वाराणसी, 3 दिसंबर 2025। देवव्रत महेश रेखे की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोशल मीडिया पर प्रशंसा की है। इसके बाद से हर कोई देवव्रत महेश रेखे के बारे में जानना चाहता है। प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर लिखा-महेश रेखे ने जो किया है, उसे आने वाली पीढ़ियां याद रखेंगी। देवव्रत मेहश रेखे ने वाराणसी में रहकर यह साधना पूरी की।
रेखे ने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यंदिनी शाखा के 2,000 मंत्रों वाला दंडक्रम पारायण बिना किसी रुकावट के 50 दिनों में पूरा किया है, जिससे प्रधानमंत्री मोदी प्रभावित हुए हैं।
सराहना
प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा
सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा, देवव्रत मेहश रेखे ने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यंदिनी शाखा के 2000 मंत्रों वाला दंडक्रम पारायणम बिना किसी रुकावट 50 दिनों में पूरा किया। इसमें वैदिक श्लोक और पवित्र शब्द बिना किसी गलती के पढ़े गए। वे हमारी गुरु परंपरा के अच्छे उदाहरण हैं। काशी से सांसद होने के नाते, मुझे खुशी है कि यह अनोखा काम पवित्र शहर में हुआ। उनके परिवार, संतों, ऋषियों, विद्वानों और संगठनों को मेरा प्रणाम जिन्होंने उनका साथ दिया।
परिचय
कौन हैं महेश रेखे
महेश रेखे मूल रुप से महाराष्ट्र के निवासी हैं। उनका जन्म अहिल्यानगर (पूर्व में अहमदनगर) में ब्राह्मण परिवार में 2006 में हुआ है। उनके घर में वेदों का अध्ययन करने की परंपरा रही है। पिता चंद्रकांत रेखे ने उन्हें शुक्ल यजुर्वेद की माध्यंदिन शाखा का प्रशिक्षण दिया। यह शाखा यजुर्वेद की सबसे प्रचलित और जटिल शाखाओं में से एक है। इसमें कर्मकांड, मंत्र और ऋचाओं का विस्तृत ज्ञान होता है। उनके पिता ही उनके गुरु भी हैं।
मार्गदर्शन
काशी में किया दंडक्रम पारायण
महेश रेखे के पिता चंद्रकांत शृंगेरी पीठम की वेद पोषक सभा के तहत शुक्ल यजुर्वेद माध्यंदिन शाखा के मुख्य परीक्षक हैं। पिता ने ही उनकी सारी साधना का मार्गदर्शन किया। काशी को वैदिक शिक्षा और तपस्या का प्राचीन केंद्र माने जाने की वजह से देवव्रत दंडक्रम पारायण के लिए वाराणसी के वल्लभराम शालिग्राम सांगवेद विद्यालय पहुंचे थे। काशी में इसे कराने का निर्णय शृंगेरी शारदा पीठम (दक्षिण भारत का प्रमुख वैदिक केंद्र) के जगद्गुरु शंकराचार्य के आशीर्वाद से लिया गया।
साधना
क्या है दंडक्रम परायण
दंडक्रम परायण को अत्यंत ही कठिन वैदिक परीक्षा यानी साधना है। इसमें करीब 2,000 मंत्रों, वैदिक ऋचाओं और श्लोकों का शुद्ध उच्चारण (पारायण) बिना किसी रुकावट के होता है। यह 200 सालों में पहली बार हुआ है। पहली बार वर्ष 1825 में इसे महाराष्ट्र के ही नासिक में रहने वाले वेदमूर्ति नारायण शास्त्री देव ने किया था। रेखे इस मामले में तीसरे-चौथे स्थान पर हैं। 2,000 मंत्रों को 40 क्रमों में याद रखना एक चुनौती माना जाता है।
सफलता
प्रतिदिन 4 घंटे मंत्रों का शुद्ध उच्चारण
महेश रेखे ने 2 अक्टूबर, 2025 को साधना शुरू की थी, जो 30 नवंबर को पूरी हुई। इस दौरान रेखे ने रोजाना सुबह 8 बजे से लेकर दोपहर 12 बजे तक 4 घंटे पारायण यानी मंत्रों का शुद्ध उच्चारण किया। यह करीब 165 घंटे तक चला। 50 दिन तक रोजाना 4 घंटे तक एक ही आसन में बैठकर बिना रुके, बिना पानी पीए पूरी तरह त्रुटिरहित पारायण करना सफल हो गया। इसके बाद काशी में शोभायात्रा निकाली गई।
उपाधि
जगद्गुरु से मिली वेदमूर्ति की उपाधि
रेखे की साधना पूरी होने के बाद 1 दिसंबर को रथयात्रा चौराहे से महमूरगंज तक भव्य शोभायात्रा निकली गई। इसमें 500 से अधिक वैदिक छात्र शामिल हुए। उन्होंने शंख-नाद किया और ढोल-नगाड़े के साथ पुष्पवर्षा की। उन्हें शृंगेरी जगद्गुरु के आशीर्वाद से सोने का कंगन (मूल्य 5 लाख रुपये) और 1,01,116 रुपये नकद भेंट दिया गया। उन्हें शृंगेरी जगद्गुरु द्वारा आशीर्वाद के रूप में वेदमूर्ति की उपाधि दी गई है, जो उनकी वैदिक विद्वता के लिए मिली है।

















