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आध्यात्मिक गुरू स्वामी गोविंद गिरी ने की हिन्दू की व्याखा

हिन्दू का आशय उपासना पद्धति नहीं, यह समन्वय का महाधर्म है

31 जनवरी 2026 को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में वह दोपहर मेरे लिए श्री सीमेंट द्वारा आयोजित मात्र एक प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं, बल्कि वैचारिक पुनर्जन्म का क्षण थी। विश्व प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु स्वामी गोविंद गिरी महाराज के सानिध्य में बिताए वे पल जिज्ञासा और समाधान के बीच का सेतु बन गए।

जब उन्होंने ‘हिन्दू’ शब्द की व्याख्या शुरू की, तो वह किसी संकीर्ण परिभाषा में नहीं सिमटी, बल्कि ब्रह्मांडीय विस्तार के साथ गूंज उठी। मेरी और शायद वहां मौजूद कई लोगों की यह धारणा टूट गई कि हिन्दू केवल एक पूजा पद्धति है।

स्वामी जी ने स्पष्ट किया कि हिन्दू होना एक जीवन दर्शन है, जो सृष्टि के कण-कण को जोड़ने की सामर्थ्य रखता है। अक्सर हम ‘धर्म’ और ‘उपासना पद्धति’ को एक ही तराजू में तौलने की भूल कर बैठते हैं।

स्वामी जी ने इस पर बहुत सूक्ष्म प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि उपासना पद्धति इस बात पर निर्भर करती है कि आप ईश्वर को किस रूप में पूजते हैं। लेकिन ‘धर्म’ वह तत्व है जो धारण किया जाता है।

हिन्दू धर्म उन शाश्वत मूल्यों का समूह है जो मानवता को जीवंत रखते हैं। स्वामी जी के शब्दों में, धर्म वह है जो व्यक्ति को उसके अस्तित्व के हर स्तर पर जोड़ता है। उन्होंने बताया कि जो व्यक्ति, समाज, प्रकृति और परमात्मा के बीच संतुलन और समन्वय स्थापित करे, वही धर्म है।

इस दृष्टि से हिन्दू धर्म किसी एक पंथ, ग्रंथ या पूजा-विधि तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक समग्र और सर्वसमावेशी प्रणाली है। हिन्दू धर्म व्यक्ति को आत्मकेंद्रित नहीं बनाता, बल्कि उसे समाज और प्रकृति के प्रति उत्तरदायी बनाता है।

हिन्दू दर्शन में व्यक्ति का विकास तभी पूर्ण माना जाता है, जब वह समाज के हित में और प्रकृति के संरक्षण के साथ आगे बढ़े। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में नदियों को मां, पृथ्वी को माता और वृक्षों को देवतुल्य माना गया है। यह दृष्टि केवल धार्मिक भावना नहीं, बल्कि एक गहन पर्यावरणीय चेतना को दर्शाती है, जो आधुनिक विश्व आज पुन: सीखने का प्रयास कर रहा है।

स्वामी गोविंद गिरी महाराज ने हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा पर भी विस्तार से प्रकाश डाला।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत हिन्दू राष्ट्र था, है और आगे भी रहेगा। किंतु इसका अर्थ किसी एक धर्म विशेष का वर्चस्व स्थापित करना नहीं है। यहां उन्होंने राष्ट्र और साम्राज्य के बीच के अंतर को बहुत सरल और प्रभावी ढंग से समझाया।

उनके अनुसार, भारत हिन्दू राष्ट्र है, परंतु हिन्दू साम्राज्य नहीं। क्योंकि हिन्दू धर्म का मूल स्वभाव ही साम्राज्यवादी नहीं, बल्कि समन्वयकारी है। हिन्दू का अर्थ ही है जो सभी उपासना पद्धतियों का सम्मान करे। यही कारण है कि भारत की भूमि पर विभिन्न धर्म, पंथ और संप्रदाय सह-अस्तित्व के साथ फले-फूले हैं।

स्वामी जी ने कहा कि यदि हिन्दू धर्म संकीर्ण होता, तो यह विविधता कभी संभव नहीं होती। उन्होंने वसुधैव कुटुंबकम और सर्वे भवन्तु सुखिन: जैसे सूत्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि ये केवल श्लोक या आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि हिन्दुत्व की आत्मा हैं।

पूरी दुनिया को एक परिवार मानने की भावना और सभी के सुख की कामना करना—यह दृष्टि केवल हिन्दू धर्म में ही इतनी सशक्त रूप से दिखाई देती है। यह धर्म व्यक्ति को केवल अपने मोक्ष या कल्याण तक सीमित नहीं रखता, बल्कि समस्त सृष्टि के कल्याण की बात करता है।

स्वामी गोविंद गिरी महाराज ने यह भी रेखांकित किया कि हिन्दू धर्म में किसी पर अपनी मान्यता थोपने की प्रवृत्ति नहीं है। यहां प्रश्न पूछने, तर्क करने और सत्य की खोज करने की स्वतंत्रता है। उपनिषदों से लेकर गीता तक, संवाद और चिंतन की परंपरा दिखाई देती है। यही कारण है कि हिन्दू धर्म समय के साथ विकसित होता रहा है, पर अपनी मूल चेतना को कभी नहीं खोया।

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान यह स्पष्ट अनुभव हुआ कि स्वामी जी हिन्दुत्व को किसी राजनीतिक नारे या संकीर्ण पहचान के रूप में नहीं, बल्कि मानवता के कल्याण की जीवन-दृष्टि के रूप में देखते हैं। उन्होंने कहा कि जब हिन्दू राष्ट्र की बात होती है, तो कुछ लोग इसे भय या विभाजन से जोड़ देते हैं, जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है।

हिन्दू राष्ट्र का अर्थ है—ऐसा राष्ट्र जहां सभी को अपनी आस्था, भाषा और संस्कृति के साथ जीने की स्वतंत्रता हो। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की आत्मा उसकी सनातन संस्कृति में बसती है। इस संस्कृति ने कभी किसी को पराया नहीं माना।

चाहे बौद्ध हों, जैन हों, सिख हों, ईसाई हों या मुस्लिम-भारत की भूमि ने सभी को आश्रय दिया। यह सहिष्णुता कमजोरी नहीं, बल्कि हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी शक्ति है। इस संवाद ने यह भी समझाया कि आधुनिक समय में हिन्दू धर्म को केवल कर्मकांड या त्योहारों तक सीमित कर देना एक बड़ी भूल है।

हिन्दुत्व का वास्तविक स्वरूप जीवन मूल्यों में दिखाई देता है सत्य, अहिंसा, करुणा, सेवा और सह-अस्तित्व। जब इन मूल्यों को समाज और राष्ट्र के स्तर पर अपनाया जाता है, तभी एक सशक्त और समरस राष्ट्र का निर्माण होता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)