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यूपी का ऐसा गांव, जहां हर घर से IAS, IPS और IRS अधिकारी

यूपी का ऐसा गांव, जहां हर घर से IAS, IPS और IRS अधिकारी

लखनऊ, 6 सितंबर 2025। यूपी के जौनपुर जिले का छोटा-सा गांव माधोपट्टी आज देश में एक अनोखी मिसाल बन चुका है। केवल 75 घरों वाला यह गांव ‘सिविल सेवाओं की फैक्ट्री’ के रूप में विख्यात हो रहा है, जहां से 50 से अधिक IAS, IPS और IRS अधिकारी निकलकर देश की सेवा में जुटे हैं। यह गांव न केवल प्रशासनिक सेवाओं में अपनी धाक जमा रहा है, बल्कि विज्ञान, चिकित्सा, सेना और अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भी अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रहा है। इस गांव की कहानी मेहनत, लगन और शिक्षा के प्रति समर्पण की जीवंत मिसाल है।

माधोपट्टी की इस शानदार यात्रा की नींव स्वतंत्रता सेनानी ठाकुर भगवती दीन सिंह और उनकी पत्नी श्यामरति सिंह ने रखी थी। साल 1917 में श्यामरति सिंह ने अपने घर से ही लड़कियों की शिक्षा शुरू की। उस दौर में, जब शिक्षा तक पहुंच सीमित थी, श्यामरति का यह कदम क्रांतिकारी था। धीरे-धीरे लड़के भी उनके पास पढ़ने आने लगे। उनके इस प्रयास ने गांव में शिक्षा की ऐसी लौ जलाई, जो आज भी जल रही है। आजादी के बाद इस गांव से अधिकारियों का सिलसिला शुरू हुआ, जो आज तक बदस्तूर जारी है।

माधोपट्टी का पहला बड़ा पड़ाव 1952 में आया, जब डॉक्टर इंदुप्रकाश ने UPSC सिविल सेवा परीक्षा में दूसरी रैंक हासिल कर IAS बनकर गांव का नाम रोशन किया। इसके बाद 1964 में छत्रसाल सिंह ने तमिलनाडु के मुख्य सचिव के रूप में अपनी पहचान बनाई। उसी साल अजय सिंह और 1968 में शशिकांत सिंह ने IAS बनकर गांव की इस परंपरा को और मजबूत किया। 1990 के दशक में तो इस गांव ने इतिहास रच दिया, जब एक ही परिवार के पांच लोगों ने IAS और IPS बनकर रिकॉर्ड कायम किया। यह उपलब्धि न केवल गांव, बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी।

माधोपट्टी की खासियत केवल सिविल सेवाओं तक सीमित नहीं है। यहां के लोग विज्ञान, चिकित्सा, सेना और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं। गांव के जन्मेजय सिंह विश्व बैंक में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहे हैं, तो डॉक्टर ज्ञानू मिश्रा ISRO में वैज्ञानिक के रूप में योगदान दे रहे हैं। वहीं, देवेंद्र नाथ गुजरात के सूचना निदेशक रह चुके हैं। गांव के लोग NASA, ISRO और संयुक्त राष्ट्र जैसे प्रतिष्ठित संगठनों में भी अपनी सेवाएं दे रहे हैं। यह गांव साबित करता है कि छोटे से स्थान से भी विश्व स्तर पर प्रभाव डाला जा सकता है।

महिलाओं ने भी इस गांव की शान में चार चांद लगाए हैं। 1980 में आशा सिंह, 1982 में ऊषा सिंह और 1983 में इंदु सिंह ने सिविल सेवाओं में चयनित होकर यह साबित किया कि माधोपट्टी की बेटियां किसी से कम नहीं। इन महिलाओं ने न केवल गांव, बल्कि पूरे समाज के लिए एक मिसाल कायम की।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस गांव की उपलब्धियों को सराहा है। लोकसभा चुनाव के दौरान जौनपुर में एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने माधोपट्टी का जिक्र किया और इसे देश के लिए प्रेरणा बताया। जौनपुर मुख्यालय से महज 10 किलोमीटर दूर बसे इस गांव ने अपनी मेहनत और शिक्षा के दम पर जो मुकाम हासिल किया है, वह हर भारतीय को गर्व करने का मौका देता है।

माधोपट्टी की यह कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि शिक्षा और दृढ़ संकल्प की ताकत की कहानी है। यह गांव आज के युवाओं को सिखाता है कि संसाधनों की कमी सपनों को रोक नहीं सकती। मेहनत और लगन के बल पर कोई भी छोटा-सा गांव देश का गौरव बन सकता है। माधोपट्टी न केवल जौनपुर या उत्तर प्रदेश, बल्कि पूरे भारत के लिए एक प्रेरणा है।