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बानू मुश्ताक ने जीता 2025 का अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार

भारतीय लेखिका बानू मुश्ताक ने जीता 2025 का अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार

नई दिल्ली, 21 मई 2025। भारतीय लेखिका बानू मुश्ताक को 2025 का अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार प्रदान किया गया है। यह भारतीय साहित्य के लिए एक गौरवपूर्ण क्षण है। कर्नाटक की रहने वाली लेखिका बानू मुश्ताक सामाजिक कार्यकर्ता और वकील भी हैं। उनकी लघु कहानी संग्रह ‘हार्ट लैंप’ के लिए उन्हें प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार 2025 प्रदान किया गया है। प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार 2025 जीतकर उन्होंने इतिहास रच दिया है।

यह पहली बार है जब कन्नड़ भाषा में लिखी गई किसी कृति को यह सम्मान प्राप्त हुआ है। लंदन के टेट मॉडर्न में 20 मई 2025 को आयोजित भव्य समारोह में 77 वर्षीय बानू मुश्ताक ने अपनी अनुवादक दीपा भास्थी के साथ यह पुरस्कार ग्रहण किया। इस जीत के साथ उन्हें और उनकी अनुवादक को संयुक्त रूप से £50,000 (लगभग 58 लाख रुपये) की पुरस्कार राशि प्रदान की गई, जो लेखक और अनुवादक के बीच समान रूप से साझा की जाती है।

हार्ट लैंप के बारे में

हार्ट लैंप 1990 से 2023 के बीच लिखी गई 12 लघु कहानियों का संग्रह है, जो दक्षिण भारत, विशेष रूप से कर्नाटक के सामाजिक और पारिवारिक जीवन को जीवंत रूप से चित्रित करता है। यह कृति अपनी ‘मजाकिया, जीवंत, बोलचाल, मार्मिक और कटु’ शैली के लिए जानी गई है, जिसने निर्णायकों का ध्यान आकर्षित किया। इस वर्ष 154 प्रविष्टियों में से 6 कृतियों को अंतिम सूची में चुना गया था, और ‘हार्ट लैंप’ ने अपनी अनूठी कहानी कहने की शैली के बल पर यह प्रतिष्ठित पुरस्कार हासिल किया।

इस संग्रह को स्वतंत्र प्रकाशन गृह ‘एंड अदर स्टोरीज’ ने प्रकाशित किया है, और इसका अंग्रेजी अनुवाद दीपा भास्थी ने किया है, जिनकी अनुवाद कला ने कन्नड़ साहित्य को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।पुरस्कार समारोह में अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार 2025 के जजों के अध्यक्ष मैक्स पोर्टर ने कहा, यह सूची अनुवादित साहित्य के माध्यम से मानवता के बारे में गहन और आश्चर्यजनक संवादों को प्रोत्साहित करने का उत्सव है। ‘हार्ट लैंप’ ऐसी कहानियां प्रस्तुत करती है जो सामान्य जीवन को असाधारण तरीके से दर्शाती हैं।

जानें बानू मुश्ताक के बारे में

1948 में कर्नाटक के हासन में एक मध्यमवर्गीय मुस्लिम परिवार में जन्मी बानू मुश्ताक ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा उर्दू माध्यम से प्राप्त की। उनके पिता, जो मैसूर में सरकारी स्वास्थ्य निरीक्षक थे, ने उन्हें आठ वर्ष की आयु में कन्नड़-माध्यम कॉन्वेंट स्कूल में दाखिल कराया। स्कूल के दिनों में ही उन्होंने अपनी पहली लघु कहानी लिखी थी, जो उनकी साहित्यिक यात्रा की शुरुआत थी। 1970 और 1980 के दशक में, बानू ने कर्नाटक के ‘बंदाया साहित्य’ (विद्रोही साहित्य) आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया, जो जाति, वर्ग और लिंग भेदभाव के खिलाफ साहित्यिक विरोध का एक प्रगतिशील मंच था।

महिला केंद्रित साहित्य के लिए प्रसिद्ध बानू मुश्ताक ने कई पुस्तकें लिखी हैं और कर्नाटक साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई सम्मान प्राप्त किए हैं। उन्होंने दाना चिंतामणि अत्तिमब्बे पुरस्कार भी जीता है। एक वकील और कार्यकर्ता के रूप में, उन्होंने महिलाओं के अधिकारों और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई है। मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश जैसे मुद्दों पर उनकी मुखरता के कारण उन्हें सामाजिक बहिष्कार का भी सामना करना पड़ा, लेकिन उनकी दृढ़ता ने उन्हें साहित्य और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में एक प्रेरणा बनाया।

हार्ट लैंप का साहित्यिक महत्व

हार्ट लैंप की कहानियां दक्षिण भारत की पितृसत्तात्मक समुदायों में रहने वाली महिलाओं और लड़कियों के रोजमर्रा के जीवन को उजागर करती हैं। ये कहानियां सामाजिक ताने-बाने में व्याप्त संघर्षों, आशाओं और सपनों को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करती हैं। बानू ने स्वयं कहा, यह पुस्तक इस विश्वास से जन्मी है कि कोई भी कहानी कभी छोटी नहीं होती। मानव अनुभव के ताने-बाने में हर धागा समग्रता का भार रखता है। उनकी कहानियां न केवल व्यक्तिगत अनुभवों को दर्शाती हैं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों को भी रेखांकित करती हैं।

इस संग्रह की अनुवादक दीपा भास्थी ने कन्नड़ साहित्य को वैश्विक मंच पर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी अनुवाद शैली ने मूल कृति की भावनाओं और बारीकियों को बरकरार रखते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय पाठकों के लिए सुलभ बनाया। यह पहली बार है जब किसी लघु कहानी संग्रह को अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार मिला है, जो इस कृति की विशिष्टता को और उजागर करता है।

2022 में गीतांजलि श्री को मिला था बुकर पुरस्कार

बानू मुश्ताक दूसरी भारतीय लेखिका हैं जिन्हें अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार मिला है। इससे पहले 2022 में गीतांजलि श्री को उनके हिंदी उपन्यास ‘रेत समाधि’ के लिए यह पुरस्कार मिला था, जिसका अनुवाद डेजी रॉकवेल ने किया था। बानू की जीत ने न केवल कन्नड़ साहित्य, बल्कि भारतीय क्षेत्रीय साहित्य को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाई है।

बानू मुश्ताक की यह उपलब्धि केवल साहित्यिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। उनकी कहानियाँ उन महिलाओं की आवाज बनती हैं जो पितृसत्तात्मक समाज में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती हैं। उनके लेखन में सामाजिक सुधार, लैंगिक समानता और मानवता के प्रति गहरी प्रतिबद्धता झलकती है। उनकी यह जीत उन सभी लेखकों और कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा है जो समाज के हाशिए पर रहने वालों की कहानियों को सामने लाने के लिए प्रयासरत हैं।