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25 दिसंबर को तुलसी जयंती नहीं, कार्तिक पूर्णिमा को हुआ था प्राकट्य: अनिरुद्ध रामानुज दास

25 दिसंबर को तुलसी जयंती नहीं, कार्तिक पूर्णिमा को हुआ था प्राकट्य: अनिरुद्ध रामानुज दास

प्रतापगढ़, 24 दिसंबर 2025। रामानुज आश्रम प्रतापगढ़ के धर्माचार्य ओमप्रकाश पांडे अनिरुद्ध रामानुज दास ने स्पष्ट किया है कि 25 दिसंबर को तुलसी जयंती मानना शास्त्रोक्त नहीं है। उन्होंने श्रद्धालुओं से अपील की कि किसी भ्रम या बहकावे में आकर इस दिन को तुलसी जयंती के रूप में न मनाएं, बल्कि शास्त्रों के निर्देशों के अनुसार ही आचरण करें।

धर्माचार्य ने देवी भागवत के नवम स्कंध के 17वें अध्याय का उल्लेख करते हुए बताया कि माता तुलसी का प्राकट्य कार्तिक पूर्णिमा, शुक्रवार के दिन हुआ था। इसी दिन गंधमादन पर्वत पर राजा धर्मध्वज की पत्नी माधवी के गर्भ से माता लक्ष्मी के अंश के रूप में तुलसी का जन्म हुआ। इसलिए तुलसी जयंती का संबंध 25 दिसंबर से नहीं है।

उन्होंने बताया कि माता तुलसी ने बद्रिकाश्रम में दीर्घकाल तक कठोर तपस्या की थी। ब्रह्मा जी के वरदान और भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से उन्हें विशेष स्थान प्राप्त हुआ। तुलसी का जीवन त्याग, तप और भक्ति का प्रतीक है, जिसे समझना और अपनाना ही सच्ची श्रद्धा है।

अनिरुद्ध रामानुज दास ने कहा कि न तो आज के दिन तुलसी का जन्म हुआ और न ही विवाह। शास्त्रों के विपरीत परंपराओं का अनुसरण करने से सनातन धर्म की मूल भावना को क्षति पहुंचती है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि देखा-देखी नहीं, बल्कि प्रमाणित शास्त्रीय परंपराओं के अनुसार ही पर्व और पूजन करना चाहिए।

उन्होंने बताया कि माता तुलसी की पूजा पूरे वर्ष की जानी चाहिए। कार्तिक मास में शालिग्राम भगवान की एक तुलसी पत्र से पूजा करने पर अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है, वहीं मार्गशीर्ष मास में तुलसी की मंजरी से सेवा भी पुण्यदायी मानी गई है। संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि शास्त्रसम्मत आचरण ही सनातन धर्म की सच्ची रक्षा है।