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रामलीला की परंपरा ने सुल्तानपुर को दी खास पहचान, 50 साल पहले पड़ी थी नींव

सुल्तानपुर की रामलीला से गांव की बनी खास पहचान, 50 साल पहले पड़ी थी नींव

गौरा (प्रतापगढ़), 18 अक्टूबर 2025। रामलीला की परंपरा ने सुल्तानपुर को खास पहचान प्रदान की है। इस परंपरा से आज सुल्तानपुर गांव न केवल एक राजस्व ग्राम है, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना का प्रतीक बन चुका है।

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के विकास खंड गौरा स्थित सुल्तानपुर गांव में वर्ष 1975 में रामानुज प्रताप सिंह ने इस परंपरा की नींव रखी थी, जो आज भी पूरे जोश और श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।

गांव में हर वर्ष होने वाली यह रामलीला न केवल धार्मिक आयोजन के रूप में देखी जाती है, बल्कि यह गांव के लोगों के बीच सामाजिक समरसता, पारस्परिक प्रेम और सांस्कृतिक एकजुटता का माध्यम भी बन गई है। उस दौर में जब आधुनिकता ने लोक परंपराओं को पीछे छोड़ दिया है, ऐसे में सुल्तानपुर की यह रामलीला ग्रामीण समाज में एक नई ऊर्जा और उत्साह का संचार करती है।

इस परंपरा को आगे बढ़ाने में स्थानीय राजपरिवार का भी योगदान रहा है। महाराजा तेज प्रताप सिंह और जैनेन्द्र सिंह ने समय-समय पर इस आयोजन को प्रोत्साहित किया और इसे गांव की संस्कृति में गहराई तक उतारा। उनके संरक्षण में रामलीला का मंचन न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा, बल्कि इसने गांव के युवाओं में धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक चेतना को भी जागृत किया।

सुल्तानपुर की रामलीला की खूबसूरती यह है कि इसमें आसपास के गांवों के लोग भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। बोर्रा गांव के शीतला प्रसाद सरोज, सालिक राम बिंद और छंगूराम मौर्य जैसे व्यक्तियों ने वर्षों तक इस परंपरा को सजाया-संवारा और इसे जन-जन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वर्तमान में यह रामलीला राजेन्द्र प्रसाद मिश्र के नेतृत्व में आयोजित की जाती है, जो आदर्श रामलीला समिति के अध्यक्ष हैं। उनके मार्गदर्शन में रामलीला को भव्य मंचन किया जा रहा है। मंच पर जब भगवान राम, लक्ष्मण, सीता और हनुमान के पात्र जीवंत होते हैं, तो पूरा सुल्तानपुर भक्ति और उत्साह से झूम उठता है।

गौर करने वाली बात यह भी है कि रामलीला के माध्यम से कई युवा अभिनय, संगीत और मंच संचालन के क्षेत्र में भी अपनी प्रतिभा दिखा रहे हैं। गांव के लोग इसे केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि संस्कार और संस्कृति का उत्सव मानते हैं।

आज जब शहरी जीवन की भागदौड़ में पारंपरिक उत्सव फीके पड़ रहे हैं, ऐसे में गौरा ब्लॉक के सुल्तानपुर की यह रामलीला समाज में एक नई प्रेरणा बनकर सामने आई है। यह परंपरा बताती है कि अगर इच्छा और आस्था हो तो कोई भी गांव अपनी सांस्कृतिक धरोहर को सहेज सकता है।