रमेश पाण्डेय
दुनिया आज जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी चुनौती के दौर से गुजर रही है। पृथ्वी का तापमान पहले ही औद्योगिक युग से 1.2°C तक बढ़ चुका है, और वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि अगर यह वृद्धि 1.5°C से ऊपर जाती है तो धरती पर होने वाले बदलाव अपूरणीय होंगे। इसी संदर्भ में, क्लाइमेट एनालिटिक्स की नई रिपोर्ट Rescuing 1.5°C ने उम्मीद की एक नई किरण दिखाई है। रिपोर्ट के अनुसार, भले ही पिछले कुछ सालों में जलवायु कार्रवाई धीमी रही हो, लेकिन अगर अभी से निर्णायक कदम उठाए जाएं, तो सदी के अंत तक वैश्विक तापमान को दोबारा 1.5°C से नीचे लाया जा सकता है।
रिपोर्ट बताती है कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए देशों को अपने जलवायु लक्ष्यों को अब तक के सबसे ऊँचे स्तर तक ले जाना होगा। इसमें ऊर्जा उत्पादन, परिवहन, उद्योग, और कृषि जैसे प्रमुख क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर परिवर्तन की जरूरत होगी।
रिपोर्ट के Highest Possible Ambition (HPA) परिदृश्य के अनुसार, अगर दुनिया अब तुरंत कदम उठाती है, तो तापमान 2050 से पहले ही स्थिर हो सकता है। इसमें अनुमान है कि वैश्विक तापमान लगभग 1.7°C पर चरम पर पहुँचेगा और 2100 तक यह घटकर 1.2°C तक आ सकता है। इसका अर्थ है कि 1.5°C का लक्ष्य पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है, बल्कि इसे हासिल करने का रास्ता अभी भी खुला है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक CO₂ उत्सर्जन (Carbon Emission) को 2045 तक नेट-ज़ीरो पर लाना अनिवार्य है। इसका मतलब यह है कि जितनी मात्रा में कार्बन वातावरण में छोड़ी जाएगी, उतनी ही मात्रा को हटाया भी जाएगा। इसके अलावा, संपूर्ण ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को 2060 के दशक तक नेट-ज़ीरो स्तर पर पहुंचाना होगा।
यह भी अनुमान लगाया गया है कि 2050 तक दुनिया की दो-तिहाई ऊर्जा मांग बिजली के माध्यम से पूरी की जा सकती है। इसका अर्थ है कि ऊर्जा उत्पादन में जीवाश्म ईंधनों की जगह अक्षय ऊर्जा स्रोतों जैसे सौर, पवन और जल ऊर्जा को प्राथमिकता देनी होगी।
क्लाइमेट एनालिटिक्स के सीईओ बिल हेयर ने कहा, 1.5°C से ऊपर जाना केवल एक वैज्ञानिक चुनौती नहीं, बल्कि एक राजनीतिक असफलता भी है। इससे ऐसे टर्निंग पॉइंट्स और नुकसान हो सकते हैं, जिन्हें टाला जा सकता था। लेकिन यह रिपोर्ट दिखाती है कि हम अभी भी हालात को पलट सकते हैं। अगर हम इस ओवरशूट की अवधि को सीमित रखें, तो अपूरणीय जलवायु क्षति से बचा जा सकता है।
डॉ. नील ग्रांट, जो क्लाइमेट एनालिटिक्स में वरिष्ठ विशेषज्ञ हैं, उन्होंने भी इस रिपोर्ट की उम्मीदों को आगे बढ़ाया। उन्होंने कहा, पिछले पांच साल हमने खो दिए हैं, लेकिन इन्हीं पांच सालों में रिन्यूएबल एनर्जी और बैटरियों के क्षेत्र में जबरदस्त प्रगति हुई है। अगर हम इस रफ़्तार पर सवार हो जाएं, तो अब भी समय है। यह खिड़की बहुत छोटी है, लेकिन खुली है फैसला हमारे हाथ में है।
रिपोर्ट के अन्य निष्कर्षों के अनुसार, ऊर्जा क्षेत्र में मीथेन उत्सर्जन को 2030 तक 20% और 2035 तक 30% तक कम करना होगा। यह जरूरी है क्योंकि मीथेन गैस का प्रभाव कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में 25 गुना अधिक होता है, और इसका नियंत्रण तापमान वृद्धि को रोकने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
