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साहित्यकारों को 21 और पत्रकारों को 5 लाख रुपये का पुरस्कार देंगे अभिषेक वर्मा

साहित्यकारों को 21 और पत्रकारों को 5 लाख रुपये का पुरस्कार देंगे अभिषेक वर्मा

रायपुर, 22 सितंबर 2025। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर पहुंचे शिवसेना (शिंदे गुट) के राष्ट्रीय समन्वयक डॉ. अभिषेक वर्मा ने बड़ी घोषणा की है। उन्होंने कहा कि साहित्यकारों और पत्रकारों का सम्मान हमारी परंपरा है। इसके लिए एक अलग ज्यूरी का गठन किया जाएगा। इस योजना के तहत साहित्यकारों को सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीकांत वर्मा के नाम पर 21 लाख रुपये की राशि प्रदान की जाएगी। पत्रकारों को 5 लाख रुपये की राशि से सम्मानित किया जाएगा। डॉ. अभिषेक वर्मा सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीकांत वर्मा के बेटे हैं। उन्होंने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता बरती जाएगी।

उन्होंने दावा किया है कि आगामी 2028 के आम चुनाव में शिवसेना (शिंदे) देशभर में एक मजबूत राष्ट्रीय पार्टी बनकर सामने आएगी। इसके लिए संगठन ने अभी से रणनीतिक तैयारियां शुरू कर दी हैं और देशभर में पार्टी को मजबूत बनाने का अभियान चलाया जा रहा है।

रविवार 21 सितंबर को राजधानी रायपुर में पत्रकारों से चर्चा करते हुए डॉ. वर्मा ने कहा कि आने वाले समय में पार्टी छत्तीसगढ़ और गोवा जैसे राज्यों पर विशेष ध्यान केंद्रित करेगी। इन राज्यों में विधानसभा और लोकसभा चुनावों के दौरान शिवसेना (शिंदे) का मुख्य लक्ष्य वोट प्रतिशत बढ़ाना और संगठनात्मक उपस्थिति को सशक्त करना होगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में पार्टी 20 सीटों की मांग करने की तैयारी कर रही है।

डॉ. वर्मा ने कहा कि शिवसेना (शिंदे) का उद्देश्य केवल राजनीति करना नहीं है, बल्कि आम जनता की आवाज बनना है। पार्टी की नीतियां विकास, पारदर्शिता और जनसरोकार पर आधारित हैं। उन्होंने संगठन का विजन राष्ट्र प्रथम, जनता सर्वोपरि बताते हुए कहा कि आने वाले समय में जनता देखेगी कि शिवसेना (शिंदे गुट) एक सशक्त राष्ट्रीय पार्टी के रूप में देशभर में अपनी पहचान बना चुकी होगी।

महाराष्ट्र में चल रहे भाषा विवाद पर पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए डॉ. वर्मा ने कहा कि भाषा को लेकर विवाद होना ही नहीं चाहिए। उन्होंने कहा, महाराष्ट्र में पहले मराठी और फिर हिंदी को स्थान मिलना चाहिए। अगर हिंदी को लेकर विवाद है तो सबसे पहले बॉलीवुड को बंद करना चाहिए, क्योंकि वहां हिंदी का ही बोलबाला है। जब वे ऐसा नहीं करते तो भाषा विवाद का कोई औचित्य ही नहीं बचता।