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कब है तुलसी जयंती, कैसे करें पूजन, अनिरुद्ध रामानुज दास ने सुनाई पूरी कथा

कब है तुलसी जयंती, कैसे करें पूजन, अनिरुद्ध रामानुज दास ने सुनाई पूरी कथा

प्रतापगढ़, 24 दिसंबर 2025। रामानुज आश्रम प्रतापगढ़ के धर्माचार्य ओम प्रकाश पांडेय अनिरुद्ध रामानुज दास ने तुलसी जयंती के बारे में भक्तों को विस्तार से जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि देवी भागवत के अनुसार नवम स्कंद के 17 अध्याय के अंतर्गत यह कथा आती है। एक दिन भगवान नारायण ने कहा हे नारद धर्मध्वज नाम के एक राजा थे उनकी पत्नी का नाम माधवी था।

गंधमादन पर्वत पर बिहार करते हुए लगभग देव वर्ष अनुसार 100 वर्ष व्यतीत हो गए माधवी के एक शतवर्षीय गर्भ रह गया कार्तिक की पूणिर्मा शुक्रवार के दिन उसके गर्भ से एक दिव्य कन्या उत्पन्न हुई उस समय शुभ तिथि शुभ वार नक्षत्र एवं लग्न ग्रह भी शुभ सूचक थे। माता लक्ष्मी के अंश से उस कन्या ने जन्म लिया वह श्याम और सकेशी थी। इसलिए विद्वान पुरुषों ने उसका नाम तुलसी रखा।

सभी लोगों के रोकने के बावजूद वह तपस्या हेतु बद्रिकाश्रम में चली गई उसने देवमान से 100000 वर्ष तक घोर तप किया तुलसी देवी ने 30 सहस्त्र वर्षों तक फल और जल का सेवन किया 30 सहस्त्र वर्षों तक केवल पत्राहार किया तथा 40000 वर्षों तक केवल वायु का सेवन करके अपने प्राणों को टिका कर रखा। 10 सहस्त्र तक वह निराहार रही जिसके कारण उसका शरीर अत्यंत जीर्ण हो गया। तब ब्रह्मा जी उसे उत्तम वर देने के लिए बद्रिकाश्रम में पधारे।

पितामह से उसने कहा पूर्व जन्म में मै तुलसी नाम की गोपी थी, वह गोलोक में रहती थी भगवान श्री कृष्ण की प्रिया उनकी सेविका उनकी अर्धांगिनी तथा उनकी प्रेयसी सखी आदि सब कुछ होने का मुझे सौभाग्य प्राप्त था। एक दिन रास की अधिष्ठात्री देवी भगवती राधिका जी ने श्री कृष्ण की भत्सर्ना करके मुझे ईर्ष्या बस क्रोध से श्राप दे दिया। राधा जी के श्राप के कारण मुझे मानव योनि में जन्म लेना पड़ा। ब्रह्मा जी कहते हैं सुदामा नामका गोप भगवान श्री कृष्ण के अंश से ही दनुवंश में उत्पन्न हुआ है। जो शंखचूड़ नाम से जगत में प्रसिद्ध है।

परमात्मा श्री कृष्ण का अंश होने के कारण उसे अपने पूर्व जन्म की सारी बातें स्मरण है वही तुम्हारा पति होगा। भगवान श्री कृष्ण तुम्हें प्राणों से भी अधिक प्रिय समझेंगे भगवान नारायण की कृपा से तुम वृक्ष के रूप में भारतवर्ष में उत्पन्न होगी। तुलसी ने कहा हे प्रभु हमें चतुर्भुज भगवान श्री विष्णु के स्थान पर दो भुजा धारी भगवान श्री कृष्ण अति प्रिय है। इसलिए हम श्री कृष्ण को प्राप्त करना चाहते हैं क्योंकि पूर्व जन्म में श्रृंगार रस में मैं अतृप्त रह चुकी हूं।

ब्रह्मा जी के आशीर्वाद से राधा जी ने तुलसी को स्वयं षोडषाक्षर मंत्र की दीक्षा दी और साथ ही स्त्रोत कवच एवं पूजा की विधि को बताया ।भगवती तुलसी ने पुन: भगवान श्री कृष्ण की आराधना किया जिससे उन्होंने भगवान श्री कृष्ण को प्राप्त किया।

25 दिसंबर के दिन ना तो तुलसी का जन्म हुआ ना तो तुलसी का विवाह हुआ। हमें किसी की देखा देखी नहीं करनी चाहिए । हमारा जो शास्त्र कहता है उसके अनुसार चलना चाहिए। शास्त्र के विपरीत कार्य करने से सनातन धर्म का क्षय होता है। वैसे माता तुलसी की पूजा पूरे वर्ष करनी चाहिए और कार्तिक मास में यदि भगवन शालिग्राम की आप एक तुलसी पत्र से भी पूजा करते हैं तो अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

मार्गशीर्ष मास में तुलसी की मंजरी से भगवान की सेवा करने से भी अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। जनना शौच और मरणा शौच में तुलसी की कंठी को धारण करना चाहिए कोई दोष नहीं होता, किंतु शौच में जाते समय अर्थात लैट्रिन या टॉयलेट में जाते समय कंठी को उतार करके लैट्रिन और टॉयलेट करना चाहिए।