उत्तर प्रदेश का प्रतापगढ़ जिला न केवल सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से समृद्ध रहा है, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भी इसने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहाँ की धरती ने अनेक वीर सपूत, किसान नेता, क्रांतिकारी और राजनीतिक कार्यकर्ता पैदा किए, जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। धर्माचार्य ओम प्रकाश पांडेय अनिरुद्ध रामानुज दास, जो वर्तमान में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित संघ तथा लोकतंत्र रक्षक सेनानी आश्रित संघ की प्रतापगढ़ इकाई के अध्यक्ष हैं, ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के “हर घर तिरंगा” अभियान के अवसर पर अपने आवास रामानुज आश्रम, संत रामानुज मार्ग, शिवजीपुरम, प्रतापगढ़ में तिरंगा फहराते हुए इस पूरे इतिहास का विस्तार से उल्लेख किया।
देश जब ब्रितानिया हुकूमत के आतंक के साए में जी रहा था उस समय 1857 में मेरठ छावनी में मंगल पांडे नाम के एक नौजवान ने सरकार के खिलाफ बिगुल बजाया और उस की लहर पूरे देश में फैल गई जिसका प्रभाव प्रतापगढ़ में भी पड़ा।
उसके पूर्व अठेहा परगना जिस पर राजा मानसिंह के वंशजों का अधिकार था। सन 1773 ईस्वी में अठेहा के तालुकदार झाम सिंह थे, लेकिन अवध की बेगम को उनका रवैया पसंद नहीं आया इसलिए 1777 ईस्वी में उन्हें पकड़कर के फैजाबाद जेल में बंद कर दिया गया। 12 वर्षों तक वह जेल में रहे।
इस प्रकार वह जनपद प्रतापगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उनका राज लखहरा के जमींदार विजय सिंह को दे दिया गया और उनकी मां को गुजारे के रूप में रामपुर कसिहा गांव सई नदी के किनारे दिया गया। झाम सिंह की 1807 में मृत्यु हो गई जिनके लड़के दुर्ग पाल सिंह उन्हीं दुर्ग पाल सिंह के पुत्र राम गुलाम सिंह ने अठेहा परगना संपूर्ण भाग 1851 में अपने कब्जे में कर लिया गदर के समय राम गुलाम सिंह का संबंध राना बेनी माधव शंकरपुर रायबरेली से था।
25 अक्टूबर 1857 को ब्रिगेडियर विदारआल अपनी फौज के साथ सोरांव से दहियावां की ओर से चौरास और भवानी गंज होते हुए लालगंज रायबरेली तक गया उसने सर होप ग्रांट जो सुल्तानपुर के ब्रिगेडियर के रूप में थे उनको आदेशित किया की 4 नवंबर 1857 को चढ़ाई करो किंतु बिदार आल अपनी फौज लेकर 3 नवंबर को ही रायपुर कसिहा जिस पर राम गुलाम सिंह का कब्जा था, किले पर चढ़ाई कर दी इसमें 78 सिपाहियों को राम गुलाम सिंह ने गंभीर चोटें पहुंचाई मौत के घाट उतार दिया। 300 व्यक्ति मारे गए किंतु रामगुलाम सिंह पूरब दिशा से अपने साथियों के साथ निकल लिए। ऐसे बागी राजा जान सिंह एवं रामगुलाम सिंह को हम भूल चुके हैं।
