संपादकीय

सवाल उठाइए, लेकिन प्रमाण के साथ

Ramesh Pandey
By Ramesh Pandey On सितम्बर 25, 2026
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चुनाव आयोग पर उठे सवाल पर लेख

भारत निर्वाचन आयोग देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था है। इसलिए उसके कामकाज पर सवाल उठाना लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन सवाल और आरोप के बीच एक बुनियादी अंतर होता है।सवाल तथ्यों और प्रमाणों के साथ पूछे जाते हैं, जबकि केवल आशंका या आरोप के आधार पर किसी पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करना अलग बात है।

मौजूदा विवाद में यदि निर्वाचन आयोग के भीतर किसी निर्णय को लेकर वास्तविक असहमति दर्ज हुई है, तो उससे जुड़े दस्तावेज, आपत्तियां, निर्णय प्रक्रिया और उनका निपटारा सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनना चाहिए। लेकिन केवल किसी रिपोर्ट में व्यक्त आरोपों या संभावनाओं के आधार पर यह निष्कर्ष निकाल देना कि भारत की पूरी निर्वाचन प्रणाली संदिग्ध है, लोकतांत्रिक बहस को तथ्य से दूर ले जा सकता है।

भारत की निर्वाचन प्रणाली पर अंगुली उठाना कोई सामान्य राजनीतिक आरोप नहीं है। इसका सीधा संबंध करोड़ों मतदाताओं के उस विश्वास से है जिसके आधार पर लोकतांत्रिक व्यवस्था चलती है। इसलिए इतनी बड़ी संस्था पर गंभीर आरोप लगाए जाएं तो उनके पीछे उतने ही गंभीर और प्रमाणित तथ्य भी होने चाहिए।

राजनीतिक दलों को सरकार और संवैधानिक संस्थाओं से सवाल पूछने का पूरा अधिकार है। मीडिया को भी सत्ता और संस्थाओं की पड़ताल करने का अधिकार है। लेकिन इन दोनों के साथ एक जिम्मेदारी भी जुड़ी है-आरोप और तथ्य के बीच की सीमा स्पष्ट रखना।

बिना पर्याप्त तथ्य के निर्वाचन प्रणाली को कटघरे में खड़ा करना और लगातार ऐसे आरोपों को राजनीतिक संघर्ष का हथियार बनाना समाज में अविश्वास और तनाव बढ़ा सकता है। किसी संवैधानिक संस्था की आलोचना और पूरी चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर संदेह पैदा करने के बीच की इस रेखा को समझना आज पहले से अधिक जरूरी है।

इसलिए इस पूरे विवाद की असली मांग यही होनी चाहिए- आरोपों की स्वतंत्र जांच हो, दस्तावेज सामने आएं, निर्वाचन आयोग अपने निर्णयों की प्रक्रिया स्पष्ट करे और राजनीतिक दल भी अपने दावों के समर्थन में प्रमाण प्रस्तुत करें।

लोकतंत्र सवालों से मजबूत होता है, लेकिन बिना प्रमाण के लगाए गए गंभीर आरोप लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास को मजबूत नहीं, कमजोर कर सकते हैं। इसलिए बहस होनी चाहिए-खुलकर, तीखी भी हो सकती है, लेकिन उसकी बुनियाद तथ्य, दस्तावेज और प्रमाण होने चाहिए।

भारत निर्वाचन आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इन दिनों इंडिया गठबंधन में शामिल राजनैतिक दलों के निशाने पर हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष व कांग्रेस के सांसद राहुल गांधी, पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल विशेष रूप से सक्रिय हैं। इन सब के पास इंडियन एक्स्रपेस में छपी रिपोर्ट ही केवल एक आधार है। इस पर हम आज अपने इस लेख में विश्लेषण कर रहे हैं।

हमारा आशय मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की तरफदारी करना नहीं है, सिर्फ तर्क की कसौटी पर कसना है। हर कोई जानकार यह जानता है कि भारत निर्वाचन आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों अन्य चुनाव आयुक्त के पास सिमिलर शक्तियां होती हैं। यह तीना आयुक्त जो फैसले लेते हैं, उनका सिर्फ दो आधार होता है। पहला सर्वसम्मति और दूसरा होता है बहुमत।

