Join US

छत्तीसगढ़ की माटी से निकला शब्दों का साधक

By
Published On:
Follow Us

रमेश पाण्डेय

छत्तीसगढ़ आज अपने साहित्यिक गौरव को सलाम कर रहा है। यह अवसर केवल सम्मान का नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य के संवेदनशील और मौलिक स्वर को मान्यता देने का है। राजनांदगांव में जन्मे प्रसिद्ध कवि एवं कथाकार विनोद कुमार शुक्ल को 59वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया जाना, हिंदी साहित्य के लिए एक ऐतिहासिक क्षण है।

उनकी लेखनी ने न केवल हिंदी भाषा को समृद्ध किया है, बल्कि समाज की गहराइयों को भी संवेदनशीलता से छुआ है। विनोद कुमार शुक्ल की रचनाएं शब्दों की एक अनूठी दुनिया रचती हैं, जहां भाषा सहज होते हुए भी गूढ़ बन जाती है। वह आदमी चला गया गरम कोट पहनकर विचार की तरह केवल एक कविता नहीं, बल्कि विचारों की यात्रा का प्रतीक है। उनकी कविताएं और कहानियां न केवल जीवन की जटिलताओं को उकेरती हैं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं को भी सजीव बनाती हैं।

नौकर की कमीज उपन्यास ने साहित्य जगत में उनकी एक अमिट पहचान बनाई। विनोद कुमार शुक्ल ने सातवें दशक में लेखन की शुरुआत की और अपनी अलग शैली से हिंदी साहित्य में विशेष स्थान बनाया। उनकी पहली काव्य पुस्तिका लगभग जय हिंद 1971 में अशोक वाजपेयी द्वारा संपादित पहचान श्रृंखला में प्रकाशित हुई थी।

इसके बाद नौकर की कमीज (1981) ने उन्हें साहित्य में स्थापित कर दिया। इस उपन्यास पर एक फिल्म भी बनी, जिसने इसे एक व्यापक पहचान दिलाई। उनकी लेखनी केवल साहित्यिक प्रयोग तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने समाज और विचारधारा के मूल्यों को भी सशक्त अभिव्यक्ति दी। उनके दीवार में खिड़की रहा करती थी उपन्यास ने 1999 में साहित्य अकादमी पुरस्कार जीता। इस उपन्यास ने हिंदी कथा साहित्य में एक नए आयाम को स्थापित किया।

उनके विचारों की गहराई और समाज के प्रति उनकी संवेदनशील दृष्टि उनके लेखन में स्पष्ट झलकती है। ज्ञानपीठ पुरस्कार, भारतीय साहित्य का सर्वोच्च सम्मान है। जब किसी साहित्यकार को यह सम्मान दिया जाता है, तो यह केवल उसकी लेखनी का नहीं, बल्कि उसकी समाज और भाषा के प्रति योगदान का भी मूल्यांकन होता है।

88 वर्षीय श्री शुक्ल को यह पुरस्कार आजन्म लेखन और उनके साहित्यिक योगदान के लिए दिया जा रहा है। इस पुरस्कार के अंतर्गत उन्हें 11 लाख रुपये की नकद राशि, स्मृति चिह्न, प्रशस्ति पत्र तथा वाग्देवी की प्रतिमा प्रदान की जाएगी। राजनांदगांव छत्तीसगढ़ की मिट्टी में साहित्य की गहरी जड़ें हैं। यह वही भूमि है, जहां पद्मभूषण पं. माधवराव सप्रे, गजानन माधव मुक्तिबोध जैसे दिग्गज साहित्यकारों ने हिंदी साहित्य को नई ऊंचाइयां दीं।

विनोद कुमार शुक्ल का जन्म 1 जनवरी 1937 को यहीं हुआ। उन्होंने जबलपुर से कृषि विज्ञान में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की और बाद में रायपुर में अध्यापन कार्य से जुड़े। उनकी जड़ें छत्तीसगढ़ से जुड़ी रहीं, लेकिन उनका लेखन समूचे हिंदी साहित्य को प्रभावित करता रहा। विनोद कुमार शुक्ल की शैली अन्य साहित्यकारों से अलग है।

उनके लेखन में निहित सादगी, गहराई और सूक्ष्म दृष्टिकोण उन्हें विशेष बनाता है। उनकी रचनाएं जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों को इतना व्यापक बना देती हैं कि वे सामान्य होते हुए भी असामान्य लगते हैं। उनकी भाषा संवेदनशील और सहज होते हुए भी अत्यंत प्रभावशाली होती है।

उनकी कविताओं में प्रकृति, प्रेम, मानवीय संबंधों और समाज के अंतर्विरोधों की झलक मिलती है। उनकी कहानियां यथार्थ से प्रेरित होते हुए भी कल्पना की दुनिया में गहराई से प्रवेश करती हैं। उनके पात्र साधारण होते हुए भी असाधारण बन जाते हैं। उनकी लेखनी हमें गहरी मानवीय संवेदनाओं से जोड़ती है। उनके पात्र हमारे आसपास के लोग ही होते हैं, लेकिन वे समाज की सच्चाई को इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि पाठक उनमें खुद को खोजने लगता है।

‘नौकर की कमीज’ उपन्यास में उन्होंने सामाजिक आर्थिक विषमता और व्यक्ति की पहचान की तलाश को बड़े ही सहज और गहरे तरीके से प्रस्तुत किया है। श्री शुक्ल के व्यक्तित्व में विनम्रता और गंभीरता का एक सुंदर संतुलन देखने को मिलता है। वह साहित्य को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं मानते, बल्कि इसे जीवन जीने की कला भी समझते हैं। उनके लेखन में कोई बनावटीपन नहीं, कोई दिखावा नहीं-बस एक सच्ची, निश्छल और गहन साहित्यिक संवेदना है।

विनोद कुमार शुक्ल का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करना, केवल उनका सम्मान नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य की एक पूरी धारा को मान्यता देना है। यह साहित्य के उन पक्षों का सम्मान है, जो बाजारवाद और दिखावे से परे हैं। यह उन शब्दों की स्वीकृति है, जो जीवन की गहराइयों से आते हैं और पाठकों के हृदय तक पहुंचते हैं। विनोद कुमार शुक्ल की साहित्यिक यात्रा हम सभी के लिए प्रेरणादायक है।

यह साबित करता है कि श्रेष्ठता केवल प्रसिद्धि से नहीं, बल्कि निरंतर साधना और मौलिकता से आती है। उनका लेखन हमें यह सिखाता है कि शब्दों में शक्ति होती है, अगर वे सच्चे हों, अगर वे जीवन के वास्तविक अनुभवों से निकले हों। आज, जब हम साहित्य के इस महान साधक को सम्मानित होते देख रहे हैं, तो यह केवल एक लेखक की जीत नहीं, बल्कि साहित्य की आत्मा की विजय है। छत्तीसगढ़ आज गर्वित है, हिंदी साहित्य आज समृद्ध है, और हम सभी इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बनकर आनंदित हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

Ramesh Pandey

मेरा नाम रमेश पाण्डेय है। पत्रकारिता मेरा मिशन भी है और प्रोफेशन भी। सत्य और तथ्य पर आधारित सही खबरें आप तक पहुंचाना मेरा कर्तव्य है। आप हमारी खबरों को पढ़ें और सुझाव भी दें।

For Feedback - editorasr24@gmail.com
Join Our WhatsApp Channel

Related News