प्रतापगढ़, 19 अक्टूबर 2026। रामानुज आश्रम प्रतापगढ़ के धर्माचार्य ओम प्रकाश पांडेय अनिरुद्ध रामानुजदास विजयदशमी को रावण वध की तिथि माने जाने से असहमत हैं। उन्होंने दावा किया कि विजयदशमी का तात्पर्य रावध वध की तिथि से नहीं बल्कि दस विकारों का दहन करने से है।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक वर्ष आश्विन मास शुक्ल पक्ष की दशमी को हम विजयदशमी मानते हैं। हमें मनाना भी चाहिए किंतु विजयदशमी के दिन रावण मारा गया था इसका कहीं प्रमाण नहीं है। दशहरा संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ है दस बुराइयों को हरना। काम, क्रोध, मोह, लोभ, मद, मत्सर, स्वार्थ, अन्याय, अमानवता, अहंकार यदि आपने इनमें से किसी एक पर भी पूर्ण रूप से विजय पा ली तो आपने विजयदशमी मना ली।
वैशाख मास कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मारा गया था रावण
धर्माचार्य ने कई धार्मिक ग्रंथों में इस बात का उल्लेख होने का दावा करते हुए बताया कि भगवान राम ने वैशाख मास कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को रावण का वध किया था। उन्होंने दावा किया कि यह कथा स्कंद पुराण के ब्राह्मखंड धर्मारण्य महात्मय के अंतर्गत श्री रामचंद्र जी के संपूर्ण चरित्र के वर्णन में तथा पद्म पुराण के पाताल खंड में वर्णित है।
उन्होंने बताया, त्रेता युग आने पर ब्रह्मा की 39वीं पीढ़ी में सूर्यवंश में रघुवंश शिरोमणी प्रभु श्रीराम माता कौशल्या और राजा दशरथ के पुत्र के रुप में अवतरित हुए। राजा दशरथ पूर्वकाल में महाराज मनु और माता कौशल्या जी सतरूपा थीं।
14 वर्ष की आयु में महर्षि विश्वामित्र भगवान राम और लक्ष्मण को लेकर वन गए। वहां भगवान राम ने ताड़का का वध और ऋषि पत्नी अहिल्या का उद्धार किया। वहां से राजा जनक के घर जाकर आशुतोष भगवान के धनुष को 15 वर्ष की आयु में तोड़कर 7 वर्ष की अवस्था वाली हो चुकीं मिथिलेश कुमारी सीता से विवाह किया। 27 वर्ष की आयु में श्रीरामचंद्र जी को अयोध्या का युवराज पद देने की तैयारी हुई। उस समय माता कैकई ने राजा दशरथ से दो वर मांगा, पहला राम को वनवास और और दूसरा भरत को अयोध्या की राजगद्दी।
प्रभु श्री रामचंद्र का वनगमन वृतांत
पिता राजा दशरथ के वचन का मान रखते हुए भगवान राम वन को चले गये। उनके साथ पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण भी वन गये। प्रथम रात्रि तमसा नदी के तट पर विश्राम किया दूसरे दिन जनपद प्रतापगढ के आज के ग्राम जगन्नाथपुर मोक्षदा ताल समदरिया का पुरवा, पूरे माधव सिंह, जगदीशपुर, रामनगर, ईश्वरपुर, देवघाट, नारायणपुर, देवापुर, सकली होते हुए संध्याकाल श्रृंगवेरपुर में विश्राम किये। अपने मित्र केवट के परिजनों का कल्याण कर दूसरे दिन रास्ते में रात्रि निवास करते हुए तीसरे दिन भरद्वाज आश्रम चौथे दिन ऋषि बाल्मीकि से मिलते हुए पाँचवे दिन चित्रकूट पहुंचकर पर्णकुटी बनाया। रास्ते में 3 रात तक केवल जल पीकर रहे चौथे दिन फलाहार किया तथा ऋषियों को दर्शन दिया।
सुग्रीव मिलन और बालि का वध
