धर्म

पूजा, पाठ, भक्ति दु:खी नहीं, प्रश्न भाव से की जानी चाहिए: संकर्षण शरण

Ramesh Pandey
By Ramesh Pandey On नवम्बर 1, 2026
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संकर्षण शरण

रायपुर, 1 नवंबर 2026। मां कामाख्या धर्मादा ट्रस्ट भारत वर्ष के संयोजन में आयोजित त्रिदिवसीय गीता ज्ञान अमृत वर्षा में गुरुदेव संकर्षण शरण जी के मुखारविंद से श्रद्धालुओं ने गीता कथा का श्रवण किया। गुरुदेव ने गीता के माध्यम से श्रद्धालुओं को जीवन में स्वयं के समीप ईश्वर के होने की अनुभूति कराई और भगवान श्री कृष्ण के विराट स्वरूप का विस्तृत वर्णन किया।

गुरुदेव कहते हैं, भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि महापुरुषों, महावीरों में मैं राम हूँ। मैं तभी शस्त्र उठाता हूं, जब धर्म की हानि होने लगती है। मेरी मर्यादाएं भी हैं। मैं केवल अधर्मियों के खिलाफ शस्त्र उठाता हूं। मेरे और अधर्मियों के शस्त्र उठाने में फर्क है। वे अन्याय और अधर्म के लिए शस्त्र उठाते हैं और मैं न्याय, शुभ कार्यों के लिए शस्त्र उठाता हूं।

संकर्षण शरण जी बताते हैं कि भक्ति मार्ग भी है और भक्ति मंजिल भी है। जब आप ईश्वर की आराधना, भक्ति करते हुए सत्मार्ग पर अग्रसर होते हैं, तब आप भक्ति मार्ग पर होते हैं और जब आपकी भक्ति सफल हो जाती है, तब वही भक्ति आपकी मंजिल भी बन जाती है और आपको ईश्वर से मिला देती है। जब आपका प्रेम और आपकी भक्ति सफल हो जाती है, तब आप ईश्वर को जान पाते हैं, ईश्वर के दर्शन प्राप्त कर पाते हैं और बिल्कुल अर्जुन की तरह, जैसे अर्जुन ने कृष्ण के दर्शन प्राप्त किए, वैसे ही आप भी अपने ईश्वर के विराट स्वरूप का दर्शन प्राप्त कर पाते हैं।

गुरुजी कथा में बताते हैं कि रजोगुण से प्रभावित व्यक्ति हमेशा द्वंद्व में उलझा रहता है। उसे पता नहीं होता कि जीवन में उसे क्या करना है, क्या नहीं करना है। उसे इसका बोध नहीं रहता। वह केवल अपने अहंकार, पद-प्रतिष्ठा और नाम आदि की सिद्धि में लगा रहता है और सारे कार्य बिना श्रद्धा, बिना भक्ति के करता जाता है। गुरुजी बताते हैं कि ऐसा व्यक्ति की प्रवृत्ति और जीवनशैली में असंतुलन के चलते होता है। जब व्यक्ति के तीनों प्राकृतिक गुण असंतुलित हो जाते हैं, तब वह उस गुण के अधीन होकर रह जाता है, जो उसमें सबसे अधिक हावी है।

गुरुजी बताते हैं कि जीवनरूपी रणभूमि में सारे कार्यों को सिद्ध करने के लिए सबसे पहले तीनों गुणों का संतुलित होना आवश्यक है।

गुरुजी यह भी कहते हैं कि आपको रजोगुण से बाहर आने के लिए यह भी निर्णय लेना आवश्यक है कि आपको सुरुचि के अनुसार चलना है या सुनीति के अनुसार। आप रुचि के अनुसार चलते रह जाएँगे, तो आप भटकते रह जाएँगे और आप नीति को प्राथमिकता देकर चलेंगे, तो आप हमेशा सत्मार्ग पर ही रहेंगे। गुरुजी बताते हैं कि आपका स्वाद और आपका भोजन भी यह निर्धारित करते हैं कि आपकी श्रद्धा, भक्ति कैसी है। आप कौन-से गुण से प्रभावित व्यक्ति हैं। जब व्यक्ति अत्यधिक तीखा, खट्टा, मसालेदार भोजन अनियंत्रित रूप से करता है, तो कृष्ण कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति रजोगुण से ग्रसित होते हैं।

व्यक्ति को तीन घंटे से अधिक पहले बना हुआ भोजन नहीं खाना चाहिए, क्योंकि जो व्यक्ति बासी भोजन का अत्यधिक प्रयोग करते हैं, वे तमोगुण से ग्रसित होते हैं। ऐसे लोग अत्यधिक सुस्त, आलसी और बीमारियों से ग्रसित हो जाते हैं तथा कोई भी काम अच्छे से नहीं कर पाते।

और जो व्यक्ति संतुलित, ताजा और साधारण, सरल भोजन करता है, वह व्यक्ति हमेशा स्वस्थ रहता है और फुर्ती से भरा हुआ रहता है, क्योंकि वह सात्त्विक प्रवृत्ति का होता है। इसी तरह उन्होंने सात्त्विक, तामसिक और राजसिक दान के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा कि जब आप दान, यज्ञ और कोई भी कार्य कर्तव्य समझकर करते हैं, तो ये कार्य सात्त्विक होते हैं। यही कार्य आपके पुण्य कर्मों को सफल बनाते हैं।

लोग देर संध्या बेला तक भावविभोर होकर गुरुदेव श्री संकर्षण शरण जी से कथा सुनते रहे और लोगों ने त्रिदिवसीय कथा का श्रवण कर गीता ज्ञान का लाभ प्राप्त किया। साथ ही, अंत में लोगों ने आरती-पूजन के उपरांत मां कामाख्या धर्मादा ट्रस्ट भारत वर्ष द्वारा आयोजित नि:शुल्क स्वास्थ्य शिविर में वासुदेव मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल से आए डॉक्टरों के माध्यम से स्वास्थ्य लाभ और परामर्श प्राप्त किया।

यह जानकारी मीडिया प्रभारी श्रीमती कल्पना शुक्ला ने दी।

Ramesh Pandey

Ramesh Pandey

रमेश पांडेय (Ramesh Pandey) एक अनुभवी पत्रकार हैं, जिन्हें डिजिटल मीडिया और क्षेत्रीय समाचार रिपोर्टिंग में 20 वर्षों का अनुभव है।