यूपी के प्रतापगढ़ स्थित रामानुज आश्रम में भगवान श्री राम के चरित्र का वर्णन करते हुए धर्माचार्य ओम प्रकाश पांडे अनिरुद्ध रामानुज दास ने राम-रावण संग्राम की विस्तार से कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि कहा कि पूर्व काल में त्रेता युग आने पर ब्रह्मा की 39वीं में पीढ़ी में सूर्यवंश में रघुवंश शिरोमणी प्रभु श्रीराम माता कौशल्या और राजा दशरथ के घर अवतरित हुए राजा दशरथ पूर्वकाल में महाराज मनु और माता कौशल्या जी सतरूपा थी।
14 वर्ष की आयु में विश्वामित्र जी उन्हें लेकर वन गए जहां ताड़का का वध एवं ऋषि पत्नी अहिल्या का उद्धार किया। वहां से राजा जनक के घर जाकर आशुतोष भगवान के धनुष को 15 वर्षों की आयु में तोड़कर 6 वर्ष की अवस्था वाली हो चुकीं मिथिलेश कुमारी सीता जो परम सुंदरी थी और अयोनिजा थी। वैवाहिक विधि के अनुसार पाणिग्रहण संस्कार संपन्न किया अयोध्या आते समय परशुराम जी से मुलाक़ात हुई। अयोध्या में आने पर कुछ दिनों के पश्चात् 27 वर्ष की आयु में श्रीरामचंद्र जी के युवराज पद देने की तैयारी हुई। कैकई ने दो वर माँगा पहला राम को बनवास और और दूसरा भरथ को अयोध्या की राजगद्दी।
इस प्रकार भगवान जानकी लक्ष्मण और सुमंत सहित वन की ओर चले। प्रथम रात्रि तमसा नदी के तट पर विश्राम किया दूसरे दिन जनपद प्रतापगढ कि आज के ग्राम जगरनाथपुर मोक्षदा ताल जगदीशपुर रामनगर ईश्वरपुर, देवघाट, नारायणपुर, देवापुर, सकली होते हुए संध्याकाल श्रृंगवेरपुर में विश्राम किये। अपने मित्र केवट के परिजनों का कल्याण कर दूसरे दिन रास्ते में रात्रि निवास करते हुए तीसरे दिन भरद्वाज आश्रम चौथे दिन ऋषि बाल्मीकि से मिलते हुए पाँचवे दिन चित्रकूट पहुँचकर कर पर्णकुटी बनाया। रास्ते में 3 रात तक केवल जल पीकर रहे चौथे दिन फलाहार किया तथा ऋषियों को दर्शन दिया।
अयोध्या से निकलने के पश्चात साढ़े 12 वर्ष तक वन में तथा पंचवटी में टिके रहे। वहां शूपणखा का आगमन पर लक्ष्मण जी ने कुरूप किया। माघ मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को वृंद मुहूर्त में जब श्रीराम और लक्ष्मण जी दोनों आश्रम के बाहर थे 10 मुख वाले रावण ने सीता को अकेली पाकर हरण कर लिया। माघ कृष्ण नवमी को रावण के घर में निवास करने वाली सीता की खोज करते हुए दोनों भाई राम और लक्ष्मण जटायु से मिले। आगे चलकर हनुमानजी की कृपा से सुग्रीव से मैत्री हुई और बालि का वध हुआ।
दसवें महीने में अगहन मास शुक्ला नवमी के दिन संपाती के पता बताने पर हनुमान जी महेंद्र पर्वत से एकादशी को उछलकर 100 योजन चौड़ा समुद्र लांघकर लंका पहुंचे। रात्रि समाप्त होते होते हनुमान जी ने सीता का दर्शन किया। द्वादशी को हनुमानजी अशोक वृक्ष पर बैठे रहे। उसी दिन जानकी जी को विश्वास दिलाने के लिए उन्होंने श्रीरामचन्द्रजी की कथा सुनाई। त्रयोदशी को अक्षय कुमार सहित राक्षसों का वध किया। चतुर्दशी को मेघनाद ने ब्रह्म्पास से हनुमानजी को बांध दिया। हनुमान जी ने लंका को जलाया और पुनः पूर्णिमा को महेंद्र पर्वत पर लौट आए। प्रतिपदा से पांच दिन तक रास्ते में रह कर मधुबन में आए और मधुबन को विध्वंस किया। सप्तमी को राम चंद्र जी की सेवा में पहुंचकर सब समाचार सुनाया। और माता सीता का दिया हुआ चिन्ह उन्हें अर्पण किया। अष्टमी को उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में जब विजय संवर्त मुहूर्त व्यतीत हो रहा था ठीक दोपहर के समय में श्री राम चंद्र जी प्रस्थान किये।
