प्रतापगढ़, 10 अगस्त 2025। यूपी के प्रतापगढ़ जिले में बौद्ध अनुयायियों ने श्रावण पूर्णिमा पर रख्खासुतबंधन पर्व मनाया। यहां सुगतानन्द बुद्ध विहार पर श्रद्धावान उपासक व उपासिकाएं एकत्र हुए। श्रद्धापूर्वक आनापानसति, सामूहिक साधना, त्रिरत्नो की वंदना, दीपदान और बोधि पूजा करके रख्खासुतबंधन व प्रवज्या दिवस मनाया।
श्रावण पूर्णिमा का महान आध्यात्मिक महत्व
बौद्ध दर्शन में श्रावण पूर्णिमा का महान आध्यात्मिक महत्व है। मुख्य अतिथि के रूप पधारे मकदूम बौद्ध ने कहा कि
पालि व प्राकृत भाषा में ‘सवन’ का अर्थ होता है ‘सुनना’। यह ‘सवन’ ही संस्कृत में “श्रवण” हुआ है जिसका अर्थ होता है ‘सुनना’। सवन से सावन और श्रवण से श्रावण हुआ है। इस प्रकार सावन अर्थात श्रावण का महीना सुनने का महीना है। इसीलिए देव आवाहन सुत्त में लिखा गया है “धम्म सवन कालो, अयं भदन्ता…
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ विजय सरोज ने कहा कि इसी दिन कुलपुत्र यश को संघ द्वारा प्रथम प्रवज्या व उनके माता-पिता को प्रथम उपासिका व उपासक के रूप में दीक्षित किया गया। आंगुलीमाल (अहिंसक) की प्रवज्या भी इसी दिन हुई थी। इसलिये आज के दिन को प्रवज्या व दीक्षा दिवस के रूप में मनाया जाता हैं ।
उपोसथ अधिष्ठाता जीपी स्वावलबी ने कहा कि सम्राट अशोक ने धम्म सावन में बदलाव किए, अधिकारी नियुक्त किए तथा बड़े पैमाने पर धम्म सावन का कार्य जारी किए। शिलालेख में अशोक के धम्म सावन संबंधी कार्यों को अंकित पाएंगे।
संयोजन व संचालन कर रहे राकेश कन्नौजिया ने कहा कि भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के तीन माह पश्चात सावन की पूर्णिमा को ही पहली संगीति राजगृह के बैभार पर्वत पर सप्तपर्णी गुफा में सम्राट अजातशत्रु के पोषण में आयोजित की गयी । बौद्ध इतिहास की यह महानतम घटनाओं में से एक है जिसमें भगवान के वचनों को संग्रहीत करने के लिए भदंत महाकाश्यप महाथेरो के नेतृत्व में पांच सौ अरहत एकत्रित हुए थे।
वह महान संग्रह को त्रिपिटक कहते हैं। यह संगीति सात माह चली थी। जिससे रख्खासुतबंधन भगवान बुद्ध के उद्देश्यों को दीर्घकालिक बनाए रखने के लिए संरक्षित किया गया साथ ही वरिष्ठ व विद्वान भिक्खु उपालि के नेतृत्व में चतुपरिषद का निर्माण व भिक्खु, भिक्क्षुणी, उपासिका व उपासकों के लिए नियम बनाए गये जिसे पवित्र विनय पिटक में संरक्षित किया गया।
भारतीय दर्शन ने विश्व को प्रभावित किया
भंते अश्वजित ने त्रिशरण व पंचशील प्रदान करते हुए कहा कि भारतीय दर्शन ने विश्व को प्रभावित किया जो बौद्ध देशों में परम्पराएं आज भी यथावत जीवित हैं तथा अपनी उद्गम पावनभूमि भारत में क्रमिक रूप से वापस लौट रही हैं।
आचार्य उमेश, आचार्य राजीव और महोपासक दिनेश कुमार के नेतृत्व में परित्त सुत्तों का संगायन किया गया। इसमें अवधेश अंजनी, डॉ विजय सरोज, राकेश कुमार, डॉ. सोमित्र गुप्ता, विनोद कुमार, अवधेश, विनोद सरोज, इं. प्रभात चौधरी, गुरुदीन वर्मा, ओम प्रकाश आदि बड़ी संख्या में उपासकगण उपस्थिति रहे । अंत में सभी के प्रति अवधेश अंजनी द्वारा आभार प्रकट किया गया।
