इसके साथ ही, कार्बन रिमूवल तकनीक को भी अभूतपूर्व स्तर तक बढ़ाना होगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2050 तक इस तकनीक को सालाना पांच अरब टन CO₂ को कैप्चर करने की क्षमता तक पहुंचना होगा। इसका मतलब है कि पेड़-पौधों, मिट्टी और समुद्र जैसे प्राकृतिक साधनों के साथ-साथ कृत्रिम कार्बन कैप्चर सिस्टम्स का इस्तेमाल बढ़ाना पड़ेगा।
क्लाइमेट एनालिटिक्स की रिपोर्ट यह भी स्वीकार करती है कि अगर कार्बन रिमूवल तकनीक अपेक्षित गति से आधी रफ़्तार पर भी आगे बढ़े, तब भी सदी के अंत तक वैश्विक तापमान को 1.5°C से नीचे लाना संभव रहेगा। यह दर्शाता है कि वैश्विक नीति-निर्माताओं के पास अभी भी अवसर है कि वे विज्ञान और तकनीक के सहयोग से इस दिशा में ठोस निर्णय लें।
यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब पूरी दुनिया COP30 की तैयारी में जुटी है। आने वाले सम्मेलन में दुनिया के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या 1.5°C का लक्ष्य अब भी जीवित है? इस प्रश्न का उत्तर रिपोर्ट स्पष्ट रूप से देती है हां, अगर अभी से कार्रवाई शुरू की जाए।
रिपोर्ट इस बात पर भी जोर देती है कि केवल घोषणाओं से अब कुछ नहीं होगा। वास्तविक बदलाव तब आएगा जब देश अपने उद्योगों, ऊर्जा ढांचों और जीवनशैली में ठोस परिवर्तन करें। रिन्यूएबल एनर्जी को प्राथमिकता देना, कोयला और तेल जैसे जीवाश्म ईंधनों से बाहर निकलना, और ऊर्जा दक्षता को अपनाना अब समय की मांग है।
जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि इस दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने से न केवल पृथ्वी का तापमान नियंत्रित रहेगा, बल्कि इससे रोजगार सृजन, ऊर्जा सुरक्षा और स्वास्थ्य लाभ जैसे कई सकारात्मक परिणाम भी सामने आएंगे। रिन्यूएबल एनर्जी के विस्तार से लाखों नए रोजगार बन सकते हैं, और प्रदूषण कम होने से स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा।
दुनिया के कई देश पहले से ही इस दिशा में प्रयासरत हैं। यूरोपीय संघ ने 2040 तक अपने उत्सर्जन को 90% तक घटाने का लक्ष्य रखा है, जबकि अमेरिका और चीन भी अपनी ऊर्जा नीतियों में बड़े बदलाव कर रहे हैं। भारत भी 2070 तक नेट-ज़ीरो का लक्ष्य हासिल करने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में तेजी से निवेश कर रहा है।
रिपोर्ट का संदेश स्पष्ट है कि समय अब भी है, लेकिन बहुत कम। अगर आने वाले पांच से दस वर्षों में ठोस वैश्विक नीतियां लागू की गईं, तो 1.5°C की सीमा को पार किए बिना पृथ्वी को स्थिर और सुरक्षित रखा जा सकता है। परंतु अगर यह मौका चूक गया, तो इसके परिणाम आने वाली पीढ़ियों के लिए गंभीर होंगे।
क्लाइमेट एनालिटिक्स की Rescuing 1.5°C रिपोर्ट दुनिया को यह विश्वास दिलाती है कि सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। जलवायु संकट भले ही विशाल है, लेकिन वैज्ञानिकों, तकनीकी विशेषज्ञों और राजनीतिक इच्छाशक्ति के संयुक्त प्रयास से इसे पलटा जा सकता है। अब यह दुनिया के नेताओं पर निर्भर करता है कि वे इस मौके को ऐतिहासिक बदलाव में कैसे बदलते हैं।
1.5°C का लक्ष्य केवल एक वैज्ञानिक आकड़ा नहीं, बल्कि मानवता के अस्तित्व से जुड़ा सवाल है। इस दिशा में हर कदम महत्वपूर्ण है। आज जो निर्णय लिए जाएंगे, वे आने वाली सदी की जलवायु को तय करेंगे। अगर देश एकजुट होकर कार्य करें, तो न केवल 1.5°C के लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है, बल्कि एक स्वच्छ, हरित और सुरक्षित भविष्य भी बनाया जा सकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

















