प्रतापगढ़, 18 नवंबर 2025। लोकनाट्य की दुनिया में सम्मानित नाम और नौटंकी विधा के सशक्त प्रतिनिधि दयाराम पटेल अब हमारे बीच नहीं रहे। 17 नवंबर की शाम उन्होंने जीवन की अंतिम सांस ली। प्रतापगढ़ जिले के कहला गांव के इस महान कलाकार ने अपने जीवनकाल में न केवल अभिनय को नई ऊंचाई दी, बल्कि पारंपरिक नौटंकी कला को आधुनिक स्वरूप देकर नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
दयाराम पटेल को मंच पर देखने का अनुभव खुद में एक उत्सव माना जाता था। उनकी आवाज़, संवादों की अदायगी, भाव-भंगिमाएं और कहानी में जान फूंक देने की क्षमता उन्हें सामान्य कलाकारों से अलग बनाती थी। वे केवल एक अभिनेता नहीं बल्कि परंपरा, संस्कृति और लोकधारा के वाहक थे। मंच पर उतरते ही दर्शक रोमांचित हो उठते थे और उनकी प्रस्तुतियां देर रात तक उत्साह बनाए रखती थीं।
उनकी कई नौटंकियों ने पूर्वांचल ही नहीं बल्कि दूर-दराज के क्षेत्रों में भी जबरदस्त लोकप्रियता हासिल की। राजा का इंसाफ उर्फ जोगन का श्राप, किस्मत का चक्कर, अपना और पराया जैसे टाइटल उनकी कला यात्रा की अमूल्य धरोहर माने जाते हैं। इन नाटकों में उन्होंने समाजिक संदेश, भावनात्मक संघर्ष और मनोरंजन का ऐसा संगम प्रस्तुत किया जिसे दर्शक वर्षों तक नहीं भूल पाए।
दयाराम पटेल का योगदान केवल मंच तक सीमित नहीं था। उन्होंने नई पीढ़ी के कलाकारों को प्रशिक्षित किया, गांव-गांव जाकर लोकनाट्य की गरिमा को बनाए रखा और इस परंपरा को जीवित रखने के लिए निरंतर प्रयास किया। उनके सादगीभरे स्वभाव और कला के प्रति समर्पण ने उन्हें लोगों के दिलों में खास स्थान दिलाया।
दयाराम पटेल का जाना लोकनाट्य जगत का ऐसा नुकसान है जिसकी भरपाई संभव नहीं। भले ही उनका भौतिक शरीर अब दिखाई न दे, लेकिन उनकी कला, उनके संवाद और उनके द्वारा निभाए गए किरदार हमेशा जीवित रहेंगे। लोककला के रहनुमा माने जाने वाले दयाराम पटेल ने जिस तरह नौटंकी को आधुनिकता और परंपरा के संतुलन के साथ आगे बढ़ाया, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत रहेगा।
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