1826 में रिसाल सिंह के पुत्र कन्हैया बक्स सिंह के पुत्र हनुमंत सिंह को लाल बैरी साल की विधवा ने गोद लिया। किंग वाजिद अली शाह से राजा का खिताब राजा हनुमत सिंह को 1849 में मिला इसके 5 वर्ष पूर्व राजा हनुमत सिंह ने एक किला काला कांकर में गंगा नदी के किनारे बनवाया था। राजा हनुमत सिंह बराबर नाजिम से लगातार युद्ध करते रहे। 1835, 1836, 1841 ईस्वी में उनका राज्य नवाबों ने सीधे प्रबंध में ले लिया।
1853 में नाजिम अली खान ने धारूपुर व कालाकांकर किले से हनुमत सिंह को बाहर कर दिया। किंतु पुनः अंग्रेजों से एक समझौते के आधार राजा हनुमत सिंह को धारूपुर और काला कांकर को वापस किया और यह किले में वापस आए। राजा हनुमत सिंह के पुत्र लाल प्रताप सिंह के अंदर मातृभूमि के लिए ज्वाला धधक रही थी उन्हें पता चला कि अंग्रेजों की सेना जौनपुर से होकर अवध की ओर जा रही है।
वह अपने पिता से आज्ञा लेकर अपने चाचा माधव सिंह के साथ चांदा के मैदान में पहुंचे जहां पर भीषण युद्ध हुआ और उस युद्ध में 18 फरवरी 1858 को चांदा के मैदान में लाल प्रताप सिंह शहीद हो गए। लाल प्रताप सिंह के सिर को काट कर अंग्रेज ले गए, सिर के नीचे का भाग बैलगाड़ी पर लाद करके कालाकांकर भिजवा दिया गया।
लाल प्रताप सिंह के पुत्र रामपाल सिंह को महराज हनुमत सिंह ने युवराज घोषित कर दिया। राजाराम पाल सिंह ने अट्ठारह सौ पचासी में कांग्रेस के गठन के समय कोलकाता के द्वतीय अधिवेशन में एक अहम भूमिका निभाई और वहां से मदन मोहन मालवीय जी के संपर्क में आने के पश्चात इंग्लैंड में आपका एक अखबार हिंदुस्तान जो अंग्रेजी में छपता था।
उसे 1885 में काला काकर राजभवन से 50000 रुपये वार्षिक घाटे पर हिंदी में प्रकाशित किया जो हिंदी क्षेत्र का प्रथम हिंदी संस्करण था। जिसमें इलाहाबाद से कालाकाकर तक प्रिंटर की लाइन बिछाई गई थी। जिस के संपादक मदन मोहन मालवीय जी रहे और राजा रामपाल सिंह के कार्यकाल में अनेक स्वतंत्र संग्राम सेनानी और राष्ट्रीय कवि आकर रहते थे जयशंकर प्रसाद जी ने वहीं पर अनेकों पुस्तकों की रचना किया।
1858 में गदर के समय कुछ अंग्रेज सैनिक लखनऊ से प्रतापगढ़ होते हुए प्रयाग की ओर जा रहे थे जिन्हें कटरा के गुलाब सिंह ने घेर लिया भीषण युद्ध हुआ किंतु अपने ही खास व्यक्ति ने गद्दारी किया जिसके चलते दोबारा चढ़ाई करके अंग्रेजों ने गुलाब सिंह को तरउल के मैदान में मार डाला, उनकी घोड़ी भी मारी गई और अंग्रेजों द्वारा रानी का सिर भी काट लिया गया।
1919 के आसपास अवध किसान आंदोलन उग्र रूप ले रहा था जनपद प्रतापगढ़ में 28 अगस्त 1920 को बाबा रामचंद्र उनके साथियों के साथ झींगुर सिंह और सहदेव सिंह कुछ लोगों को सहित गिरफ्तार किया गया। माता बदल पांडे एडवोकेट ने पैरवी किया पंडित गौरीशंकर पुरुषोत्तमत्तम दास टंडन ने इनकी मदद किया।
10 सितंबर 1920 को हजारों किसानों ने जिला जेल के सामने प्रदर्शन किया जिसके कारण बाबा रामचंद्र उनके साथियों को सरकार को छोड़ना पड़ा। 17 अक्टूबर 1920 को रुरे नामक ग्राम में अंग्रेजों तथा सामंती व्यवस्था के खिलाफ जबरदस्त आंदोलन हुआ।
