहनत से ग्रामीण क्षेत्रों में संघ की जड़ें मजबूत हुईं। उनके प्रारंभिक जीवन में कठिनाइयां कम न थीं। आर्थिक तंगी, सामाजिक दबाव एवं पारिवारिक विरोध के बावजूद वे अडिग रहे। एक बार सागर में बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्य करते हुए उन्होंने स्वयंसेवकों को संगठित किया, जो उनके नेतृत्व की पहली झलक थी। शांताराम जी का मानना था कि राष्ट्रसेवा ही सच्ची तपस्या है। उनकी यह विचारधारा ने युवा पीढ़ी को प्रभावित किया। शांताराम जी ने संघ के विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कुशलतापूर्वक कार्य किया।

मध्यप्रदेश के सागर में जिला प्रचारक के रूप में उन्होंने स्थानीय स्तर पर शाखाओं का नेटवर्क स्थापित किया। इसके बाद रायपुर में विभाग प्रचारक बने, जहां छत्तीसगढ़ क्षेत्र के विकास में उनकी भूमिका सराहनीय रही। 1980 के दशक में वे छत्तीसगढ़ प्रांत के प्रथम प्रांत प्रचारक बने, जब यह क्षेत्र मध्यप्रदेश से अलग होकर नया राज्य बनने की दिशा में अग्रसर था। उनके नेतृत्व में छत्तीसगढ़ में संघ की शाखाएं तेजी से फैलीं।

उन्होंने स्थानीय जनजातीय एवं ग्रामीण समुदायों को जोड़ने का कार्य किया। मध्यक्षेत्र के प्रचार प्रमुख एवं संपर्क प्रमुख के रूप में उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर संघ की एकता को मजबूत किया। आपातकाल के दौरान (1975-77) जब संघ पर प्रतिबंध लगा, तब शांताराम जी भूमिगत कार्यों में सक्रिय रहे। उन्होंने स्वयंसेवकों को प्रेरित कर संगठन को जीवित रखा। उनके योगदान में सेवा कार्य प्रमुख थे।

1990 के दशक में छत्तीसगढ़ में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में उन्होंने शिक्षा एवं स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन किया। संघ की सहयोगी संस्थाओं जैसे सेवा भारती एवं वनवासी कल्याण आश्रम के माध्यम से हजारों लोगों तक पहुंच बनाई। शांताराम जी का मानना था कि हिंदू समाज की एकता ही राष्ट्र की शक्ति है। उनके प्रयासों से छत्तीसगढ़ में संघ की उपस्थिति मजबूत हुई, जो आज भी दिखाई देती है। वे केवल संगठनकर्ता ही नहीं, बल्कि एक कुशल प्रशिक्षक भी थे।

संघ के प्रशिक्षण शिविरों (वर्गों) में वे शिक्षक के रूप में कार्यरत रहे। युवाओं को शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक प्रशिक्षण देकर उन्होंने भावी प्रचारकों का निर्माण किया। मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ के सैकड़ों युवा उनके मार्गदर्शन में प्रचारक बने। शांताराम जी की सबसे बड़ी विशेषता उनकी मृदुभाषिता थी। वे कभी कठोर शब्दों का प्रयोग न करते थे, लेकिन उनके शब्दों में गहराई होती थी। घोष शाखा में शंख वादन उनकी विशेषज्ञता थी।

शंखनाद सुनकर स्वयंसेवक उत्साहित हो जाते थे, जो संघ की शाखाओं का अभिन्न अंग है। वे एक उत्कृष्ट गीतकार भी थे। संघ के गीतों को अपनी मधुर आवाज में गाकर वे सांस्कृतिक कार्यक्रमों को जीवंत बनाते थे। शांताराम जी का जीवन सादगी का प्रतीक था। वे सादा वस्त्र धारण करते, सादा भोजन ग्रहण करते। स्वयंसेवकों के बीच वे एक बड़ा भाई की तरह व्यवहार करते। उनकी स्मृति में कई स्वयंसेवक उन्हें शांताराम भाई कहकर याद करते हैं। उनकी कलात्मक प्रतिभा ने संघ के सांस्कृतिक कार्यक्रमों को समृद्ध किया।

एक बार रायपुर में आयोजित संघ के कार्यक्रम में उनके शंखनाद एवं गीतों ने हजारों लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया था। 5 सितंबर 2025 की शाम, जब सूर्य अस्त हो रहा था, शांताराम जी ने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर फैलते ही रायपुर एवं छत्तीसगढ़ में शोक की लहर दौड़ गई। जागृति मंडल में उनके पार्थिव शरीर को रखा गया, जहां असंख्य लोग श्रद्धांजलि अर्पित करने पहुंचे।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा, शांताराम जी का योगदान छत्तीसगढ़ के निर्माण में अविस्मरणीय है। पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह ने ट्वीट कर शोक व्यक्त किया: उनका जीवन राष्ट्रसेवा का प्रेरणास्रोत था। भाजपा नेता प्रेम प्रकाश पांडेय, सांसद विजय बघेल एवं अन्य ने भी श्रद्धांजलि दी। अंतिम संस्कार 6 सितंबर को श्री हरिहर क्षेत्र, मदकू द्वीप में किया गया। शांताराम जी की विरासत संघ के कार्यों में जीवित है।

छत्तीसगढ़ में आज 5000 से अधिक शाखाएं हैं, जिनकी नींव उन्होंने रखी। उनके प्रयासों से जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचीं। युवा स्वयंसेवक उन्हें आदर्श मानते हैं। उनकी कविता आज भी संघ के कार्यक्रमों में गाई जाती है, जो देशभक्ति की भावना जगाती है। उनके निधन से संघ परिवार शोकाकुल है, लेकिन उनकी शिक्षाएं प्रेरणा देती रहेंगी। शांताराम जी का जीवन सिद्ध करता है कि त्याग से ही राष्ट्र निर्माण संभव है। उनकी स्मृति में संघ विभिन्न कार्यक्रम आयोजित करेगा। ईश्वर से प्रार्थना है कि उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें एवं हमें उनके मार्ग पर चलने की शक्ति दें।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)