एक महिला कर्मचारी ने यूनियन के इसी नेता पर यौन उत्पीड़न का गंभीर आरोप लगाया
रायपुर, 17 मार्च 2024। मजदूरों की आवाज बुलंद करने वाले, उनके अधिकारों के तथाकथित पहरेदार—बी. राजा राव की असलियत अब सामने आ गई है। जिस नेता को मजदूरों ने अपना हितैषी समझा, वही उनके विश्वास को तार-तार करता निकला। दंतेवाड़ा जिले के बचेली से आई यह खबर न केवल शर्मनाक है, बल्कि मजदूर यूनियन की छवि पर एक गहरा धब्बा भी लगा रही है।
एक महिला कर्मचारी ने यूनियन के इसी नेता पर यौन उत्पीड़न का गंभीर आरोप लगाया है। यह वही बी. राजा राव हैं, जिनकी गूंज एनएमडीसी के बचेली परियोजना में बतौर मसीहा फैली थी। लेकिन इस मसीहा की असलियत कुछ और ही निकली। पीड़िता का कहना है कि राजा राव ने न केवल उसके साथ अभद्रता की, बल्कि उसकी निजता को ठेस पहुंचाने की कोशिश की।
शिकायत के मुताबिक, जब महिला कर्मचारी अपने कार्यालय में अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रही थी, तभी बी. राजा राव ने मौके का फायदा उठाकर उसका हाथ पकड़ने और उसके चेहरे को छूने की कोशिश की। विरोध करने पर वह बदसलूकी पर उतर आया और अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया। यह सिलसिला तब और भयावह हो गया, जब वह बार-बार किसी न किसी बहाने से कार्यालय आने लगा।
पीड़िता ने साहस जुटाकर इस पूरे मामले की जानकारी कंपनी के उच्च अधिकारियों को दी, जिसके बाद प्रबंधन ने आंतरिक जांच शुरू की। जांच के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि बी. राजा राव दोषी है। नतीजतन, कंपनी ने उसे तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया।
विश्वास का दोहन
यह घटना केवल एक महिला कमर्चारी के उत्पीड़न तक सीमित नहीं है। यह एक व्यापक षड्यंत्र और विश्वासघात की कहानी भी बयां करती है। बी. राजा राव खुद को मजदूरों का संरक्षक बताकर उनकी सहानुभूति जीतता रहा, लेकिन अंदरखाने उसकी मंशा कुछ और ही थी।
- कभी मजदूरों को उकसाकर प्रबंधन के खिलाफ भड़काना,
- कभी उत्पादन को बाधित करना,
- और अब यह घिनौना कृत्य—क्या यही मजदूर यूनियन का असली उद्देश्य रह गया है?
विश्वसनीयता पर सवाल
यूनियन का कार्य मजदूरों और प्रबंधन के बीच संतुलन बनाए रखना होता है, लेकिन कुछ भ्रष्ट नेता इसे अपनी जागीर समझ बैठे हैं। बी. राजा राव इसका सबसे ताजा उदाहरण है, जिसने न सिर्फ यूनियन की ताकत का दुरुपयोग किया, बल्कि महिलाओं को भी अपने शिकार की सूची में शामिल कर लिया।
यह मामला सिर्फ बचेली या छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे मजदूर संगठनों की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान खड़ा कर देता है। जब मजदूरों की रक्षा करने वाला ही उनके अधिकारों को कुचलने लगे, तो फिर न्याय की उम्मीद किससे की जाए?
अब यह देखना होगा कि मजदूर संगठन इस पर क्या रुख अपनाते हैं—क्या वे इसे एक काली रात मानकर भुला देंगे, या फिर इस धब्बे को हमेशा के लिए मिटाने का प्रयास करेंगे?