राम ने दक्षिण दिशा में जाने की प्रतिज्ञा करते हुए कहा कि मैं समुद्र को लांघकर राक्षसराज रावण का वध करूंगा। 17 दिन तक समुद्र के तट पर सेना की छावनी पड़ी रही। पौष शुक्ल प्रतिपदा से लेकर तृतीया तक सेना सहित श्री रामचंद्र जी सागर के तट पर रहे। चतुर्थी को विभीषण आकर भगवान की शरणागति लिया। पंचमी को समुन्द्र पार करने के विषय में विचार किया। उसके बाद 4 दिन तक श्री रामचंद्र जी ने समुंद्र के किनारे उपवास किया चौथे दिन समुद्र से वर प्राप्त हुआ। समुद्र पर उतरने का उपाय बताया। दशमी से सेतु बढ़ने का कार्य प्रारम्भ हुआ। त्रयोदशी को सेतु का कार्य पूर्ण हो गया। चतुर्दशी को सुबेल पर्वत पर पड़ाव डाला गया। पूर्णिमा से लेकर द्वितीय तक तीन दिनों में सारी सेना समुद्र पार करके लंका पहुंच गई। तृतीया से लेकर 10वी तक 8 दिन तक सेना पड़ी रही। एकादशी के दिन शुक्र और सारण इन दो मंत्रियो का आगमन हुआ। पौष मास कृष्ण पक्ष को सेना की गणना की गई।
त्रयोदशी से लेकर अमावस्या तक तीन दिन लंका में रावण ने अपनी सेना संगठन की गणना किया। माघ शुक्ल प्रतिपदा को रावण के दरबार में अंगद जी दूत बनकर गए। उस दिन से 7 दिनों तक अर्थात अष्टमी तक राक्षस और वानरो में घमासान युद्ध हुआ। माघ शुक्ला नवमी की रात में मेघनाथ ने राम लक्ष्मण को नागपाश में बांध लिया। दशमी को गरुड़ जी ने नागपाश से मुक्त कराया। माघ शुक्ला एकादशी से 2 दिन तक युद्ध बंद रहा। द्वादशी को ही हनुमान जी ने धूम्राक्ष का और त्रयोदशी को अकंपन का वध किया। माघ शुक्ला चतुर्दशी से लेकर कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तक 3 दिन में नील ने प्रहस्त का वध किया। माघ कृष्णा द्वितीया से लेकर चतुर्थी तक 3 दिनों में श्री रामचंद्र ने तुमुल युद्ध करके रावण को रण स्थल से मार भगाया।
पंचमी से अष्टमी तक रावण द्वारा कुंभकरण जगाया गया। कुंभकरण 4 दिन तक भोजन करता रहा। नवमी से 4 दिन तक कुंभकरण युद्ध किया और बहुत से वानरों को खा गया अंत में श्रीरामचन्द्र जी के हाथ मारा गया। अमावश्या के दिन लंका में उसके लिए शोक मनाया गया। फाल्गुन कृष्ण तृतीया के दिन मेघनाथ पराजित हुआ फाल्गुन शुक्ल चतुर्थी से सप्तमी तक इन दिनों में अतिकाय का वध हुआ। अष्टमी तक 5 दिनों में पांच अन्य राक्षस मारे गए। फाल्गुन कृष्णा द्वितीय के दिन मेघनाथ पराजित हुआ। तीज से लेकर सप्तमी तक 5 दिन युद्ध बंद रहा। अष्टमी को रावण ने माया से युक्त सीता वध किया।
