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एआई-आविष्कार और नैतिकता

अविनाश राय खन्ना

आज देश और दुनिया में एआई की चर्चा है। हमेशा से आविष्कार को प्रगति का जनक माना जाता रहा है। केवल भौतिकवादी जगत में ही नहीं, अपितु आध्यात्मिक संसार में भी योगी और तपस्वी संत अपने स्वयं अर्थात अपने अन्दर परमात्मा की खोज में ही लगे रहते हैं। अपने स्वयं की खोज से उनको दिव्यता का वह खजाना मिलता है, जिससे वे अपना ही नहीं, अपितु समूचे जगत के कल्याणकारक बन जाते हैं। ऐसे सच्चे तपस्वी सन्तों का आशीर्वाद ही समूचे राष्ट्र और समूचे विश्व के लिए सदैव मंगलकामना ही करता है।

भारत की धरती ईश्वर की खोज करने वाले ऐसे सन्तों का इसलिए भरपूर सम्मान करती है क्योंकि इनके खोज से उच्च स्तर की दिव्यता और आध्यात्मिक बुद्धिमत्ता पैदा हो जाती है। उस बुद्धिमत्ता से जो विवेक निकलता है, वह समूचे समाज का मार्गदर्शन करने के लिए पर्याप्त होता है। हमारा महान भारत इन्हीं आध्यात्मिक खोजों से आज तक विश्व गुरू के रूप में स्थापित रहा है।

आध्यात्मिक उच्च दिव्यता और भौतिकता के स्थान पर अब भौतिक संसार ने एक नई बुद्धिमत्ता की खोज कर ली है, जिसका नाम है कृत्रिम बुद्धिमत्ता अर्थात एआई यानि आर्टीफिशियल इन्टेलीजेंस। हम भारतवासी बुद्धि के पुजारी हैं। चलो, कृत्रिम ही सही, इस नई प्रणामी में बुद्धिमत्ता तो है न। इस कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रयोग हमें बड़ी सावधानी के साथ करना होगा। कृत्रिम होने के कारण हम इसके गलत निर्णयों के लिए किसी को दोषी नहीं ठहरा पाएंगे।

प्राचीनकाल के भारत का इतिहास तो आध्यात्मिक सिद्धियों से भरपूर है, जो प्राकृतिक बुद्धिमत्ता के चरम पर था। रामायण काल में सीता जी की भूमिका कई स्थलों पर कृत्रिम व्यक्तित्व के रूप में दिखाई देती है। महाभारत का संजय दूरदृष्टी से ही सारे युद्ध का वृतांत सुना सकता था। भारत के अनेकों योगी और तपस्वी संतो को कई प्रकार की सिद्धियां प्राप्त थी, जो आध्यात्मिक उच्चता के फलस्वरूप आज के एआई से कई गुना सकारात्मक और श्रेष्ठ थी, क्योंकि उन सब सिद्धियों की पृष्ठभूमि आध्यात्मिक और संवेदनात्मक थी।

वह कृत्रिम नहीं बल्कि प्राकृतिक और उच्चकोटि की आध्यात्मिक बुद्धिमत्ता थी। उनसे कभी विनाशकारी कार्य नहीं किया गया। लेकिन आधुनिक युग का एआई विज्ञान जब जब संवेदनहीन होगा तो यह विनाशकारी ही सिद्ध होगा। यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता स्वास्थ्य सेवाओं में कुछ ही क्षणों के अन्दर हमारे शरीर के अनेक परीक्षण और साथ ही साथ हमारे सामने उनके उपाय भी प्रस्तुत कर देगी। अगर यह प्रक्रिया सफल रही तो स्वाभाविक रूप से सलाह मशविरा के हद तक डाक्टरों की आवश्यकता काफी कम हो जाएगी।

डाक्टरों की आवश्यकता केवल आपरेशन आदि तक ही सीमित रह जाएगी, परन्तु इस पर अधिक निर्भरता के बाद जब कभी उपाय के रूप में गलत परिणाम बताए गए तो उसके लिए जिम्मेदार किसको ठहरायेंगे? जिम्मेदारी तो छोड़ो, तब तक तो रोगी का बेड़ा गर्क हो चुका होगा।

