• Home
  • धर्म
  • स्वामी योगेश्वराचार्य ने रासलीला की महिमा का किया बखान, धर्माचार्य ने प्रतापगढ़ की धरती पर किया सम्मान
स्वामी योगेश्वराचार्य ने रासलीला की महिमा का किया बखान, धर्माचार्य ने प्रतापगढ़ की धरती पर किया सम्मान

स्वामी योगेश्वराचार्य ने रासलीला की महिमा का किया बखान, धर्माचार्य ने प्रतापगढ़ की धरती पर किया सम्मान

प्रतापगढ़, 17 अक्टूबर 2025। प्रतापगढ़ की पावन धरती पर सगरा ढलान में श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ सप्ताह का भव्य आयोजन हो रहा है। यहां जगद्गुरु रामानुजाचार्य श्री श्री 1008 स्वामी योगेश्वराचार्य जी महाराज, पीठाधीश्वर अतुलेश्वर धाम इंद्रप्रस्थ द्वारा कथा सुनाई जा रही है। इस कथा के माध्यम से भक्तों पर भक्ति और ज्ञान की अमृत वर्षा हो रही है।

कथा के आयोजन में धर्माचार्य ओमप्रकाश पांडेय अनिरुद्ध रामानुज दास ने स्वामी जी का माल्यार्पण और अंगवस्त्र प्रदान कर भव्य स्वागत किया। उन्होंने कहा कि प्रतापगढ़ की धरती धन्य है, जहां धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी, सार्वभौम माधवाचार्य जी और परम विद्वान व्याकरणाचार्य स्वामी जी, पीठाधीश्वर बैकुंठ धाम मंदिर, प्रयागराज का अवतरण हुआ।

यही नहीं, स्वामी योगेश्वराचार्य जी का भी जन्म इसी पावन भूमि पर हुआ, जो नि:स्वार्थ भाव से इंद्रप्रस्थ के अतुलेश्वर धाम में बालकों को वेद, वेदांग, संस्कृत और संस्कारों की शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। साथ ही, लोगों को श्री वैष्णव बनाने का पुनीत कार्य कर रहे हैं। कथा के दौरान स्वामी योगेश्वराचार्य जी ने श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में वर्णित रास पंचाध्यायी की गहन व्याख्या की।

उन्होंने कहा कि रासलीला के पांच अध्याय इसके पंच प्राण हैं। रास शब्द का मूल रस है और रस स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हैं। उन्होंने वेदों का उल्लेख करते हुए कहा, रसो वै स:, अर्थात भगवान श्रीकृष्ण ही रस हैं। रास वह दिव्य क्रीड़ा है, जिसमें एक रस अनेक रसों के रूप में प्रकट होकर अनंत रस का आस्वादन करता है। भगवान श्रीकृष्ण ने शरद पूणिर्मा की रात्रि में महारास किया था।

स्वामी जी ने भ्रांतियों को दूर करते हुए कहा कि कुछ लोग मानते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण ने गोपिकाओं के वस्त्र चुराए थे, परंतु यह सत्य नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण ब्रह्म हैं, गोपिकाएं जीव हैं और उनके वस्त्र अविद्या का प्रतीक हैं। भगवान ने गोपिका रूपी जीव के अविद्या रूपी वस्त्र का हरण किया, अर्थात जीव को अज्ञान से मुक्त किया। स्वामी जी ने साधना के दो भेदों की चर्चा की। मर्यादा पूर्ण वैध साधना और मर्यादा रहित अवैध प्रेम साधना।

उन्होंने कहा कि वियोग ही संयोग का पोषक है। जैसे नन्हा बालक दर्पण या जल में अपने प्रतिबिंब के साथ खेलता है, वैसे ही भगवान श्रीकृष्ण और ब्रज सुंदरियों ने रमण किया। श्रीमद्भागवत के रास पंचाध्यायी पर अनेक विद्वानों जैसे जगद्गुरु श्री वल्लभाचार्य, श्रीधर स्वामी और श्री जीव गोस्वामी ने भाष्य और टीकाएं लिखी हैं। स्वामी जी ने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण आत्मा हैं, श्री राधा आत्माकार वृत्ति हैं और गोपियां आत्माभिमुख वृत्तियां हैं। उनका धारा प्रवाह आत्मरमण ही रास है। रासलीला की महिमा किसी भी दृष्टिकोण से देखने पर और भी पुष्ट होती है।

भक्तों को सावधान करते हुए स्वामी जी ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का अनुकरण केवल वही कर सकते हैं। श्री शुकदेव जी ने रास पंचाध्यायी के अंत में स्पष्ट किया है कि भगवान के उपदेशों का पालन करना चाहिए, पर उनके सभी आचरणों का अनुकरण नहीं करना चाहिए।

धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि उन्होंने वृंदावन में वर्षा के बीच वृक्षों पर बैठकर भक्तों को रास पंचाध्यायी का वर्णन सुनाया था। भगवान श्रीकृष्ण को विभु, परमेश्वर, लक्ष्मीपति, योगेश्वर और आत्माराम बताते हुए स्वामी जी ने कहा कि जो पुरुष श्रद्धा के साथ रासलीला का श्रवण और वर्णन करता है, उसके हृदय का काम रोग शीघ्र नष्ट हो जाता है। उसे भगवान का प्रेम प्राप्त होता है और वह माया से परे होकर काम पर विजय प्राप्त करता है।

कार्यक्रम में जगद्गुरु रामानुजाचार्य श्री श्री 1008 स्वामी अवधेश प्रपन्नाचार्य, पूर्व मंत्री महेंद्र सिंह के प्रतिनिधि पं. दिनेश शर्मा, राधेश्याम ओझा, अरुण ओझा, मुरलीधर ओझा, मल्टी ओझा, महंत पं. राम पूजन तिवारी, के.पी. चतुर्वेदी, अवधेश उपाध्याय, विजय मिश्रा, रोहित कुमार, सुशील मिश्रा, रविराज, विकास ओझा, आनंद ओझा, उपेंद्र और अंबुज मिश्र सहित भारी संख्या में भक्त उपस्थित थे।