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पं मुनीश्वर दत्त उपाध्याय के संविधान पर हस्ताक्षर

प्रतापगढ़ के गौरव पं मुनीश्वर दत्त उपाध्याय के संविधान पर हस्ताक्षर : धर्माचार्य

रामानुज आश्रम के धर्माचार्य ओमप्रकाश पांडेय ‘अनिरुद्धरामानुज दास’ ने 77वें गणतंत्र दिवस पर प्रतापगढ़ की गौरवशाली इतिहास को नमन किया है। उन्होंने बताया कि जिले के पं मुनीश्वर दत्त उपाध्याय के संविधान पर हिंदी में हस्ताक्षर हैं।


प्रतापगढ़, 25 जनवरी 2026। भारत के 77वें गणतंत्र दिवस पर स्वाधीन संग्राम से लेकर संविधान निर्माण तक के ऐतिहासिक तथ्यों को याद कर रहे हैं। रामानुज आश्रम के धर्माचार्य ओमप्रकाश पांडेय ‘अनिरुद्धरामानुज दास’ ने प्रतापगढ़ के गौरवशाली इतिहास को नमन किया है।

उन्होंने बताया कि 26 जनवरी 1950 को लागू हुए भारत के संविधान पर जनपद प्रतापगढ़ से पंडित मुनीश्वर दत्त उपाध्याय के हिंदी में हस्ताक्षर हैं। पंडित जी प्रतापगढ़ के प्रथम सांसद थे और संविधान सभा के सदस्य के रूप में उन्होंने राष्ट्र निर्माण में अमूल्य योगदान दिया। यह हस्ताक्षर न केवल प्रतापगढ़ की शान हैं, बल्कि उत्तर प्रदेश और पूरे देश के लिए गर्व का विषय हैं।

पंडित मुनीश्वर दत्त उपाध्याय (जन्म: 3 अगस्त 1898, लक्ष्मणपुर, लालगंज तहसील, प्रतापगढ़) एक स्वतंत्रता सेनानी, राजनेता, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता थे। शिक्षा जगत में उन्हें ‘मालवीय’ कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने प्रतापगढ़ में दो दर्जन से अधिक शिक्षण संस्थानों की स्थापना की और ज्ञान के प्रकाश को फैलाया।

वे 1952 और 1957 में प्रतापगढ़ से लोकसभा सांसद चुने गए। संविधान सभा के सदस्य के रूप में उनके हस्ताक्षर मूल प्रति पर मौजूद हैं, जो हिंदी में है। यह प्रतापगढ़ जिले का एकमात्र ऐसा गौरवपूर्ण योगदान है। संविधान समिति के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद और प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अंबेडकर के साथ उनका नाम जुड़ना प्रतापगढ़ की ऐतिहासिक पहचान को मजबूत करता है।

प्रतापगढ़ का स्वतंत्रता संग्राम इतिहास भी अत्यंत गौरवशाली रहा है। मुगल साम्राज्य के पतन के बाद अंग्रेजों के आगमन से ही यहां आजादी की लड़ाई शुरू हो गई। 1762 ई. से पहले सफदरजंग ने रामपुर किला पर कब्जा किया था। राय भाऊ सिंह के पुत्र कौशल सिंह और विशाल सिंह के समय से संघर्ष जारी रहा।

1773 में अठेहा के तालुकेदार झाम सिंह को लखनऊ की बेगम से विवाद के कारण 1777 में फैजाबाद जेल में 12 वर्ष बंद रखा गया। उनकी 1807 में मृत्यु के बाद स्वतंत्रता आंदोलन की नींव पड़ी।1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में प्रतापगढ़ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

3 नवंबर 1857 को रामपुर कसिहा के रामगुलाम सिंह के किले पर अंग्रेजों ने चढ़ाई की, जिसमें लगभग 300 लोग शहीद हुए। 19 फरवरी 1858 को चांदा में लड़ते हुए कालाकांकर राजभवन के युवराज लाल प्रताप सिंह शहीद हुए। 1885 में कांग्रेस के द्वितीय अधिवेशन (कोलकाता) में राजा रामपाल सिंह कालाकांकर ने अंग्रेजों के खिलाफ प्रस्ताव रखा।

1920-30 के दशक में आंदोलन और तेज हुआ। 1921 में बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में रुरे से अवध किसान आंदोलन शुरू हुआ, जिसमें झींगुरी सिंह आदि ने योगदान दिया। 14 नवंबर 1929 को महात्मा गांधी कालाकांकर राज भवन आए, जहां राजा अवधेश सिंह के नेतृत्व में विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई। ताजपुर, भद्री और समसपुर का विशेष योगदान रहा।

16 फरवरी 1931 को कहला में रामजतन के नेतृत्व में नौजवानों ने तिरंगे झंडे के साथ जुलूस निकाला। दरोगा तबारक हुसैन ने गोली चलाई, जिसमें रामदास उपाध्याय, कालिका प्रसाद विश्वकर्मा और मथुरा यादव शहीद हुए। इस घटना पर श्रीमती कमला नेहरू, पुरुषोत्तम दास टंडन, पंडित मदन मोहन मालवीय और बृजेश सिंह आदि पहुंचे।

1933 में नमक सत्याग्रह चला। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में प्रतापगढ़ ने चरम योगदान दिया। 18 अगस्त 1942 को लखनऊ-कोलकाता मालगाड़ी पर लल्ला सिंह के नेतृत्व में हमला हुआ।

गार्ड दूधनाथ से चाबी छीनी गई, मिट्टी का तेल डालकर डिब्बे जला दिए गए। सहदेव तिवारी, जगन्नाथ सिंह, राजदेव सिंह, माता राज पांडे आदि 65 लोगों ने महात्मा गांधी का नारा लगाया, तिरंगे लहराए और महावीर सिपाही की टोपी फूंक दी।

नारे गूंजे: यह भारत देश हमारा है, यह हिंदुस्तान हमारा है… हटो फिरंगी ब्रिटिश यहां से! राम अधार यादव, सीताराम मौर्य, फतेह बहादुर सिंह आदि शामिल थे। बाद में राम अधार यादव और सीताराम मौर्य को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा मिला।

9 अगस्त 1942 को तत्कालीन डीएम क्रासले ने पंडित मुनीश्वर दत्त उपाध्याय को गिरफ्तार किया। पंडित सूर्यबली पांडे (केपी कॉलेज प्रयागराज के छात्र), राय बजरंग बहादुर सिंह, चंद्र दत्त सेनानी, राम लखन पाठक आदि भारी संख्या में गिरफ्तार हुए।

उमापति तिवारी के नेतृत्व में विश्वनाथगंज में रेलवे लाइन उखाड़ी गई, ट्रेन पलटने का प्रयास हुआ। शिव नारायण शुक्ला के बड़े भाई पैरवी के लिए लखनऊ गए, जहां हैजा की चपेट में आने से उनकी मृत्यु हुई और लाश लावारिस समझकर फेंक दी गई।

प्रतापगढ़ के हजारों लोग जेल गए, शहीद हुए और आजादी दिलाई। लेकिन कई सेनानियों के परिजन आज भी गुमनामी में जी रहे हैं। धर्माचार्य ओमप्रकाश पांडे ने कहा कि इन महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को शत-शत नमन और विनम्र श्रद्धांजलि। पंडित मुनीश्वर दत्त उपाध्याय जैसे नायकों का योगदान हमें प्रेरित करता है कि संविधान की रक्षा और देश की एकता बनाए रखें।