प्रमोद तिवारी अधिकारियों के अड़ियल रवैये से नाराज, राज्यसभा में उठाया मामला

नई दिल्ली, 31 मार्च 2026। सांसदों के फोन काल और पत्र का समय से जवाब न देने से कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी बेहद नाराज हैं। अधिकारियों के इस अड़ियल रवैये का मामला उन्होंने 30 मार्च 2026 को राज्यसभा में उठाया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी ने अधिकारियों के अड़ियल रवैये पर गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए सदन का ध्यान इस ओर खींचा कि नौकरशाही अब जनप्रतिनिधियों के प्रति अपनी जवाबदेही भूलती जा रही है।

राज्यसभा की कार्यवाही के दौरान अपनी बात रखते हुए प्रमोद तिवारी ने कहा कि देश के विभिन्न विभागों में बैठे उच्चाधिकारी न तो सांसदों के फोन कॉल का उत्तर देते हैं और न ही उनके द्वारा लिखे गए पत्रों का संज्ञान लेते हैं। उन्होंने बेहद तल्ख लहजे में कहा, जब एक सांसद अपने क्षेत्र की जनता की समस्याओं को लेकर किसी अधिकारी को फोन करता है या पत्र लिखता है, तो वह केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि लाखों लोगों की आवाज होता है। अधिकारियों द्वारा इस आवाज को अनसुना करना लोकतंत्र की संसदीय मर्यादा को तार-तार करने जैसा है।

प्रमोद तिवारी ने सदन को अवगत कराया कि यह समस्या किसी एक दल या एक सांसद की नहीं है, बल्कि यह एक व्यवस्थित गिरावट है। उन्होंने कहा कि प्रोटोकॉल के तहत अधिकारियों के लिए जनप्रतिनिधियों के पत्रों का उत्तर देना अनिवार्य है, लेकिन वर्तमान में ‘बाबूशाही’ इस कदर हावी है कि वे प्रोटोकॉल की धज्जियां उड़ा रहे हैं।

उपराष्ट्रपति से हस्तक्षेप की मांग

सदन में इस गंभीर विषय को उठाते हुए प्रमोद तिवारी ने आसंदी पर विराजमान उपराष्ट्रपति एवं राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन से सीधे हस्तक्षेप की मांग की। उन्होंने आग्रह किया कि आसन की ओर से सरकार और संबंधित अधिकारियों को स्पष्ट एवं कड़े निर्देश जारी किए जाएं।

प्रमोद तिवारी ने कहा कि यदि सदन के सदस्यों की गरिमा सुरक्षित नहीं रहेगी, तो हम जनता के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन कैसे करेंगे? मेरी मांग है कि आसंदी से अधिकारियों को निर्देशित किया जाए कि वे सांसदों के फोन कॉल उठाएं और उनके पत्रों का समयबद्ध तरीके से जवाब दें।

अधिकारियों की बेरुखी एक गंभीर चुनौती

प्रमोद तिवारी की इस चिंता ने एक बड़े प्रशासनिक संकट की ओर इशारा किया है। अक्सर देखा जाता है कि विकास कार्यों, भ्रष्टाचार की शिकायतों या जनहित के मुद्दों पर सांसद अधिकारियों से संपर्क साधने की कोशिश करते हैं। लेकिन अधिकारियों की ओर से मिलने वाली ‘चुप्पी’ न केवल विकास कार्यों को बाधित करती है, बल्कि संसद की सर्वोच्चता को भी चुनौती देती है।

यदि राज्यसभा के उपनेता स्तर के व्यक्ति को सदन में यह मुद्दा उठाना पड़ रहा है, तो स्थिति निश्चित रूप से चिंताजनक है। यह इस बात का प्रमाण है कि नौकरशाही अब खुद को जनता के प्रतिनिधियों से ऊपर समझने लगी है, जो कि एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।

संसदीय विशेषाधिकार और जवाबदेही

संसद के नियमों के अनुसार, किसी भी सरकारी अधिकारी द्वारा सांसद के साथ किया गया अभद्र व्यवहार या उनके पत्रों की जानबूझकर की गई अनदेखी ‘विशेषाधिकार हनन’ (Breach of Privilege) की श्रेणी में आ सकती है। प्रमोद तिवारी के इस बयान के बाद अब यह उम्मीद जताई जा रही है कि सरकार इस पर संज्ञान लेगी और भविष्य में अधिकारियों के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए जा सकते हैं।