रमेश पाण्डेय
छत्तीसगढ़ के वित्त मंत्री ओ.पी. चौधरी ने जब राज्य में जमीनों के सरकल रेट में औसतन 30 प्रतिशत की वृद्धि की घोषणा की, तो कुछ दिन शांति रही। फिर अचानक जनविरोधी, रियल एस्टेट ठप जैसे शब्द हवा में तैरने लगे। रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग के कुछ व्यापारिक संगठनों ने धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिए। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा संदेश था-सरकार गरीब को घर बनाने नहीं दे रही। सच्चाई इसके ठीक उलट है। यह वही पुराना खेल है, जो हर बार ईमानदार सुधार के सामने खेला जाता है। बिचौलियों का पुराना फार्मूला अब तक छत्तीसगढ़ में यही होता आया था। जमीन का वास्तविक सौदा 50 लाख रुपये और सरकारी कागज में दिखाया मूल्य (सरकल रेट के आधार पर) 15 लाख रुपये।
स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन शुल्क मात्र 15 लाख पर बाकी 35 लाख काले धन में। इस खेल के चार लाभार्थी थे। बिचौलिया जो काला धन लेता और कमीशन काटता, विक्रेता जिसे टैक्स बचता, के्रता जो थोड़ा सस्ता खरीदने का लालच पालता और भ्रष्ट रजिस्ट्री कार्यालय का कुछ स्टाफ जो आंख बंद कर लेता। इन चारों की मिलीभगत से राज्य का खजाना हर साल सैकड़ों करोड़ लुटता रहा। 2022-23 में ही छत्तीसगढ़ में रजिस्ट्री से होने वाली आय अपेक्षा से लगभग 1,800 करोड़ कम रही थी। इसका सबसे बड़ा कारण यही काला खेल था।
ओ.पी. चौधरी ने क्या बदला?
नए सरकल रेट में शहरों के पॉश इलाकों में 30-50 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्रों में 20-30 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की गई है। लेकिन यह बढ़ोतरी मनमानी नहीं है। हर जिले में तहसीलवार सर्वे हुआ। रियल एस्टेट पोर्टल्स पर लिस्टेड कीमतें, पिछले तीन साल के वास्तविक सौदे, बैंक वैल्यूएशन सबको आधार बनाया गया। अब सरकारी कागज में लिखा मूल्य बाजार मूल्य के 80-90 प्रतिशत तक पहुंच गया है। परिणाम यह है कि अब 50 लाख की जमीन पर 47 लाख ही कागज में दिखाना पड़ेगा। काला धन घुसाने की गुंजाइश केवल 3 लाख रह जाएगी। राज्य को स्टांप ड्यूटी में सीधे 2-2.5 लाख रुपये प्रति रजिस्ट्री अतिरिक्त मिलेंगे।
जो लोग सबसे ज्यादा चिल्ला रहे हैं, उनकी असलियत देखिए। रायपुर के एक बड़े बिल्डर ने पिछले साल 200 फ्लैट बेचे। हर फ्लैट का वास्तविक मूल्य 55 लाख था, कागज में 28 लाख दिखाया। कुल 54 करोड़ का काला खेल। एक दलाल ने पिछले पांच साल में 400 से ज्यादा प्लॉट सौदे कराए। हर सौदे में 8-10 लाख काला कमीशन। अब उसका धंधा खतरे में है। कुछ व्यापारिक संगठनों के पदाधिकारी खुद बड़े लैंड डीलर हैं। उनके हित प्रभावित हो रहे हैं। इन लोगों ने अब नया नैरेटिव गढ़ा है। गरीब का घर बनना मुश्किल हो जाएगा। जबकि सच यह है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने पहले से ही 10 लाख तक की रजिस्ट्री पर महिलाओं को 100% और पुरुषों को 50% छूट दी हुई है। 15 लाख तक की कृषि भूमि पर कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। प्रधानमंत्री आवास योजना के लाभार्थियों को पुराना रेट ही लागू होगा।
जनता को क्या फायदा होगा?
इसे देखें तो खजाने में सीधा पैसा शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क पर खर्च होगा। काला धन कम होगा। आतंकवाद, नक्सलवाद, ड्रग्स को मिलने वाली फंडिंग पर लगाम लगेगी। पारदर्शिता बढ़ेगी, बैंक लोन आसान होगा क्योंकि वैल्यूएशन और मार्केट वैल्यू में अंतर कम हो जाएगा। आम आदमी को सही कीमत पता चलेगी और ठगे जाने की गुंजाइश घटेगी। अभी भी कुछ करना बाकी है। सरकार ने आधा काम कर दिया है। अब बाकी आधा यह करना है कि हर तहसील में वास्तविक बाजार मूल्य की तिमाही समीक्षा हो। आनलाइन पोर्टल पर हर मोहल्ले का लाइव रेट दिखे, बिचौलियों पर इनकम टैक्स और ईडी की नजर रखी जाए और रजिस्ट्री कार्यालयों में सीसीटीवी और बायोमेट्रिक हाजिरी अनिवार्य हो।
अंतिम बात
जो सुधार बिचौलियों को तकलीफ देती है, वही सुधार जनता को सबसे ज्यादा फायदा पहुंचाता है। 2016 में नोटबंदी के समय भी यही चीखें थीं। 2017 में जीएसटी के समय भी यही रोना था। हर बार काले धन के सौदागरों ने गरीब मरेगा का राग अलापा, और हर बार गरीब मजबूत हुआ। ओ.पी. चौधरी ने जो साहस दिखाया है, वह छत्तीसगढ़ ही नहीं, पूरे देश के लिए मिसाल है। यह फैसला वापस नहीं होना चाहिए। बल्कि इसे और सख्ती से लागू करना चाहिए। क्योंकि जब तक सरकारी कागज में लिखी कीमत और बाजार की असल कीमत में फर्क रहेगा, तब तक बिचौलियों का धंधा फलेगा और राज्य का खजाना खाली रहेगा। यह लड़ाई सिर्फ सरकल रेट की नहीं है। यह लड़ाई पारदर्शिता और ईमानदारी की है। और इस लड़ाई में छत्तीसगढ़ की जनता को अपने वित्त मंत्री के साथ खड़ी है। बिचौलियों की चीखें जितनी तेज होंगी, उतना ही पता चलेगा कि निशाना सटीक लगा है।














