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छत्तीसगढ़ के निजी संयंत्रों में संकट

छत्तीसगढ़ के निजी संयंत्रों में संकट, निवेश में भरोसा डगमगाने का भी खतरा

छत्तीसगढ़ इस समय दो विपरीत दिशाओं में खिंचता हुआ दिखाई दे रहा है। एक ओर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार निवेश को बढ़ावा देने के लिए नई-नई औद्योगिक नीतियां बना रही है। उद्योगपतियों से संवाद हो रहा है, रोड शो किए जा रहे हैं और छत्तीसगढ़ को देश के अगले बड़े औद्योगिक केंद्र के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश जारी है। सरकार का स्पष्ट संदेश है कि छत्तीसगढ़ निवेश के लिए तैयार है।

लेकिन दूसरी ओर ज़मीनी हकीकत इस संदेश से मेल नहीं खा रही। श्रमिकों की हड़ताल, विरोध प्रदर्शन और औद्योगिक अस्थिरता ने निवेशकों के मन में संदेह की लकीर खींच दी है। निजी विद्युत संयंत्रों से लेकर बड़े सीमेंट प्लांट तक, उद्योगों का पहिया लड़खड़ाता दिखाई दे रहा है। यह स्थिति केवल कुछ इकाइयों की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि पूरे राज्य के औद्योगिक वातावरण पर इसका असर साफ नजर आने लगा है।

छत्तीसगढ़ देश के ऊर्जा और खनन क्षेत्र का एक प्रमुख केंद्र है। यहां उत्पादित बिजली न केवल राज्य की जरूरतें पूरी करती है, बल्कि कई अन्य राज्यों को भी आपूर्ति की जाती है। ऐसे राज्य में यदि बिजली उत्पादन ही बाधित होने लगे, तो यह चिंता का विषय ही नहीं, बल्कि चेतावनी है।

हाल के दिनों में एक निजी विद्युत संयंत्र में श्रमिकों की हड़ताल ने इस चिंता को और गहरा कर दिया है। सबसे गंभीर पहलू यह है कि रायपुर के श्रम न्यायालय द्वारा छह माह तक हड़ताल पर प्रतिबंध लगाए जाने के बावजूद हड़ताल जारी है। यह न केवल न्यायालय के आदेश की अवहेलना है, बल्कि राज्य की प्रशासनिक साख और औद्योगिक अनुशासन पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

श्रम न्यायालय ने इस औद्योगिक विवाद पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट रूप से माना कि यदि हड़ताल जारी रही, तो विद्युत उत्पादन और आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित होगी। इसका सीधा असर जनसामान्य पर पड़ेगा। अदालत ने इसीलिए श्रमिक संघ द्वारा जारी अनिश्चितकालीन हड़ताल को छह माह तक या आगामी आदेश तक स्थगित करने का निर्देश दिया। यह आदेश किसी कंपनी के पक्ष में नहीं, बल्कि सार्वजनिक हित में था।

यह संयंत्र केवल छत्तीसगढ़ के लिए ही नहीं, बल्कि अन्य राज्यों के लिए भी बिजली आपूर्ति करता है। ऐसे में हड़ताल का जारी रहना एक स्थानीय विवाद नहीं रह जाता, बल्कि अंतर-राज्यीय प्रभाव वाला संकट बन जाता है।

कंपनी ने अपने आधिकारिक वक्तव्य में स्पष्ट किया है कि वह न्यायालय के आदेश का सम्मान करती है और उपभोक्ताओं को निर्बाध विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। लेकिन सवाल यह है कि जब कंपनी और अदालत दोनों एक ही दिशा में खड़े हों, तो व्यवस्था उत्पादन को सुचारु क्यों नहीं कर पा रही?

निवेशक किसी राज्य में निवेश करते समय सबसे पहले यह देखता है कि वहां कानून का राज कितना मजबूत है। यदि न्यायालय के आदेश भी ज़मीन पर लागू न हो सकें, तो निवेशकों के मन में असुरक्षा का भाव पैदा होना स्वाभाविक है। छत्तीसगढ़ के लिए यह स्थिति बेहद संवेदनशील है, क्योंकि राज्य इस समय नए निवेश को आकर्षित करने की प्रक्रिया में है।

श्रमिक असंतोष का असर केवल बिजली क्षेत्र तक सीमित नहीं है। देश की तीसरी सबसे बड़ी सीमेंट निर्माता कंपनी, श्री सीमेंट, ने 18 दिसंबर 2025 से बलौदा बाज़ार स्थित अपने सीमेंट प्लांट में लॉकआउट घोषित कर दिया है। कंपनी ने अपनी नियामकीय फाइलिंग में बताया कि यह कदम कर्मचारियों के असहयोग के कारण उठाया गया है।

