Highlights
- व्यक्ति जीवन से विश्व जीवन तक की धारणा, प्रतिष्ठा तथा सुरक्षा भी बिना सामर्थ्य के संभव नहीं
- आध्यात्मिकता, मानवता तथा विश्वबन्धुत्व ही सनातन दृष्टि का लक्षण
- हिन्दू भाव का स्मरण व पोषण भारत की प्रगति व एकता की अनिवार्य आवश्यकता
मुंबई, 20 अक्टूबर 2026। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने नागपुर के रेशिमबाग मैदान में संगठन के विजयादशमी समारोह में हिस्सा लिया। पहले उन्होंने शस्त्र पूजा की। अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कहा, देश के स्वाधिनता के समय जो वातावरण था… उस वातावरण में हमको स्वतंत्र करने के लिए प्रयास करने वाले महापुरुष को और उस समय के समाज को जितनी तपस्या और समर्पण के द्वारा यह सब करना पड़ा, उससे कई गुणा अधिक की आवश्यकता आज की परिस्थिति में पड़ेगी।
जब हम परिस्थिति को देखते हैं तो ध्यान में आता है… अपना भारत विविधता का देश है। यहां अनेक प्रकार की प्राकृतिक विविधता है। इस देश को एक होकर चलना है जो चलता आया है और आगे भी चलना है तो आधारभूत तत्व ऐसा चाहिए जो इन सभी को स्वीकार करेगा, सम्मान देगा, प्रतिष्ठा और सुरक्षा की चिंता करेगा। ऐसा आधार हमारे पास कौन सा है? दुनिया के उपलब्ध विचारों में ऐसा कोई नहीं है।
सौभाग्य से ऐसा विचार परंपरा से हमारे पास है जो मनुष्यता की सनातन खोज है, उसी में मनुष्यता आगे बढ़ती है, उस सुख की खोज के लिए। इसलिए उस सुख को प्राप्त करना यह मनुष्य जीवन का ध्येय है।
हमारे राष्ट्र की चेतना यही सनातन दृष्टि है, जिसे आज हम भारत के लोगों सहित सारा विश्व हिन्दू दृष्टि के नाम से जानता है। कोई विशिष्ट पूजा पद्धति, कोई विशिष्ट खान-पान, रहन-सहन, कोई सामाजिक या राजनीतिक मतवाद किसी विशिष्ट जाति, भाषा, प्रान्त इस की अनिवार्यता इसमें नहीं है।
सबसे ऊपर आध्यात्मिकता, मानवता तथा विश्वबन्धुत्व ही सनातन दृष्टि का लक्षण है। भारतीयों में इस भाव के विद्यमान होने से ही ‘भा’ यानि ज्ञान के प्रकाश में रत भारत, यह भारतीयता की एक परिभाषा बनी है। पूरे विश्व को जोड़ सकने वाले व जोड़ना चाहने वाले, हिन्दू भाव का स्मरण व पोषण भारत की प्रगति व एकता की अनिवार्य आवश्यकता है।
हम सब का परस्पर नाता व भारत के साथ सम्बन्ध यह एक जीवमान सम्बन्ध है जो हृदय का होने से बिना शर्त है। ‘तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहे न रहें’। अपनेपन के, आत्मीयता के अथवा रिश्ते-नातों के संबंधों में कोई शर्तें नहीं होती।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसी हिन्दू भाव को जगाकर सम्पूर्ण समाज को एक सुसंगठित व बल संपन्न समाज बनाने के लिए कार्य कर रहा है। व्यक्ति जीवन से विश्व जीवन तक की धारणा, प्रतिष्ठा तथा सुरक्षा भी बिना सामर्थ्य के संभव नहीं।
संगठित व बल संपन्न हिन्दू समाज की बात करना या उसके लिए कार्य करना सर्व पंथ समादर की भावना अथवा राष्ट्र की भावनिक एकात्मकता के विरुद्ध नहीं है; हिन्दू समाज का विचार व स्वभाव समावेशक होने के नाते संघ कार्य हम सबकी भावनिक एकात्मता, सद्भावना व सदाचार का पोषक ही होगा। पीढ़ी दर पीढ़ी मिलता रहा यह स्वभाव व संस्कार ही कैप्टन स्मित मच्छार को अपनी प्राणों की बाजी लगाकर मनुष्यों के संरक्षण के लिए स्वयं को झोंक देने की प्रेरणा देता है।