अयोध्या से निकलने के पश्चात साढ़े 12 वर्ष तक वन में रहे। पंचवटी में प्रवास के दौरान शूर्पणखा का आगमन हुआ। माघ मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को वृंद मुहूर्त में जब श्रीराम और लक्ष्मण जी दोनों आश्रम के बाहर थे रावण ने सीता को अकेली पाकर हरण कर लिया। माघ कृष्ण नवमी को रावण के घर में निवास करने वाली सीता की खोज करते हुए दोनों भाई राम और लक्ष्मण जटायु से मिले। आगे चलकर हनुमान से मिलन हुआ। हनुमान ने भगवान राम की सुग्रीव से मित्रता कराई और बालि का वध हुआ।
हनुमान के द्वारा लंका का दहन
अगहन मास शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन संपाती के पता बताने पर हनुमान जी महेंद्र पर्वत से एकादशी को उछलकर 100 योजन चौड़ा समुद्र लांघकर लंका पहुंचे। रात्रि समाप्त होते होते हनुमान जी ने सीता का दर्शन किया। द्वादशी को हनुमान जी अशोक वृक्ष पर बैठे रहे। उसी दिन जानकी जी को विश्वास दिलाने के लिए उन्होंने श्रीरामचन्द्रजी की कथा सुनाई तथा भगवान की अंगूठी माता सीता जी को प्रदान किया।
त्रयोदशी को अक्षय कुमार सहित राक्षसों का वध किया। चतुर्दशी को मेघनाद ने ब्रह्मफांस से हनुमान जी को बांध दिया। हनुमान जी ने लंका को जलाया और पूर्णिमा को पुन: महेंद्र पर्वत पर लौट आए। कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से पांच दिन तक रास्ते में रह कर मधुबन में आए और मधुबन में विध्वंस किया। सप्तमी को राम चंद्र जी की सेवा में पहुंचकर सब समाचार सुनाया और माता सीता का दिया हुआ चिन्ह उन्हें अर्पण किया। अष्टमी को उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में जब विजय संवर्त मुहूर्त व्यतीत हो रहा था ठीक दोपहर के समय में श्री राम चंद्र जी लंका के लिए प्रस्थान किये।
प्रभु श्री रामचंद्र की प्रतिज्ञा और सेतु निर्माण
श्रीराम ने दक्षिण दिशा में जाने की प्रतिज्ञा करते हुए कहा कि मैं समुद्र को लांघकर राक्षसराज रावण का वध करूंगा। 17 दिन तक समुद्र के तट पर वनर सेना की छावनी पड़ी रही। पौष शुक्ल प्रतिपदा से लेकर तृतीया तक वानरी सेना सहित श्री रामचंद्र जी सागर के तट पर रहे। पौष मास की चतुर्थी को विभीषण आकर भगवान की शरणागति लिया। पंचमी को समुद्र पार करने के विषय में विचार किया। उसके बाद 4 दिन तक श्री रामचंद्र जी ने समुंद्र के किनारे उपवास किया चौथे दिन समुद्र से वर प्राप्त हुआ।
समुद्र ने पार उतरने का उपाय बताया। दशमी से सेतु बनने का कार्य प्रारम्भ हुआ। त्रयोदशी को पुल निर्माण का कार्य पूर्ण हो गया। चतुर्दशी को सुबेल पर्वत पर पड़ाव डाला गया। पूर्णिमा से लेकर द्वितीया तक तीन दिनों में सारी सेना समुद्र पार करके लंका पहुंच गई। तृतीया से लेकर दशमीं 8 दिनों तक सेना पड़ी रही। एकादशी के दिन शुक और सारण इन दो मंत्रियो का आगमन हुआ। पौष मास कृष्ण पक्ष को सेना की गणना की गई।
राक्षस और वानरो में घमासान युद्ध का आरम्भ
त्रयोदशी से लेकर अमावस्या तक तीन दिन लंका में रावण ने अपनी सेना संगठन की गणना किया। माघ शुक्ल प्रतिपदा को रावण के दरबार में अंगद जी दूत बनकर गए। उस दिन से 7 दिनों तक अर्थात अष्टमी तक राक्षस और वानरों में घमासान युद्ध हुआ। माघ शुक्ल पक्ष की नवमी की रात में मेघनाथ ने राम लक्ष्मण को नागपाश में बांध लिया। दशमी को गरुड़ जी ने नागपाश से मुक्त कराया। माघ शुक्ला एकादशी से 2 दिन तक युद्ध बंद रहा।