1924 में ग्रीष्म ऋतु में द्वारिकापुर कांड एक ऐतिहासिक घटना है जिसमें अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद और उनके सहयोगी गण राम प्रसाद बिस्मिल लहरी ने आंदोलन धार दिया । सुंदरलाल , बनवारी जो बाद में पुलिस के मुखबिर हो गए थे तथा इस घटना के 10 दिन बाद ही देश का प्रसिद्ध काकोरी कांड हुआ। इसमें ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति इन्हीं क्रांतिकारियों ने आक्रोश व्यक्त करते हुए चलती ट्रेन में डकैती डालकर सरकारी खजाना लूटा और देश की स्वतंत्रता हेतु एक नए उद्घोष का शुभारंभ किया।
सई और बकुलाही नदी से घिरा हुआ सरायमतुई नमक शायर में देशभक्त आकर रुकते थे। गांव के लाला मथुरा प्रसाद जो राजा पटियाला के मुंशी हुआ करते थे क्रांतिकारियों की मदद किया करते थे। इसी ग्राम के हर प्रसाद सिंह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ने अंग्रेजों को सदैव चकमा देते रहते थे।
1931 में आज के रानीगंज तहसील के कहला गांव में किसानों ने लगान बंदी का बड़ा आंदोलन छेड़ा। 16 फरवरी 1931 को कहला गांव के लोग एक बड़ी सभा करने जा रहे थे लेकिन कोई अपनी जमीन नहीं दे रहा था। बिंदेश्वरी प्रसाद दुबे ने अपनी बाग में सभा करने के लिए जगह दिया। जहां पर भारी संख्या में किसान इकट्ठा हुए। जिसमें रानीगंज के तत्कालीन दरोगा ने किसानों को रोकना चाहा किसान रुके नहीं लोग पेड़ों पर भी बैठे हुए थे।
तबारक हुसैन दरोगा ने गोली चलाया जिसमें कालिका प्रसाद विश्वकर्मा, मथुरा प्रसाद यादव, रामदास उपाध्याय शहीद हो गए। जिसकी सूचना माता चरण कुर्मी ने पैदल जा करके प्रयाग में आनंद भवन में दिया। आनंद भवन से राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन, पंडित मदन मोहन मालवीय, बृजेश सिंह, जवाहरलाल नेहरू सहित कई लोग आए।
महात्मा गांधी ने 1942 में ग्वालिया टैंक के मैदान पर मुंबई में करो या मरो का नारा दिया जिसमें प्रतापगढ़ से काफी लोग गए थे जिसकी अगुवाई पंडित राजाराम शुक्ल कर रहे थे। जिन्हें वहां किसान की उपाधि दी गई। इसी बीच कुछ नौजवान जिन्हें जानकारी हुई कि अंग्रेजों की सेना ट्रेन से आ रही है उस ट्रेन को पटक पलटने के लिए विश्वनाथ गंज के पास गए और वहां पर रेलवे लाइन कि जो चाबी होती है उसे खोल दिया। जिसके कारण ट्रेन पलट गई लेकिन वह ट्रेन सवारी नहीं बल्कि मालगाड़ी थी।
एक आदमी की गद्दारी के कारण सर्वप्रथम शिव नारायण शुक्ला जिन्हें उनके साथी बोस की उपाधि दिए थे। वह बड़ा पुरवा से गिरफ्तार हुए। रेलवे लाइन की चाबी उनके घर से मिल गई। उनको ले जाकर कोतवाली में उनका दोनों पैर और दोनों हाथ डंडे से बांधकर खड़ा कर दिया गया। ऊपर रस्सी से लटकाया गया और नीचे आग जलाकर उस पर तावा लाल करके उस पर खड़ा किया गया। चिल्लाते रहे, बड़ी प्रताड़ना दी गई। बाद में बाबू जय नारायण सिंह सराय आनादेव, उमापति तिवारी बड़ा पुरवा, अवध नारायण तिवारी मिसिरपुर और अनिरुद्ध शुक्ला को गिरफ्तार किया गया। जिन्हें 32 वर्ष की कारावास की सजा सुनाई गई।
