देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था में एजुकेशन लोन एक अहम कड़ी है। यह उन लाखों विद्यार्थियों के सपनों का सहारा बनता है, जो आर्थिक सीमाओं के कारण अपनी प्रतिभा को आगे नहीं बढ़ा पाते। हाल के वर्षों में पब्लिक सेक्टर बैंकों (पीएसबी) के एजुकेशन लोन से जुड़े आंकड़े एक सकारात्मक तस्वीर पेश करते हैं। वित्त वर्ष 2020-21 में जहां एजुकेशन लोन का ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (एनपीए) 7 प्रतिशत था, वहीं वित्त वर्ष 2024-25 तक यह घटकर मात्र 2 प्रतिशत रह गया है। यह गिरावट न सिर्फ बैंकिंग सेक्टर के लिए राहत की खबर है, बल्कि शिक्षा वित्तपोषण प्रणाली में बढ़ते अनुशासन और परिपक्वता का संकेत भी देती है।
एनपीए में आई यह कमी बताती है कि एजुकेशन लोन की एसेट क्वालिटी में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। इसका अर्थ यह है कि अब छात्र समय पर ऋण चुकाने में सक्षम हो रहे हैं या बैंक लोन देने से पहले जोखिम का बेहतर आकलन कर रहे हैं। दोनों ही स्थितियां देश की अर्थव्यवस्था और मानव संसाधन विकास के लिए शुभ संकेत हैं। शिक्षा पर किया गया निवेश दीर्घकाल में सामाजिक और आर्थिक विकास की नींव बनता है, और यदि यह निवेश सुरक्षित हो, तो इसका लाभ कई गुना बढ़ जाता है।
हालांकि, इस सकारात्मक रुझान के बावजूद कुछ अहम सवाल बने रहते हैं। सबसे पहला सवाल पारदर्शिता से जुड़ा है। एजुकेशन लोन के मामले में राज्य-वार आंकड़े भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा संकलित नहीं किए जाते। इससे यह समझना कठिन हो जाता है कि किन राज्यों या क्षेत्रों में एजुकेशन लोन का प्रदर्शन बेहतर है और कहां सुधार की जरूरत है। यदि राज्य-वार या क्षेत्रीय डेटा उपलब्ध हो, तो नीति-निर्माताओं को लक्षित सुधारात्मक कदम उठाने में आसानी होगी।
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि विनियमित इकाइयों (आरई) के क्रेडिट से जुड़े कई मामले काफी हद तक अविनियमित हैं। एजुकेशन लोन से जुड़े फैसले मुख्य रूप से संबंधित बैंक या वित्तीय संस्था की बोर्ड द्वारा मंजूर की गई लोन पॉलिसी के दायरे में आते हैं। आरबीआई ने बैंकों को स्पष्ट सलाह दी है कि वे बोर्ड द्वारा स्वीकृत लोन पॉलिसी को लागू करें और रेगुलेशन के मार्गदर्शक सिद्धांतों के अनुसार क्रेडिट संबंधी निर्णय लें। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि लोन देने की प्रक्रिया पारदर्शी, न्यायसंगत और जोखिम-आधारित हो।
यहां यह समझना जरूरी है कि एजुकेशन लोन कोई सामान्य उपभोग ऋण नहीं है। यह भविष्य की आय पर आधारित होता है। एक छात्र आज लोन लेता है, लेकिन उसकी चुकौती क्षमता कई वर्षों बाद विकसित होती है, जब वह शिक्षा पूरी कर रोजगार पाता है। ऐसे में बैंकों को केवल वर्तमान आर्थिक स्थिति के बजाय छात्र की शैक्षणिक पृष्ठभूमि, संस्थान की गुणवत्ता और रोजगार की संभावनाओं को भी ध्यान में रखना चाहिए। एनपीए में आई कमी इस बात का संकेत है कि बैंक अब इस दिशा में अधिक सतर्क और व्यावहारिक हो रहे हैं।
साथ ही, छात्रों और अभिभावकों की वित्तीय जागरूकता भी बढ़ी है। पहले एजुकेशन लोन को लेकर यह धारणा थी कि यह एक “सॉफ्ट लोन” है, जिसकी चुकौती में ढील मिल सकती है। लेकिन अब यह समझ मजबूत हो रही है कि समय पर भुगतान न करने से क्रेडिट स्कोर प्रभावित होता है, जिसका असर भविष्य में घर, वाहन या अन्य जरूरतों के लिए लोन लेने पर पड़ सकता है। यही कारण है कि एनपीए में गिरावट देखने को मिल रही है।
फिर भी, चुनौतियां खत्म नहीं हुई हैं। निजी और अविनियमित संस्थानों द्वारा दिए जाने वाले शिक्षा ऋणों पर निगरानी की कमी चिंता का विषय है। यदि इन ऋणों की शर्तें पारदर्शी न हों या ब्याज दरें अत्यधिक हों, तो छात्रों पर अनावश्यक बोझ पड़ सकता है। इसलिए जरूरत है कि नियामक संस्थाएं एक संतुलित ढांचा तैयार करें, जिसमें छात्रों के हितों की रक्षा हो और वित्तीय संस्थानों की स्थिरता भी बनी रहे।
एजुकेशन लोन के एनपीए में आई कमी को सरकार, बैंकों और छात्रों तीनों की साझा सफलता के रूप में देखा जाना चाहिए। लेकिन इस सफलता को स्थायी बनाने के लिए डेटा पारदर्शिता, मजबूत नियमन और वित्तीय साक्षरता पर निरंतर काम करना होगा। यदि ऐसा किया गया, तो एजुकेशन लोन न सिर्फ छात्रों के सपनों को पंख देगा, बल्कि देश की विकास यात्रा को भी नई गति प्रदान करेगा।

