द्वादशी को ही हनुमान जी ने धूम्राक्ष का और त्रयोदशी को अकंपन का वध किया। माघ शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी से लेकर कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तक 3 दिन में नील ने प्रहस्त का वध किया। माघ कृष्ण पक्ष की द्वितीया से लेकर चतुर्थी तक 3 दिनों में श्री रामचंद्र ने तुमुल युद्ध करके रावण को रण स्थल से मार भगाया।
कुंभकरण का वध
पंचमी से अष्टमी तक रावण द्वारा कुंभकरण को जगाया गया। कुंभकरण 4 दिन तक भोजन करता रहा। नवमी से 4 दिन तक कुंभकरण ने युद्ध किया। अंत में श्रीरामचन्द्र जी के हाथ मारा गया। अमावस्या के दिन लंका में उसके लिए शोक मनाया गया। फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की तृतीया के दिन मेघनाथ पराजित हुआ। फाल्गुन शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तक इन दिनों में अतिकाय का वध हुआ। अष्टमी तक 5 दिनों में पांच अन्य राक्षस मारे गए। फाल्गुन कृष्णा द्वितीया के दिन मेघनाथ पराजित हुआ। तृृतीया से लेकर सप्तमी तक 5 दिन युद्ध बंद रहा। अष्टमी को रावण ने माया से युक्त सीता का वध किया। त्रयोदशी से फिर 5 दिनों में लक्ष्मण जी ने युद्ध करके मेघनाथ को मार डाला। चैत्र मास कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को रावण ने यज्ञ की दीक्षा ली और युद्ध को स्थगित रखा।
प्रभु श्रीराम जी द्वारा रावण का वध
चैत्र शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन श्री रामचंद्र के पास मातालि नामक सारथी के साथ इंद्र का रथ आया। चैत्र शुक्ला द्वादशी से लेकर वैशाख मास कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तक 18 दिनों में रामचंद्र जी से रावण का विकराल युद्ध हुआ। वैशाख मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन रावण मारा गया। अमावस्या के दिन रावण आदि राक्षसों के दाह संस्कार हुए। माघ शुक्ल पक्ष की द्वतीया से लेकर चैत्र कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तक 87 दिन के संग्राम में केवल 15 दिन युद्ध बंद रहा शेष 72 दिन युद्ध चालू रहा।
विभीषण का राज्याभिषेक और अयोध्या आगमन
वैशाख शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को श्री रामचंद्र जी रण भूमि में ही रहे। द्वतीया के दिन उन्होंने विभीषण का राज्याभिषेक किया। तृतीया को सीता जी की शुद्धि हुई। वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को श्री रामचंद्र जी पुष्पक विमान पर बैठे और आकाश मार्ग से अयोध्यापुरी की ओर चल दिए। 14 वर्ष पूर्ण होने पर वैशाख शुक्ल पक्ष की पंचमी को रामचंद्र जी वानर सेना के साथ भारद्वाज आश्रम आए।
हनुमान जी ने निषादराज को सूचना दिया और वहां से आज के प्रतापगढ़ में स्थित बालकुनी (बकुलाही) नदी को पार करते हुए जिधर से प्रभु श्री राम आए थे रामनगर होते हुए नंदीग्राम पहुंचकर भरत जी को प्रभु के आगमन की सूचना प्रदान किया। प्रभु श्री राम पुष्पक विमान से श्रृंगवेरपुर में निषादराज गुह को लेते हुए प्रतापगढ़ के ऊपर से होकर नंदीग्राम पहुंचे। वैशाख मास शुक्ल पक्ष की सप्तमी को अयोध्या के राज्य का कार्यभार ग्रहण किया।