जब फैसला सर्वसम्मति से होता है तो ड्राफट पर तीनो आयुक्तों के हस्ताक्षर होते हैं। अगर कोई आयुक्त फैसले से सहमत नहीं है तो वह अपने हस्ताक्षर क्यों करेगा। ऐसा तो हो नहीं सकता कि फैसले से कोई असहमत हो और फिर हस्ताक्षर भी करे। दूसरा आधार होता है बहुमत, यानि अगर दोनों आयुक्त मुख्य चुनाव आयुक्त के तर्क से सहमत नहीं हैं तो वह खुद बहुमत के आधार पर अपने फैसले ले सकते हैं।

ऐसे में इस बात और तर्क की कोई बुनियाद नहीं है कि दोनों आयुक्त मुख्य चुनाव आयुक्त से असहमत हैं। साफ है कि अगर उनकी असहमति होती तो वह दोनों बहुमत के आधार पर खुद अपने फैसले ले सकते थे। अगर वे सहमत नहीं थे तो हस्ताक्षर क्यों करते। यहां एक बात और स्पष्ट करना जरुरी है कि आयुक्तों के पास यह अधिकार है कि उनके फैसले अगर स्वीकार नहीं हो रहे हैं तो वे राष्ट्रपति से मिलकर अपनी बात वहां रख सकते हैं या फिर खुद अपने पद से स्तीफा दे सकते हैं। कोई भी चुनाव आयुक्त कभी कैबिनेट सचिव को पत्र लिखकर अपनी आपत्ति नहीं जताता।

कैबिनेट सचिव का पद प्रशासनिक पद है जबकि आयुक्त का पद न्यायिक शक्ति से निहित है। आयुक्त कैबिनेट सचिव को निर्देश देते हैं न कि उन्हें पत्र लिखकर कोई निवेदन करते हैं। अब दो और बिंदु है जिस पर स्पष्टता किया जाना जरुरी है। इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर में सिर्फ आरोप लगाये गये हैं, संभावना जताई गई है किंतु कोई प्रमा​णिक तथ्य नहीं रखा गया है।

अब ये कहना कि चुनाव आयोग ने इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर का खंडन क्यों नहीं किया तो साफ है कि चुनाव आयोग उस खबर को संज्ञान ही क्यों लेगा जिसमें कोई तथ्य नहीं है। हां चूकि देश के राजनैतिक दलों और विशेष रुप से लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष ने यह मामला उठाया इसलिए चुनाव आयोग ने अपना पक्ष मीडिया में रखा है। दूसरा बिंदु यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कांग्रेस की शीर्ष नेता सोनिया गांधी का नाम वर्ष 1980 में मतदाता सूची में शामिल कर लिया गया था जब वह इस देश की नागरिक नहीं थी, वर्तमान में यह मामला न्यायालय में विचाराधीन है और उस पर सुनवाई होने की तिथि आ गयी है। ऐसे में भारत के निर्वाचन आयोग की पूरी प्रक्रिया को विवाद में खडा करना ही केवल मकसद लग रहा है।

अंत में हम यह कहना चाहते हैं कि चुनाव आयोग के दो आयुक्तों ने आयोग के किसी फैसले पर वास्तविक रुप से आपत्ति की है तो उसकी तथ्यात्मक जांच किया जाना जरुरी है। यह जांच कौन करेगा, यह भी सपष्ट हो जाना चाहिए। दूसरी तरफ यदि चुनाव आयोग यह स्पष्टीकरण देता है कि उसके अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिये गए हैं तो उसे भी गंभीरता से लिया जाना जरुरी है न कि उसे सवालों के घेरे में लिया जाये।

Ramesh Pandey

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रमेश पांडेय (Ramesh Pandey) एक अनुभवी पत्रकार और संपादक हैं, जिन्हें डिजिटल मीडिया और क्षेत्रीय समाचार रिपोर्टिंग में 20 वर्षों का अनुभव है। वर्तमान में वह ASR24 News के मुख्य संपादक के रूप में कार्यरत हैं। रमेश मुख्य रूप से राजनीति, सरकारी योजनाओं और सामाजिक मुद्दों पर गहराई से विश्लेषण करने के लिए जाने जाते हैं। उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य उद्देश्य पाठकों तक सटीक, निष्पक्ष और समय पर जानकारी पहुँचाना है। आप उनसे उनकी आधिकारिक ईमेल और सोशल मीडिया हैंडल्स के माध्यम से जुड़ सकते हैं। https://www.facebook.com/asr24news https://twitter.com/asr24news https://www.youtube.com/@asr24news