लखनऊ, 8 सितंबर 2025। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में चल रहे राष्ट्रीय पुस्तक मेला-2025 में रविवार 7 सितंबर कैकेयी के राम पुस्तक का विमोचन किया गया। इस पुस्तक का लेखन डॉ. रहीस सिंह ने किया। डॉ. रहीस सिंह वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं। इस पुस्तक का प्रकाशन वाणी प्रकाशन ने किया है।
विमोचन समारोह में पुस्तक पर परिचर्चा भी की गयी। मंच पर अयोध्या के ख्यातिलब्ध संत आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण के साथ ही लखनऊ के प्रमुख समाचार पत्रों के संपादकों के साथ लेखक की उपस्थिति ने कार्यक्रम को ऐतिहासिक बना दिया।
नवभारत टाइम्स के राज्य संपादक सुधीर मिश्र, दैनिक जागरण के राज्य संपादक आशुतोष शुक्ल, टाइम्स ऑफ इंडिया के राज्य संपादक प्रवीण कुमार, अमर उजाला के राज्य संपादक विजय त्रिपाठी, पायनियर के संपादक डॉ. देवेन्द्र सिंह, अमर उजाला के सुधीर कुमार सिंह, मुख्यमंत्री के ओएसडी संजीव सिंह, डॉ. सरवन बघेल, वरिष्ठ पत्रकार राजीव श्रीवास्तव, नवल कांत सिन्हा, प्रेम शंकर मिश्रा, अजीत खरे, सचिन मुद्गल, सौरभ सोमवंशी, विनीत विसेन समेत तमाम प्रतिष्ठित पत्रकारों की मौजूदगी रही।
कैकेयी के राम पुस्तक का सार
राम कैकेयी से कहते हैं, यदि आपने मुझे वन जाने का आदेश पिताश्री के माध्यम से न दिया होता तो मुझे पता ही नहीं चलता कि इस राष्ट्र की रक्षा सैनिक ही नहीं आटविक भी करते हैं, योद्धा ही नहीं ऋृषि भी करते हैं, अंतेवासी ही नहीं वनवासी भी करते हैं, इसके समृद्ध और सुदीर्घ होने की कामना केवल राजसिंहासन पर विराजे हुए राजा ही नहीं करते हैं अपितु उसे देश की सीमाओं के भीतर रहने वाली वन्य जातियां और पशु-पक्षी भी करते हैं। बस वे कभी अपना भाग आपसे मांगने नहीं आते, वे तो परमार्थ को ही अपना पुरुषार्थ समझते हैं। यह संवाद पुस्तक ‘कैकेयी के राम’ का एक अंश है।
विश्व मानव प्रज्ञा में शायद ही कोई नर या नारायण एक पात्र के रूप में इतना लिखा, पढ़ा, समझा और व्याख्यायित हुआ हो जितना राम है। लेकिन, राम की चेतना, उसके लौकिक पक्ष को समझने के लिए लोकदृष्टि आवश्यक है जो मनुष्य के रूप में उन्हें परखने, विवेचित करते समय हिचक न रखे। ‘कैकेयी के राम’ की यात्रा इसी दिशा में है।
डॉ. रहीस सिंह इस पुस्तक में कैकेयी की दृष्टि व अवदान को राम और उनके मार्गदर्शक वशिष्ठ के माध्यम से भी रेखांकित करते हैं। राम की नर से नारायण और मर्यादा पुरुषोत्तम की यात्रा कितने सूक्ष्म व कठोर मूल्यांकन का परिणाम उसको उन्होंने वशिष्ठ की इस चिंता में रेखांकित किया है, ‘राम! रावण से युद्ध करते समय आपको क्रोध तो नहीं आया था…यह प्रतिशोध का परिणाम तो नहीं था? क्योंकि जहां क्रोध होता है, वहां तम होता है और जहां तम होता है वहां मिथ्या और मृषा तत्व प्रभावशाली हो जाता है।
.. ये तत्व अयोध्या के चक्रवर्ती में उपस्थित हुए तो फिर इस राष्ट्र को लेकर मेरी कल्पना अधूरी रह जाएगी। शक्ति संग सहजता और विजय संग विनम्रता का समुच्चय वह रावण के वध के बाद विभीषण संग संवाद में खींचते हैं, ‘विभीषण! शत्रुता प्रभाव में परिलक्षित होती है, अभाव में नहीं। आज रावण प्रभावहीन है, निस्तेज है, निष्क्रिय है, अहंकार से रिक्त एक शून्य के समान है और शून्य से शत्रुता कैसी।
डॉ. रहीस सिंह की यह कृति ऐसे अनेक रोचक संवाद, दृष्टि और मीमासांओं से भरी है जो राम को लोक के लिए और सहज और सर्वग्राही बनाती है, आचरण का भाग बनने के लिए प्रेरित करती है। राम की आदर्श यात्रा की पृष्ठभूमि प्रचलित धारणा से इतर अभिशाप रूपी ‘वरदान’ से कैसे तैयार हुई, इसे समझने की आवश्यकता है।
साभार– डॉ. अतुल मोहन सिंह के Facebook वाल से।