इस लॉकआउट से प्रतिदिन लगभग 10,000 टन सीमेंट उत्पादन का नुकसान होने का अनुमान है। बलौदा बाज़ार स्थित इस प्लांट की उत्पादन क्षमता 3.4 मिलियन टन प्रति वर्ष है। यदि यह उत्पादन लंबे समय तक ठप रहा, तो इसका असर केवल कंपनी के मुनाफे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि निर्माण कार्यों, इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं और रोज़गार पर भी पड़ेगा।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि श्री सीमेंट की कुल उत्पादन क्षमता 50.4 मिलियन टन प्रति वर्ष है और इसकी पावर जनरेशन क्षमता 742 मेगावाट है, जिसमें नवीकरणीय ऊर्जा भी शामिल है। ऐसी बड़ी और स्थापित कंपनी का लॉकआउट की स्थिति में पहुंचना बताता है कि औद्योगिक वातावरण में कहीं न कहीं गंभीर असंतुलन पैदा हो चुका है।

इन घटनाओं का संयुक्त प्रभाव राज्य के औद्योगिक माहौल पर साफ दिखाई देने लगा है। प्रभावित संयंत्रों में विद्युत उत्पादन क्षमता लगभग 50 प्रतिशत तक घट गई है। यह गिरावट केवल आज की समस्या नहीं है, बल्कि आने वाले महीनों के लिए खतरे की घंटी है।

सर्दियों के मौसम में बिजली की मांग स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। हीटर, गीजर और अन्य विद्युत उपकरणों का उपयोग बढ़ता है। इसके साथ ही राज्य सरकार इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने की नीति लागू कर रही है। ई-व्हीकल नीति तभी सफल हो सकती है, जब स्थिर और पर्याप्त बिजली आपूर्ति उपलब्ध हो।

यदि उत्पादन में कमी बनी रही, तो इसका असर उद्योगों के साथ-साथ आम उपभोक्ताओं पर भी पड़ेगा। बिजली कटौती, महंगी दरें और अनिश्चित आपूर्ति जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। सीमेंट और स्टील जैसे बुनियादी उद्योगों पर इस संकट का सीधा असर पड़ रहा है। इन उद्योगों की स्थिरता पर ही राज्य का इंफ्रास्ट्रक्चर, आवास और विकास आधारित है। जब यही उद्योग अस्थिर होंगे, तो निवेशकों के मन में राज्य के औद्योगिक वातावरण को लेकर संदेह पैदा होना स्वाभाविक है।

यह स्थिति उस समय और अधिक चिंताजनक हो जाती है, जब राज्य सरकार औद्योगिक निवेश को बढ़ावा देने के लिए रोड शो, निवेशक सम्मेलन और नई औद्योगिक नीति के क्रियान्वयन जैसे कदम उठा रही है। मंच पर निवेश के सपने दिखाए जा रहे हैं, लेकिन ज़मीन पर उद्योग संघर्ष कर रहे हैं।

उद्योग जगत को जरुरत है कि औद्योगिक इकाइयों के संचालन में बाधा डालने वाली गतिविधियों पर रोक लगे। यह श्रमिक विरोधी नहीं है, बल्कि औद्योगिक अनुशासन और सार्वजनिक हित से जुड़ी हुई है। निवेशकों को भरोसा दिलाने के लिए ठोस और त्वरित कदम उठाना अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुका है। संवाद, मध्यस्थता और कानून का सख्त पालन तीनों को एक साथ लागू करना होगा।

छत्तीसगढ़ की औद्योगिक प्रगति और निवेशकों का विश्वास बनाए रखने के लिए सरकार, उद्योग और श्रमिक तीनों को मिलकर समाधान निकालना होगा। टकराव से किसी का भला नहीं होगा। न श्रमिक सुरक्षित रहेंगे, न उद्योग चल पाएंगे और न ही राज्य का विकास संभव होगा। राज्य का आर्थिक विकास तभी संभव है, जब उद्योग सुरक्षित और स्थिर वातावरण में काम कर सकें। और यह स्थिरता केवल नीतियों से नहीं, बल्कि ज़मीनी क्रियान्वयन से आती है।

छत्तीसगढ़ के पास संसाधन हैं, क्षमता है और अवसर भी। अब जरूरत है संतुलित निर्णय, मजबूत प्रशासन और स्पष्ट संदेश है कि राज्य में कानून सर्वोपरि है, संवाद के दरवाज़े खुले हैं और विकास किसी भी हाल में रुकने नहीं दिया जाएगा। यह केवल उद्योगों का सवाल नहीं है। यह छत्तीसगढ़ के भविष्य का सवाल है।