कृषि में ड्रोन किसानों को मौसम, भूमि की गुणवत्ता आदि अनेक तकनीकी विषयों पर यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता भरपूर जानकारी देगी। शिक्षा के क्षेत्र में बच्चों के लिए सभी विषयों पर भरपूर जानकारियाँ मिलेंगी। उक्त जानकारियों को विवेक के साथ प्रयोग करना केवल प्राकृतिक गुरू के सान्निध्य में ही सम्भव हो सकता है। मनोरंजन उद्योग और व्यापार में ए0 आई0 का प्रयोग निःसन्देह नई-नई मशीनों और तकनीक का विकास करेगा।

अब इस एआई के बारे में यह विचार करना है कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर इसका संचालन कौन कर रहा है? एपल, माईक्रोसाॅफ्ट, एमाजाॅन, मीटा और गूगल जैसी कम्पनियों ने सारे संसार के तकनीकी विकास को अपने तक ही केन्द्रित रखा हुआ है। अतः स्वाभाविक है कि सारे विश्व में अगर एआई रूपी नई अर्थव्यवस्था प्रबलता से विकसित होती है तो स्वाभाविक रूप से लगभग एक दर्जन कम्पनियों एवं उनके देशों को ही इसका लाभ मिलेगा।

इसका अभिप्राय है कि एआई नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था विकसित करेगा, लेकिन उसके साथ-साथ कमजोर और विकासशील देशों की हर प्रकार की अर्थव्यवस्था में अनेकों आयामों को कमजोर कर देगा। बेरोजगारी बहुत तेज गति से बढ़ेगी, जिसके कारण असमानता बढ़ेगी। एआई के द्वारा समाज में दरार उत्पन्न होगी, जो मध्यवर्गीय परिवार तक को प्रभावित करेगी। एआई की अगली हानि यह है कि इसमें सारे संसार के करोड़ों लोगों की जानकारियाँ प्रयोग की जाएंगी।

आज जब भी हम किसी एप को डाउनलोड करते हैं तो वह हमारी व्यक्तिगत जानकारियां, फोटो और वार्तालापों आदि की मांग करता है और हम एप को डाउनलोड करने की जल्दी में उसे सब अनुमति देते जाते हैं। इस प्रकार हमारी छोटी-छोटी व्यक्तिगत जानकारियों को ये बड़ी-बड़ी तकनीकी कम्पनियाँ अपने विकास का आधार बना लेती हैं।

इस प्रकार सारे संसार की व्यक्तिगत जानकारियां तथा कमियां गलत जानकारियों का समावेश होने से इस बात की पूरी सम्भावना बन जाएगी कि एआई के माध्यम से गलत सूचनाएं उपलब्ध करवा कर लोगों की जेब लूटी जाए। किसी भी फोन को हैक करके बैंकों से धन निकालना तो सुना था परन्तु अब एआई से किसी भी जानकार की नकली आवाज बना कर बात करना और धन प्राप्त करना भी संभव हो गया है। ऐसी घटनाओं के बाद तो सगे संबंधियों पर भी विश्वास खत्म हो जाएगा।

भारत में एक कम्पीटीशन कमीशन स्थापित है, जो व्यापारियों में अनैतिक प्रतिस्पर्धा को नियंत्रण में रखता है। यह आयोग प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 के अन्तर्गत स्थापित किया गया था। इसी प्रकार आज यह प्रबल आवश्यकता है कि भारत डिजीटल प्रतिस्पर्धा के लिए भी समुचित कानून अवश्य बनाए। इसी प्रकार भारत को अपनी तकनीकी कम्पनियों की स्थापना और विकास पर भी ध्यान देना होगा। इसके साथ-साथ हम यह भी विचार कर सकते हैं कि जो भी अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनियां अपनी सेवाएं भारत के लोगों के बीच में पहुंचाएं, उन पर डिजिटल टैक्स लगाया जाए, जिससे भारत की अर्थव्यवस्था बेरोजगारी की सम्भावना का डटकर मुकाबला कर पाए।

हमें अधिक से अधिक भारतीय उद्योगों को विकसित करना चाहिए। यह तभी सम्भव है कि जब भारत के लोग स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग प्रारम्भ करें। इसमें कोई सन्देह नहीं कि एआई सारे संसार में एक बहुत बड़ी क्रान्ति पैदा करने के लिए तैयार हो रही है। लेकिन यह क्रान्ति आर्थिक और बौद्धिक रूप से दिवालियापन का कारण न बन जाए, इसकी जिम्मेदारी सरकार से अधिक भारत के प्रत्येक नागरिक को स्वीकार करनी चाहिए।

(लेखक पूर्व सांसद हैं।)