प्रतापगढ़, 6 नवंबर 2025। देश की आजादी की लड़ाई में अनेक वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी। उन्हीं में से एक नाम है स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित सूर्यबली पांडेय का जिन्होंने अपने त्याग, साहस और समाजसेवा से प्रतापगढ़ जिले का नाम इतिहास में दर्ज किया।
पंडित सूर्यबली पांडे का जन्म 7 दिसंबर 1921 को तत्कालीन देवली साम्राज्य के अंतर्गत गार्ग्य गोत्रीय इटिया पांडेय परिवार में हुआ था। उनके पिता पंडित शिवनाथ प्रसाद पांडेय और माता रमा देवी धार्मिक और विद्वान प्रवृत्ति के थे। यह परिवार देवली साम्राज्य का राजपुरोहित था, जो अपने कर्तव्यनिष्ठ स्वभाव और समाज के प्रति समर्पण के लिए जाना जाता था।
शिक्षा और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ाव
प्राथमिक शिक्षा लीलापुर जूनियर हाई स्कूल से प्राप्त करने के बाद सूर्यबली पांडेय ने प्रतापगढ़ शहर के अजित सिंह सोमवंशी हाई स्कूल से हाई स्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद उन्होंने केपी हिंदू इंटर कॉलेज, इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में प्रवेश लिया।
इसी दौरान, वर्ष 1942 में महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन की गूंज देशभर में फैल रही थी। राष्ट्रप्रेम की भावना से ओतप्रोत पंडित पांडे आनंद भवन से जुड़े देशभक्तों के संपर्क में आए और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ परचे बांटने जैसे कार्यों में सक्रिय हो गए। इसी कारण उन्हें इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पास गिरफ्तार कर लिया गया।
उनकी गिरफ्तारी की सूचना मिलते ही गांव में हाहाकार मच गया, क्योंकि वे अपने परिवार में आठ संतानों में एकमात्र पुत्र थे। उन्हें उस समय की मलाका जेल (अब मेडिकल कॉलेज परिसर) में रखा गया।
कानून की पढ़ाई और वकालत का आरंभ
जेल से छूटने के बाद उनके दादा महावीर प्रसाद पांडेय, जो मध्य प्रदेश पुलिस में कार्यरत थे, उन्हें अपने साथ सागर विश्वविद्यालय ले गए। वहीं से उन्होंने एलएलबी की डिग्री प्राप्त की।
1947 में देश की आजादी के बाद उन्होंने प्रयागराज में वकालत की शुरुआत की, लेकिन जल्द ही 1950 में वे प्रतापगढ़ लौट आए। महात्मा गांधी और विनोबा भावे के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने खादी वस्त्र धारण कर समाजसेवा को अपना जीवन उद्देश्य बना लिया।
राजनीति में कदम और समाजवादी विचारधारा
1952 में उन्होंने सोशलिस्ट पार्टी से विश्वनाथगंज (तत्कालीन गड़वारा) विधानसभा से चुनाव लड़ा। उनके मित्र बशीर अहमद वकील साइकिल पर पीछे बैठकर उनका प्रचार करते थे। हालांकि कांग्रेस नेता पंडित मुनीश्वर दत्त उपाध्याय ने उन्हें समझाया कि वे राजनीति में न उतरें, परंतु उनके दादा पंडित रामरतन पांडेय ने प्रोत्साहित किया।
हालांकि चुनाव परिणाम उनके पक्ष में नहीं गया, पर उन्होंने राजनीति से हटकर गरीबों और वंचितों की सेवा के लिए वकालत शुरू की। वे गरीब मुवक्किलों से केवल पांच रुपये फीस लेते थे और जरूरतमंदों को नि:शुल्क न्याय दिलाते थे।
विनोबा भावे के साथ भूदान आंदोलन में सहभागिता
पंडित सूर्यबली पांडेय विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से गहराई से जुड़े। जब विनोबा भावे बादशाहपुर से गौरा तक पैदल यात्रा पर निकले, तो पंडित पांडेय ने उनके साथ शाहगंज तक पदयात्रा की। उनके साथ स्वतंत्रता सेनानी पंडित रामलखन पाठक और रामकिंकर सरोज भी थे।
उन्होंने अनेक गरीब परिवारों को भूमि दान देकर जीवनयापन की राह सुलभ कराई। प्रतापगढ़ के कुंडा-पट्टी क्षेत्र के कई गांवों में आज भी लोग उन्हीं की दान की हुई जमीन पर खेती करते हैं।
आपातकाल में जेल यात्रा और अडिग विचारधारा
1975 में जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू किया, तब पंडित सूर्यबली पांडेय को जन संघर्ष समिति का जिला संयोजक बनाया गया। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों को एकजुट कर लोकतंत्र की रक्षा के लिए आंदोलन चलाया।
