रोहतास, 26 अक्टूबर 2025। भोजपुरी की मशहूर लोकगायिका बिजली रानी अब नहीं रहीं। 24 अक्टूबर 2025 को उनका निधन हो गया। वे पिछले कुछ महीनों से बीमार चल रहीं थीं। भोजपुरी गायन के क्षेत्र में रोहतास की बेटी बिजली रानी ऐसी शख्सियत थीं कि उनका नाम सुनते ही लोगों में उत्साह की लहर दौड़ जाती थी, खासकर पूर्वांचल की शादियों में।
जमींदारों की बारातें हो या रजवाड़ों के विवाह, नेता की सभा हो या कोतवाल की दावत, सब पर उनका राज था। लोग कहते थे, शादी की तारीखें पहले बिजली से पूछकर तय होती हैं। उनकी उपलब्धता पर ही मुहर लगती थी। वह सिर्फ एक गायिका नहीं थीं, बल्कि भोजपुरी लोक की जीवंत चेतना थीं, जिन्होंने इस भाषा को जनमानस की जुबान बना दिया।
उनकी आवाज में शिल्प की चमक नहीं, जीवन की सादगी थी। गीतों में हर्ष और विषाद का द्वंद्व, सुरों में वह आत्मीयता जो भोजपुरी संस्कृति को दिलों तक पहुंचाती थी। बिजली रानी ने उन गीतों को आवाज दी जिनमें देह की व्यंजना खुलकर उभरी। पियवा जात बाड़ा पुलिस के बलहिया में… जैसे बोल्ड गाने मंचों से कैसेट बाजार तक तहलका मचा गए।
इनसे उन्हें अभूतपूर्व लोकप्रियता मिली, जो शायद किसी अन्य भोजपुरी गायिका को नसीब नहीं हुई। लेकिन आलोचना की बौछार भी कम नहीं थी। एक तरफ उन्हें संस्कृति की वाहक कहा गया, तो दूसरी ओर अश्लीलता की प्रचारक। कलाकार आखिर कहां रुकता है? वह वही गाता है जो समाज सुनना चाहता है। यही उनकी सबसे बड़ी त्रासदी बनी।
शुरुआती सुर सादगी और ग्रामीण जीवन की गंध से भरपूर थे, लेकिन बाजार की मांगों में धीरे-धीरे घुलते गए। समाज, जो कभी दीवाना था, अब दूरी बनाने लगा। समय बदला, नए मंच और नए स्वर उभरे। राज्य सीमाओं से परे गूंजने वाली आवाज किनारे सरकती गई। बिजली रानी भी इस धारा में ओझल हो गईं।
आखिरी वर्षों में बीमारी और आर्थिक तंगी ने घेर लिया। दोनों किडनियां फेल हो चुकी थीं। अंतत: इलाज बीमारी से हार गया। 24 अक्टूबर 2025 की सुबह, 70 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली। यह विडंबना नहीं, हमारी सांस्कृतिक उपेक्षा का आईना है। जो कभी शादियों, मंचों और उत्सवों की जान थीं, उनकी मौत पर सिर्फ सन्नाटा। समाचार एजेंसियों की कुछ पंक्तियां, सोशल मीडिया पर बिखरी श्रद्धांजलियां और एक युग की आवाज खामोश।
मशहूर थीं, लेकिन गुमनामी में गईं। मौत के बाद याद करने वाले भी कम, उनका जीवन हर उस कलाकार की दास्तान है जो तालियों की चमक में चमकता है, मगर अंधेरे में अकेला पड़ जाता है। फिर भी, यह अंत नहीं। कला मरती नहीं, रूप बदलती है। बिजली रानी के गीत पुराने रिकॉर्डों में सांस लेंगे, स्मृतियों में झंकारते रहेंगे। जब भी भोजपुरी मंच सजेगा, उनका नाम अनायास उभरेगा।
बिहार के रोहतास जिले के नटवार की यह बेटी 80 और 90 के दशक में भोजपुरी की प्रतिष्ठित हस्ती थी। नाम सुनते ही भीड़ उमड़ पड़ती। कार्यक्रम लोकप्रियता की मिसाल थे। गायन, अभिनय और नृत्य का अनोखा संगम, सहज और प्रभावशाली।
मशरख मालगोदाम मैदान का वह दृश्य आज भी याद है। तत्कालीन सांसद प्रभुनाथ सिंह की बेटी की शादी। बिजली रानी पूरी मंडली के साथ आईं। चालीस कलाकार, पचास मीटर का मंच, सवा लाख की भीड़। छपरा से थावे-सीवान तक लोग आए। देर रात माइक थामते ही मजमा झूम उठा। हवा में उनके गीतों की खनक आज भी गूंजती प्रतीत होती है।
बिजली रानी ने भोजपुरी को जीवंत बनाया, लेकिन समाज ने उन्हें भुला दिया। उनकी विरासत सवाल उठाती है क्या हम अपनी धरोहर की कीमत समझते हैं?
















