रमेश पाण्डेय
दुनिया जिस जलवायु संकट का सामना कर रही है, उसका असर अब सिर्फ़ पर्यावरण या तापमान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सीधे तौर पर मानव स्वास्थ्य को चुनौती दे रहा है। बढ़ती गर्मी, बदलता मौसम और चरमराते स्वास्थ्य तंत्र अब मिलकर एक नए वैश्विक संकट की ओर संकेत कर रहे हैं। जर्मन थिंक-टैंक adelphi की नई रिपोर्ट The Nexus of Adaptation and Health Finance ने इस खतरे की गंभीरता को उजागर करते हुए बताया है कि अगर हालात ऐसे ही रहे, तो 2050 तक जलवायु परिवर्तन से दुनिया भर में करीब 1.56 करोड़ लोगों की जान जा सकती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि क्लाइमेट चेंज अब सिर्फ़ पर्यावरणीय चुनौती नहीं, बल्कि मानव शरीर के अस्तित्व से जुड़ा मसला बन चुका है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से, जिस समय गर्मी और बीमारियां तेज़ी से बढ़ रही हैं, उस समय स्वास्थ्य क्षेत्र को मिलने वाली वैश्विक फंडिंग बेहद सीमित है। वर्ष 2004 से अब तक जलवायु अनुकूलन फाइनेंस का मात्र 0.5 प्रतिशत हिस्सा स्वास्थ्य क्षेत्र तक पहुंचा है। यह रकम कुल मिलाकर सिर्फ 173 मिलियन डॉलर है, जो कुल अनुकूलन फाइनेंस का महज़ दो प्रतिशत है।
adelphi की यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब दुनिया के तमाम देश जलवायु परिवर्तन से मुकाबले के लिए अपने National Adaptation Plans (NAPs) बना रहे हैं। रिपोर्ट ने 2025 तक जमा हुए 67 NAPs और उनके स्वास्थ्य हिस्सों (HNAPs) का विश्लेषण किया है। इसमें पाया गया कि 87 प्रतिशत योजनाओं में स्वास्थ्य प्राथमिकताएं तो शामिल हैं, लेकिन सिर्फ 39 प्रतिशत में ही हेल्थ के लिए अलग बजट तय है। कुल 2.54 बिलियन डॉलर की अनुमानित ज़रूरत में से अब तक मात्र 0.1 प्रतिशत फंडिंग ही हेल्थ अडॉप्टेशन के लिए जारी हुई है।
रिपोर्ट बताती है कि दक्षिण एशिया और सब-सहारा अफ्रीका जैसे क्षेत्र सबसे अधिक संवेदनशील हैं। ये इलाके पहले से ही हीटवेव, संक्रमण, मानसिक तनाव और ढहते अस्पताल तंत्र जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों ने जलवायु-तैयार स्वास्थ्य ढांचे की ठोस योजनाएँ तैयार की हैं, लेकिन फंडिंग की कमी के कारण वे लागू नहीं हो पा रही हैं। बांग्लादेश के Center for Participatory Research and Development के प्रमुख एम.डी. शम्सुद्दोहा ने कहा कि हमारे जैसे देशों में क्लाइमेट संकट का मतलब है- नई बीमारियां, बढ़ता हीट स्ट्रेस, मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर और तबाह होती ज़िंदगियां। जब तक वैश्विक हेल्थ फाइनेंस में निवेश नहीं बढ़ेगा, हमारी अनुकूलन योजनाएँ सिर्फ़ कागज़ पर रह जाएंगी।
रिपोर्ट की सह-लेखिका मैथिल्ड विल्केन्स ने इस खतरे को और स्पष्ट करते हुए कहा, क्लाइमेट संकट अब हमारी सेहत के लिए सीधा खतरा बन चुका है। हमें यह समझना होगा कि क्लाइमेट फाइनेंस ही हेल्थ फाइनेंस है। जब तक जलवायु फंडिंग को देशों की स्वास्थ्य प्राथमिकताओं से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक मज़बूत स्वास्थ्य तंत्र बनाना असंभव है।
रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक फाइनेंस का लगभग आधा हिस्सा Least Developed Countries तक तो पहुंचा है, लेकिन उनमें से भी सिर्फ 4 प्रतिशत ही उन क्षेत्रों में गया जो संघर्ष या अस्थिरता से जूझ रहे हैं। यही वे क्षेत्र हैं जहां स्वास्थ्य प्रणालियां सबसे नाज़ुक हैं और जलवायु परिवर्तन के असर सबसे अधिक दिख रहे हैं। दक्षिण एशिया की स्थिति तो और चिंताजनक है, क्योंकि यहां अब तक किसी भी देश-विशेष हेल्थ अडॉप्टेशन प्रोजेक्ट को फंडिंग नहीं मिली, जबकि यह क्षेत्र भविष्य के कुल जलवायु-प्रेरित स्वास्थ्य प्रभावों का 18 प्रतिशत झेलने वाला है।
रिपोर्ट यह भी इंगित करती है कि जलवायु परिवर्तन से न केवल तापमान में वृद्धि हो रही है बल्कि संक्रमणजन्य रोग, कुपोषण, मानसिक विकार और हृदय रोग जैसे गैर-संक्रमणजन्य रोग भी तेज़ी से बढ़ रहे हैं। कई देशों में स्वास्थ्य तंत्र पहले से ही कोविड-19 के प्रभाव से उबरने की कोशिश कर रहे हैं, और ऐसे में जलवायु संकट इन व्यवस्थाओं पर अतिरिक्त बोझ डाल रहा है।
adelphi की रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब ब्राज़ील के बेलें शहर में COP30 की बैठक चल रही है, जिसे Adaptation COP कहा जा रहा है। इस बार ब्राज़ील की प्रेसीडेंसी Belém Health Action Plan पेश करने जा रही है, जिसका उद्देश्य जलवायु और स्वास्थ्य नीतियों को एकीकृत करना है। उम्मीद की जा रही है कि यह योजना जलवायु फाइनेंस के प्रवाह को स्वास्थ्य क्षेत्र तक पहुँचाने में एक ठोस रूपरेखा देगी।
रिपोर्ट में पांच अहम सुझाव दिए गए हैं, जिनमें हेल्थ और क्लाइमेट निवेश प्राथमिकताओं का संरेखण, अंतरराष्ट्रीय फाइनेंस तक आसान पहुंच, ऋण के बजाय ग्रांट-आधारित फाइनेंस की बढ़ोतरी, विभिन्न सेक्टरों के बीच बेहतर तालमेल और COP30 में Global Goal on Adaptation के लिए महत्वाकांक्षी संकेतक तय करना शामिल है।
यह रिपोर्ट नीति-निर्माताओं के लिए एक स्पष्ट संदेश देती है कि अगर स्वास्थ्य को जलवायु नीति के केंद्र में नहीं रखा गया, तो जलवायु संकट का वास्तविक बोझ लोगों की जानों पर पड़ेगा। तापमान का बढ़ना अब आंकड़ों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह अस्पतालों की भीड़, दवाओं की कमी और मानसिक स्वास्थ्य संकट के रूप में सामने आ रहा है।
दुनिया इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां स्वास्थ्य और जलवायु का रिश्ता केवल वैज्ञानिक नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है। अगर वैश्विक क्लाइमेट फाइनेंस को स्वास्थ्य फाइनेंस में नहीं बदला गया, तो आने वाले दशकों में अस्पतालों की इमारतें तो खड़ी रहेंगी, लेकिन उनके भीतर इलाज की उम्मीदें ढह जाएँगी। ब्राज़ील में होने वाला COP30 अब केवल नेताओं की बातचीत का मंच नहीं, बल्कि यह तय करेगा कि मानवता अपनी धरती के साथ-साथ अपनी सेहत को भी बचा पाएगी या नहीं।

