राम ने सेना के द्वारा सत्य का निश्चय किया। पुनः त्रयोदशी से फिर 5 दिनों में लक्ष्मण जी ने युद्ध करके मेघनाथ को मार डाला। चैत्र मास कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को रावण ने यज्ञ की दीक्षा ली और युद्ध को स्थगित रखा। अमावस्या के दिन वह युद्ध के लिए निकला, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से लेकर 5 दिन तक रावण लगातार युद्ध करता रहा। चैत्र मास नवमी को रावण द्वारा लक्ष्मण जी को शक्ति लगी। विभीषण की सलाह से हनुमान जी संजीवनी बूटी लाए और दवा पिलाई गई। दशमी को युद्ध बंद रहा रात में राक्षसों ने युद्ध आरंभ किया। एकादशी के दिन रामचंद्र के पास मातालि नामक सारथी के साथ इंद्र का रथ आया। चैत्र शुक्ला द्वादशी से लेकर वैशाख मास कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तक 18 दिनों में रामचंद्र जी से रावण का विकराल द्वंद युद्ध हुआ। इस प्रकार वैशाख मास कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन रावण मारा गया। अमावस्या के दिन रावण आदि राक्षसों के दाह संस्कार हुए। माघ शुक्ला द्वतीया से लेकर बैसाख कृष्ण चतुर्दशी तक 87 दिन के संग्राम में केवल 15 दिन युद्ध बंद रहा शेष 72 दिन युद्ध चालू रहा।
वैशाख शुक्ल प्रतिपदा को श्री रामचंद्र जी रण भूमि में ही रहे। द्वतीया के दिन उन्होंने विभीषण का राज्याभिषेक किया। तृतीया को सीता जी की शुद्धि हुई। देवताओं से वरदान प्राप्त हुआ दशरथ जी का आगमन हुआ सीता जी की पवित्रता के विषय में अनुमोदन प्राप्त हुआ।
वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को श्री रामचंद्र जी पुष्पक विमान पर बैठे और आकाश मार्ग से अयोध्यापुरी की ओर चल दिए। 14 वर्ष पूर्ण होने पर वैशाख शुक्ल पंचमी को रामचंद्र जी दल वल के साथ भारद्वाज आश्रम आए। हनुमान जी ने निषादराज को सूचना दिया और वहां से वर्तमान में प्रतापगढ़ अवध के अंदर स्थित बालकुनी नदी को पार करते हुए जिधर से प्रभु श्री राम आए थे रामनगर होते हुए नंदीग्राम पहुंचकर भरत जी को प्रभु के आने की आगमन की सूचना प्रदान किया। प्रभु श्री राम पुष्पक विमान से श्रृंगवेरपुर में निषादराज गुह को लेते हुए प्रतापगढ़ अवध के ऊपर से होकर नंदीग्राम पहुंचे। वैशाख मास शुक्ल पक्ष की सप्तमी को अयोध्या के राज्य का कार्यभार ग्रहण किया।
14 महीने 10 दिन तक सीता जी राम से अलग रहकर रावण के घर अशोक वाटिका में रहीं। प्रभु श्री राम 27 वर्ष की आयु में वन गए, 14 वर्ष वन में रहे। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने 42 वर्ष की आयु में राज्य कार्य प्रारंभ किया सीता जी उस समय 35 वर्ष की थी। 36 वर्ष की आयु में लव कुश बाल्मीकि जी के आश्रम में पैदा हुए। 12 वर्ष के लव कुश थे तभी सीता जी 47 वर्ष की आयु में पृथ्वी मे नैमिषारण्य में अश्वमेध यज्ञ के समय समाहित हो गयी।
प्रभु श्री राम 9 वर्ष बड़े थे इसलिए उस समय उनकी आयु 55 वर्ष थी। 11000 वर्षों तक प्रभु श्रीराम ने राज्य किया। उक्त कथा स्कंद पुराण के ब्राह्मखंड धर्मारण्य महात्मय के अंतर्गत श्री रामचंद्र जी के संपूर्ण चरित्र के वर्णन में तथा पद्म पुराण की पाताल खंड में वर्णित है। नैमिषारण्य में दशाश्वमेध यज्ञ एवं माता जी का पृथ्वी में समाहित होने का वर्णन वाल्मीकि रामायण से उधृत है।
