शिवनारायण शुक्ला बोस के बड़े भाई राम नारायण शुक्ला लखनऊ में अपील करने गए वहां वकील को कागज इत्यादि और पैसा देकर लौट रहे थे कि रास्ते में डायरिया के शिकार हो गए और उनकी मौत हो गयी। उनके शव को लावारिस जान करके अंतिम संस्कार कर दिया गया, जो घर पर लौट कर नही आए।
18 अगस्त 1942 को लल्ला सिंह की अगुवाई में गौरा कांड हुआ माल गाड़ी जो लखनऊ से कोलकाता जा रही थी जिसके गार्ड दूधनाथ थे उस गाड़ी को रोककर के उसकी चाबी छीन लिया मिट्टी का तेल डालकर के आग लगा दिया उस समय सहदेव तिवारी, जगन्नाथ सिंह, राज देव सिंह, माता राज पांडेय सहित 65 व्यक्ति मौजूद थे।
महावीर सिपाही की टोपी भी इन लोगों ने फूंक दिया और वहीं पर भारत माता की जय और तिरंगे झंडे की जय बोलते हुए अपनी गिरफ्तारी दे दिए। स्वतंत्रता आंदोलन में भदरी, समसपुर और ताजपुर रियासत ने भी अंग्रेजों का विरोध किया। पूरे जनपद में क्रांति की ज्वाला जल रही थी। इसी बीच अंग्रेज नाजिम ने रामचौरा में गंगा तट के पास जगमोहन और विश्वनाथ का कत्ल कर दिया।
1879 में राय की पदवी से विभूषित राय कृष्ण प्रसाद सिंह भदरी जो 88 गांव के मालिक थे। उसी विसेन वंश के वंशज राय बजरंग बहादुर सिंह उनके पुत्र थे। उन्होंने गांधी जी के आवाहन पर क्रांति मचा दिया। तिरंगा लेकर के निकल पड़े और फिर उन्हें गिरफ्तार किया गया। बाद में राय बजरंग बहादुर सिंह हिमाचल प्रदेश के लेफ्टिनेंट गवर्नर पद से विभूषित किए गए।
1942 के आंदोलन में अनेकों लोग जेल गए। जिसमें पंडित मुनीश्वर दत्त उपाध्याय, रामराज शुक्ला, चंद्रदत्त सेनानी, राम लखन पाठक जेठवारा, पंडित सूर्यबली पांडेय, एडवोकेट देवली डॉ राजेश्वर सहाय त्रिपाठी, पंडित भगवती प्रसाद शुक्ला, कुंवर तेजभान सिंह, राजाराम शुक्ल किसान, श्यामसुंदर शुक्ला विविया करनपुर, राम मनोहर सह संपादक विश्वमित्र, मयूर जी जलेसर गंज, रामअधार तिवारी मुल्तानी पुर, गंगा प्रसाद ओझा, सरदार राम सिंह एडवोकेट, लाल सुरेश सिंह, इंद्रजीत शर्मा, राम हरख राय, उमापति तिवारी, शिव नारायण शुक्ला बोस, बाबू जय नारायण सिंह, अवध नारायण तिवारी, रामबचन शुक्ला, अनिरुद्ध शुक्ला सहित अनेकों लोग देश की आजादी में जेल गए।
1975 में आपातकाल के समय दूसरी आजादी की लड़ाई लड़ी गई तो इन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में से तीन लोग पंडित सूर्य बली पांडे एडवोकेट स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राजाराम शुक्ल किसान पूर्व विधायक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कुंवर तेजभान सिंह पूर्व विधायक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी 18 महीने मीसा में अपने जीवन को जेलों में बिताया।















