दुनिया के लिए 2025 कोई साधारण कैलेंडर वर्ष नहीं रहा। यह साल जलवायु संकट की उस सच्चाई को सामने लाने वाला साबित हुआ, जिसे अब अनदेखा करना संभव नहीं है। Christian Aid की रिपोर्ट काउंटिंग द कॉस्ट 2025 के आंकड़े चौंकाने वाले हैं 120 अरब डॉलर से अधिक का वैश्विक नुकसान। लेकिन यह क्षति सिर्फ आर्थिक नहीं है, यह उजड़े घरों, बुझती जिंदगियों और टूटते सपनों की कहानी भी है।
रिपोर्ट बताती है कि 2025 में कम से कम दस बड़ी जलवायु आपदाएं ऐसी रहीं, जिनमें से प्रत्येक ने एक अरब डॉलर से अधिक का नुकसान किया। कैलिफ़ोर्निया की जंगलों की आग हो या दक्षिण व दक्षिण-पूर्व एशिया की बाढ़ और तूफान। हर घटना ने यह साबित किया कि प्रकृति अब चेतावनी नहीं, सीधा जवाब दे रही है। भारत और पाकिस्तान में आई बाढ़ ने हजारों लोगों की जान ली, जबकि आर्थिक नुकसान अरबों डॉलर में आंका गया। विडंबना यह है कि जिन देशों ने वैश्विक उत्सर्जन में सबसे कम योगदान दिया, वही इसकी सबसे भारी कीमत चुका रहे हैं।
इस संकट को “प्राकृतिक आपदा” कहना अब खुद को धोखा देना है। विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि यह दशकों से जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी का परिणाम है। यह एक ऐसा संकट है, जिसे इंसानों ने खुद गढ़ा है। अगर नीतियां नहीं बदलीं, तो इसकी तीव्रता और बढ़ेगी।
रिपोर्ट यह भी उजागर करती है कि अमीर देशों में नुकसान के आंकड़े ज्यादा दिखते हैं, क्योंकि वहां बीमा और संपत्ति दर्ज होती है। जबकि गरीब देशों में वास्तविक पीड़ा अक्सर आंकड़ों से बाहर रह जाती है। अफ्रीका और पश्चिम एशिया के कई हिस्सों में तबाही मची, पर वैश्विक चिंता वहां तक पूरी तरह नहीं पहुंच सकी।
2025 ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जलवायु संकट भविष्य की बात नहीं, बल्कि वर्तमान की कठोर सच्चाई है। अब सवाल यह नहीं कि हमने क्या खोया, बल्कि यह है कि क्या हम समय रहते साहसिक फैसले ले पाएंगे। अगर आज भी टालमटोल जारी रही, तो आने वाले वर्षों की कीमत कहीं ज्यादा भयावह होगी।

















