अमेठी, 17 अक्टूबर 2025। फ़ाइलेरिया बेहद घातक बीमारी है। छोटी सी सावधानी अपनाकर इससे बचा जा सकता है और इसके परिजीवियों को हमेशा के लिए दूर किया जा सकता है। इस बारे में 16 अक्टूबर 2025 को मुख्य चिकित्सा अधिकारी अमेठी पर विस्तार से जानकारी प्रदान की गयी। यहां राष्ट्रीय फ़ाइलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम के तहत अभिमुखीकरण कार्यक्रम हुआ। इसमें सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी मौजूद रहे।
जिला मलेरिया अधिकारी डॉ प्रदीप तिवारी ने फ़ाइलेरिया के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि फाइलेरिया को हाथी पाव भी कहते हैं जो कि मच्छर के काटने से फैलता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के अनुसार फाइलेरिया, दुनिया भर में दीर्घकालिक दिव्यांगता के प्रमुख कारणों में से एक है।
आमतौर पर बचपन में होने वाला यह संक्रमण लिम्फैटिक सिस्टम को नुकसान पहुंचाता है और अगर इससे बचाव न किया जाए तो इससे शारीरिक अंगों में असामान्य सूजन होती है। फाइलेरिया के कारण चिरकालिक रोग जैसे; हाइड्रोसील (अंडकोष की थैली में सूजन), लिम्फेडेमा (अंगों की सूजन) व काइलूरिया (दूधिया सफेद पेशाब) से ग्रसित लोगों को अक्सर सामाजिक बोझ सहना पड़ता है, जिससे उनकी आजीविका व काम करने की क्षमता भी प्रभावित होती है।
फाइलेरिया की मुख्यतः चार अवस्थाएं होती हैं। पहली और दूसरी अवस्था में यदि इलाज हो जाता है तो फाइलेरिया पूरी तरह से ठीक हो जाता है। इलाज में देरी अर्थात तीसरी और चौथी अवस्था का फाईलेरिया ठीक नहीं होता है।
कैसे फैलता है फाइलेरिया
मच्छर जब किसी फाइलेरिया ग्रसित व्यक्ति को काटता है तो फाइलेरिया के परजीवी जिन्हें हम माइक्रोफाइलेरिया कहते है वह मच्छर के रक्त में पहुंच जाता है। यही मच्छर जब किसी स्वस्थ व्यक्ति को काटता है तो फाइलेरिया के परजीवी स्वस्थ व्यक्ति के रक्त में पहुंच कर उसे संक्रमित कर देते हैं। किसी भी व्यक्ति को संक्रमण के पश्चात बीमारी होने में पांच से 15 वर्ष लग सकते हैं |
यदि हम इन लक्षणों को पहचान लें और समय से जांच कराकर इलाज करें तो हम इस बीमारी को बढ़ने से रोक सकते हैं। फाइलेरिया की जांच रात के समय होती है। जांच के लिए रक्त की स्लाइड रात में बनायी जाती है क्योंकि इसके परजीवी दिन के समय रक्त में सुप्तावस्था में होते हैं और रात के समय सक्रिय हो जाते हैं।
फ़ाइलेरियारोधी दवा का सेवन करें
सर्वजन दवा सेवन यानि मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एमडीए) के तहत पांच सालों तथा आईडीए (आइवरमेक्टिन, डाईइथाइल कार्बामजीन और एल्बेंडाजोल) के तहत लगातार तीन सालों तक साल में एक बार दवा का सेवन करने से इस बीमारी से बचा जा सकता है। इसलिए जब भी आशा और आंगनबाड़ी लोगों को फाइलेरिया की दवा का सेवन कराने आयें तो जरूर फ़ाइलेरियारोधी दवा का सेवन करें। यह दवाएं फाइलेरिया के परजीवियों को तो मारती ही हैं साथ में पेट के अन्य कीड़ों , खुजली और जूं के खात्मे में भी मदद करती हैं।
दो साल से कम आयु के बच्चों, गर्भवती महिलाओं और गंभीर रोगों से ग्रसित व्यक्तियों को छोड़कर सभी को इन दवाओं का सेवन करना चाहिए। फ़ाइलेरियारोधी दवा के सेवन के बाद कभी-कभी सिर में दर्द, शरीर में दर्द, बुखार, उल्टी तथा बदन पर चकत्ते एवं खुजली देखने को मिलती है लेकिन इससे घबराने की जरूरत नहीं है। मरते हुए परजीवियों के प्रतिक्रियास्वरुप यह होता है जो कि आमतौर पर स्वतः ठीक हो जाते हैं।
मच्छर से बचकर रहें
पाथ संस्था की श्रीमती प्रज्ञा ने बताया कि यह बीमारी लाइलाज है। इसका केवल प्रबन्धन किया जा सकता है। नियमित व्यायाम और फ़ाइलेरिया प्रभावित अंगों की देखभाल से इस बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है।
मच्छर गन्दी जगह पर पनपते हैं। इसलिए हमें अपने घर और आस-पास मच्छरजनित परिस्थितियां नहीं उत्पन्न करनी चाहिए। साफ़ सफाई रखें, फुल आस्तीन के कपड़े पहने, चाहिए, मच्छरदानी का उपयोग करें, मच्छररोधी क्रीम लगायें और दरवाज़ों और खिड़कियों में जाली का उपयोग करें ताकि मच्छर घर में न प्रवेश करें।
इस अवसर पर सुशील कुमार सहायक मलेरिया अधिकारी, वीके सोनी और प्रदीप मिश्रा मलेरिया निरीक्षक तथा विनीत मौर्य जिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता मौजूद रहे।













