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न्यायमूर्ति सूर्यकांत बनेंगे भारत के 53वें सीजेआई, केंद्र ने शुरू की नियुक्ति प्रक्रिया

न्यायमूर्ति सूर्यकांत बनेंगे भारत के 53वें सीजेआई, केंद्र ने शुरू की नियुक्ति प्रक्रिया

नई दिल्ली, 25 अक्टूबर 2025। केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायमूर्ति सूर्यकांत को देश के 53वें मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के रूप में नियुक्त करने की औपचारिक प्रक्रिया आरंभ कर दी है। वर्तमान मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बीआर गवई की 23 नवंबर 2025 को सेवानिवृत्त हो जाएंगे। न्यायमूर्ति सूर्यकांत का कार्यकाल लगभग 14 माह का होगा।

कानून एवं न्याय मंत्रालय ने सीजेआई गवई को पत्र लिखकर उनके उत्तराधिकारी के नाम की सिफारिश करने का अनुरोध किया है। स्थापित परंपरा के अनुसार, उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश को ही अगले सीजेआई के पद पर अनुशंसित किया जाता है, और वर्तमान में न्यायमूर्ति गवई के बाद न्यायमूर्ति सूर्यकांत ही सबसे वरिष्ठ हैं।

यह नियुक्ति न केवल न्यायपालिका की निरंतरता सुनिश्चित करेगी, बल्कि न्यायमूर्ति सूर्यकांत के लंबे और उत्कृष्ट न्यायिक सफर को भी रेखांकित करेगी। 10 फरवरी 1962 को हरियाणा के हिसार जिले के पेतवार गांव में एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे सूर्यकांत ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय सरकारी पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज, हिसार से 1981 में प्राप्त की।

इसके बाद उन्होंने महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक से 1984 में विधि स्नातक (एलएलबी) की उपाधि हासिल की। कानूनी क्षेत्र में प्रवेश करते ही उन्होंने हिसार जिला न्यायालय में वकालत शुरू की और जल्द ही अपनी प्रतिभा से पहचान बना ली। न्यायमूर्ति सूर्यकांत का करियर संघर्ष और समर्पण की मिसाल है। 1990 के दशक में वे हरियाणा सरकार के सबसे युवा महाधिवक्ता (एडवोकेट जनरल) बने, जहां उन्होंने राज्य की ओर से कई महत्वपूर्ण मामलों में पैरवी की।

उनकी कानूनी कुशलता का प्रमाण तब मिला जब 2004 में उन्हें पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में स्थायी न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया। यहां उन्होंने मानवाधिकार, लिंग न्याय, शिक्षा और जेल सुधारों से जुड़े कई ऐतिहासिक फैसलों पर हस्ताक्षर किए। उदाहरणस्वरूप, ‘जसवीर सिंह बनाम पंजाब राज्य’ मामले में उन्होंने जेल सुधारों पर जोर देते हुए राज्य को कैदियों के लिए दांपत्य एवं पारिवारिक मुलाकात की योजना बनाने का निर्देश दिया, जो सुधारात्मक न्याय की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हुआ।

2018 में न्यायमूर्ति सूर्यकांत को हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया। इस नियुक्ति पर थोड़ी विवादास्पद चर्चा हुई, क्योंकि पूर्व सीजेआई ए.के. गोयल ने कॉलेजियम की सिफारिश पर असहमति जताई थी। हालांकि, कॉलेजियम ने सभी उच्च न्यायालयों से पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का हवाला देकर इसे बरकरार रखा।

मात्र एक वर्ष बाद, 9 मई 2019 को तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई के नेतृत्व वाले कॉलेजियम ने उन्हें उच्चतम न्यायालय में पदोन्नत करने की सिफारिश की, और 24 मई 2019 को वे शपथ ग्रहण कर चुके थे। तब वे अपेक्षाकृत युवा उम्र में शीर्ष अदालत पहुंचने वाले न्यायाधीशों में शुमार हुए, जिससे उनका कार्यकाल 9 फरवरी 2027 तक सुनिश्चित हुआ।

उच्चतम न्यायालय में न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने 80 से अधिक फैसलों पर अपनी राय लिखी है और 1000 से ज्यादा बेंचों का हिस्सा बने हैं। उनके प्रमुख फैसलों में ‘मनोहर लाल शर्मा बनाम भारत संघ’ (2021) शामिल है, जहां उन्होंने पेगासस जासूसी कांड की जांच के लिए विशेषज्ञ समिति गठित की, जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा में महत्वपूर्ण साबित हुई। इसी प्रकार, ‘अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बनाम नरेश अग्रवाल’ (2024) में सात सदस्यीय संवैधानिक बेंच का हिस्सा बनकर उन्होंने अल्पसंख्यक संस्थानों की आरक्षण नीति पर विचार किया।

कलमानी टेक्स बनाम पी. बालासुब्रमण्यम (2022) में उन्होंने चेक बाउंस मामलों में कानूनी धारणाओं को मजबूत किया। इसके अलावा, सेडिशन कानून (धारा 124ए आईपीसी) पर सुनवाई के दौरान उन्होंने जांच पर रोक लगाने का आदेश दिया, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संरक्षित करने वाला कदम था।

मई 2025 में न्यायमूर्ति सूर्यकांत को राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया गया, जो सीजेआई के बाद दूसरे वरिष्ठतम न्यायाधीश की भूमिका है। नालसा के माध्यम से उन्होंने गरीबों और हाशिए पर रहने वालों को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करने पर विशेष जोर दिया।

शिक्षा के प्रति उनकी रुचि भी उल्लेखनीय है; 2011 में उन्होंने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से विधि स्नातकोत्तर (एलएलएम) में प्रथम श्रेणी प्रथम प्राप्त किया। वे भारतीय विधि संस्थान की विभिन्न समितियों के सदस्य हैं और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का आयोजन एवं भागीदारी करते रहे हैं।