25 जून 1975 की रात, प्रतापगढ़ के पलटन बाजार स्थित सर्वोदय भवन में अंतिम बैठक हुई, जिसमें उन्होंने सभी कार्यकर्ताओं से कहा कि अब जनता को जागरूक कीजिए, गिरफ्तारी कभी भी हो सकती है।
उन्हें तत्कालीन एसडीएम हसनैन रजा ने गिरफ्तार कर लिया। पहले उन्हें प्रतापगढ़ जेल, फिर अलीगढ़ जेल भेजा गया। उनके साथ उनके शिष्य पंडित कृपाशंकर ओझा को बरेली जेल भेजा गया।
जेल के दौरान उनके घर में डकैती हुई, बेटी की शादी के गहने लूट लिए गए, पर उन्होंने कभी क्षमा याचना नहीं की और पैरोल पर आने से भी इंकार कर दिया। दादी के समझाने पर थोड़े समय के लिए बाहर आए, बेटी की विदाई की और फिर स्वेच्छा से जेल लौट गए।
विनोबा भावे और जयप्रकाश आंदोलन से संबंध
आपातकाल के बाद जब 1977 में लोकतंत्र बहाल हुआ, तो चौधरी चरण सिंह ने उन्हें चुनाव लड़ने का आमंत्रण दिया, पर उन्होंने कहा विनोबा जी कहते हैं चुनाव झगड़े की जड़ है, इसलिए मैं चुनाव नहीं लड़ूंगा।
पंडित पांडेय अक्सर अपने मित्र पंडित रामलखन पाठक के साथ वर्धा आश्रम जाते थे और विनोबा भावे से सीधे संवाद करते थे। उन्होंने जयप्रकाश नारायण आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाई और शराबबंदी समिति तथा भूदान समिति के अध्यक्ष के रूप में काम किया।
धर्म, दर्शन और संतों से जुड़ा आध्यात्मिक जीवन
देश की आजादी और समाजसेवा के बाद पंडित सूर्यबली पांडेय का झुकाव अध्यात्म की ओर बढ़ा। उन्होंने श्री वैष्णव संप्रदाय के पीठाधीश्वर जगदगुरु श्री श्री 1008 स्वामी श्रीनिवासाचार्य जी से दीक्षा ली।
उन्होंने गया में अपने पूर्वजों का पिंडदान किया और अपने गुरु के साथ भारत के अनेक तीर्थस्थलों का भ्रमण किया। उनके द्वारा आयोजित श्रीमद्भागवत कथा और विशाल भंडारा में लगभग 15,000 लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया।
प्रतापगढ़ कचहरी में वे ऊर्ध्वपुण्ड तिलक लगाकर वकालत करते थे। वे प्रतापगढ़ के पहले श्री वैष्णव अधिवक्ता थे। आज उनकी परंपरा को आगे बढ़ाने वाले कई अधिवक्ता हैं।
मानवता, सद्भावना और सेवा की मिसाल
पंडित सूर्यबली पांडे का जीवन त्याग और करुणा का प्रतीक था। उन्होंने कहा था जिसका एक भी मुसलमान मित्र न हो, वह सच्चा हिंदुस्तानी नहीं है। वे धर्म और सौहार्द के बीच पुल की तरह थे। उनके मित्र स्वतंत्रता सेनानी सरदार राम सिंह कहा करते थे कि यदि सूर्यबली राजनीति में रहते, तो वे निश्चित ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनते। उन्होंने अपने जीवन में कभी किसी अधिकारी के आगे झुकना नहीं सीखा। डीएम के बुलावे पर वे केवल एक बार जिलाधिकारी आवास गए थे।
परिवार और वैचारिक विरासत
पंडित पांडेय की पत्नी श्रीमती शारदा देवी (रामानुज दासी) और नौ संतानें सरला देवी ओझा, विमला देवी तिवारी, चंद्रशेखर दत्त पांडेय, जगदीश नारायण पांडेय, ओमप्रकाश पांडेय अनिरुद्ध रामानुजदास, शशिधर प्रकाश पांडेय, सुधा ओझा सुभद्रा रामानुजदासी, विष्णु प्रकाश पांडेय एडवोकेट और निर्मला समदरिया नारायणी रामानुजदासी उनकी वैचारिक परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं।
उन्होंने कभी बैंक खाता तक नहीं खोला, केवल स्वतंत्रता सेनानी पेंशन मिलने पर मजबूरी में खाता खुलवाया। वे सरलता, सेवा और संतुलित जीवन के आदर्श रहे।
अंतिम यात्रा और प्रेरक विरासत
12 मई 2004 को प्रतापगढ़ के सर्वोदय भवन पलटन बाजार में उन्होंने भगवान श्रीमन्नारायण के मूल मंत्रों का जप करते हुए अंतिम सांस ली। इस मौके पर आपकी धर्मपत्नी शारदा देवी रामानुजदासी और पुत्र ओमप्रकाश पांडेय अनिरुद्ध रामानुजदास, विष्णु प्रकाश पांडेय (घनश्याम), पुत्रवधू निर्मला पांडेय नारायणी रामानुजदासी और पौत्र उपस्थित थे।
श्रृंगवेरपुर घाट पर मां गंगा के पावन तट पर उनका दाह संस्कार हुआ। उनकी जीवनगाथा आज भी जनपद प्रतापगढ़ में प्रेरणा स्रोत बनी हुई है।













