प्रतापगढ़, 27 फरवरी 2025। किसी पर जब बेबुनियाद इल्जाम लगता है, तो उसका दर्द सिर्फ वही महसूस कर सकता है, जिसने ईमानदारी और सेवा के साथ अपना जीवन जिया हो। साधुरी शिरोमणि इंटर कॉलेज, धनसारी के प्रबंधक की पत्नी रश्मि त्रिपाठी आज उसी दर्द से गुजर रही हैं। उनके पति और विद्यालय के प्रधानाचार्य पर लगे आरोपों ने उनके परिवार को झकझोर कर रख दिया है।
आंखों में आंसू और दिल में न्याय की आस लिए, रश्मि त्रिपाठी ने डीएम और एसपी को प्रार्थना पत्र सौंपा है। उनका एक ही निवेदन है— कृपया सच को सामने लाइए, ताकि मेरे निर्दोष परिवार को न्याय मिल सके।
23 फरवरी को विद्यालय के एक छात्र शिवम सिंह ने अपने घर के निकट आत्महत्या कर ली। इस हृदयविदारक घटना के बाद कुछ गैर सामाजिक तत्वों ने परिजनों को उकसाकर विद्यालय प्रबंधक और प्रधानाचार्य पर आरोप लगा दिए। उनका कहना था कि फीस जमा न होने के कारण शिवम को प्रवेश पत्र नहीं मिला, जिससे वह अवसाद में चला गया और यह कठोर कदम उठा लिया।
लेकिन सच्चाई कुछ और ही कहती है। रश्मि त्रिपाठी ने अपने पत्र में स्पष्ट किया कि विद्यालय ने कभी किसी छात्र को सिर्फ फीस न जमा करने के कारण परीक्षा से नहीं रोका। उन्होंने बताया कि अन्य कई छात्रों के भी 20,000 रुपये तक की फीस बकाया थी, फिर भी उन्हें प्रवेश पत्र दिया गया। जबकि शिवम पर मात्र 5,000 रुपये की फीस बकाया थी।
यदि अन्य छात्रों को बिना फीस के परीक्षा देने की अनुमति दी गई, तो सिर्फ शिवम के साथ अन्याय क्यों किया जाता? रश्मि त्रिपाठी की आवाज में दर्द छलक पड़ा जब उन्होंने कहा— हमारा विद्यालय सिर्फ शिक्षा देने का काम करता है, न कि किसी को दबाने या प्रताड़ित करने का। हमारे यहां गरीब, असहाय और दिव्यांग छात्रों को मुफ्त शिक्षा दी जाती है। यहां तक कि हम बाजार से किताबें खरीदकर उन्हें निशुल्क वितरित करते हैं। फिर हम किसी को प्रवेश पत्र क्यों रोकेंगे?
विद्यालय में सीसीटीवी कैमरे और वॉयस रिकॉर्डर लगे हैं, जिनके जरिए यह स्पष्ट किया जा सकता है कि क्या शिवम को किसी भी तरह की प्रताड़ना या डांट-फटकार दी गई थी। यदि ऐसा कुछ नहीं हुआ, तो फिर यह झूठे आरोप क्यों?
सच्चाई की मांग, न्याय की पुकार
रश्मि त्रिपाठी ने अधिकारियों से अपील की कि सभी तथ्यों और प्रमाणों को जांच में शामिल किया जाए। विद्यालय के शिक्षकों और अन्य छात्रों के बयान दर्ज किए जाएं, ताकि सच्चाई उजागर हो सके और निर्दोषों को न फंसाया जाए।
यह सिर्फ एक परिवार की लड़ाई नहीं, बल्कि हर उस शिक्षक और विद्यालय की लड़ाई है, जो शिक्षा को सेवा मानकर कार्य करते हैं। यदि बिना किसी ठोस प्रमाण के शिक्षा से जुड़े लोगों पर आरोप लगते रहेंगे, तो समाज में सच्ची शिक्षा देने वाले हाथ कब तक कांपते रहेंगे?