रमेश पाण्डेय
भारतीय लोकतंत्र में शब्दों का चयन और भाषा की मर्यादा खास मायने रखती है। महात्मा गांधी, पं. जवाहर लाल नेहरू, सरदार बल्लभभाई पटेल जैसे अनेकानेक नेताओं ने राजनीति में कभी हिंसक शब्दावली का प्रयोग नहीं किया। नेताओं की भाषा और उनके द्वारा चुने गए शब्द उनकी छवि को परिभाषित करते हैं। समाज और राजनीतिक माहौल को भी प्रभावित करते हैं।
कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेता और वर्तमान में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी भारतीय राजनीति के एक प्रमुख चेहरा हैं। दो बार कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं। उनकी नेतृत्व शैली, विचारधारा और बयानबाजी हमेशा से चर्चा का विषय रही है। हाल ही में, 1 सितंबर 2025 को बिहार की राजधानी पटना में एक रैली के दौरान उनके द्वारा “एटम बम” और “हाइड्रोजन बम” जैसे शब्दों के प्रयोग ने बड़े सवाल उठाए हैं। क्या एक जिम्मेदार नेता को ऐसी हिंसक शब्दावली का सहारा लेना चाहिए।
पटना की रैली में राहुल गांधी ने कहा, अभी तक हुआ वोट चोरी का खुलासा तो एटम बम था, अब आगे जिस खुलासे को हमारी पार्टी सामने लाने वाली है, वह हाइड्रोजन बम होगा। यह बयान उन्होंने कथित तौर पर विपक्षी दलों के खिलाफ और विशेष रूप से सत्ताधारी दल पर निशाना साधते हुए दिया।
उनका इशारा किसी बड़े राजनीतिक खुलासे की ओर था, जिसे वह “हाइड्रोजन बम” की संज्ञा देकर और प्रभावशाली बनाना चाहते थे। हालांकि, इस तरह की शब्दावली का प्रयोग न केवल उनकी छवि को प्रभावित करता है, बल्कि यह भी सवाल उठाता है कि क्या ऐसी भाषा भारतीय लोकतंत्र की गरिमा के अनुरूप है।
राहुल गांधी का यह बयान कोई पहला उदाहरण नहीं है। वह पहले भी “खून की दलाली”, “चौकीदार चोर है” जैसे विवादास्पद और उत्तेजक बयानों के लिए चर्चा में रहे हैं। ये बयान उनके समर्थकों को उत्साहित कर सकते हैं, लेकिन व्यापक स्तर पर समाज में हिंसा, आक्रोश और ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने का जोखिम भी रखते हैं।
“एटम बम” और “हाइड्रोजन बम” जैसे शब्द हिंसा और विनाश का प्रतीक हैं। ये शब्द न केवल आक्रामकता को दर्शाते हैं, बल्कि समाज में पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ा सकते हैं। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में, जहां सामाजिक और धार्मिक संवेदनशीलताएं गहरी हैं, ऐसी भाषा लोगों के बीच वैमनस्य को बढ़ा सकती है।
भारतीय लोकतंत्र में नेताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी बात को तर्क, तथ्य और सभ्य भाषा के माध्यम से प्रस्तुत करें। हिंसक शब्दावली का प्रयोग न केवल राजनीतिक विमर्श को निम्न स्तर पर ले जाता है, बल्कि यह भी संदेश देता है कि नेतृत्व तर्क के बजाय भावनाओं को भड़काने पर अधिक ध्यान दे रहा है।
राहुल गांधी जैसे नेता, जो युवाओं के बीच लोकप्रियता हासिल करने की कोशिश करते हैं, उनकी भाषा का युवा पीढ़ी पर गहरा प्रभाव पड़ता है। हिंसक शब्दावली का बार-बार प्रयोग युवाओं में आक्रामकता को सामान्य बना सकता है, जो दीर्घकाल में सामाजिक सौहार्द के लिए हानिकारक है।
ऐसी भाषा मीडिया में सुर्खियां बनती है और सोशल मीडिया पर वायरल हो जाती है। इससे नेताओं को तात्कालिक ध्यान तो मिल सकता है, लेकिन यह दीर्घकालिक विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाता है। लोग नेताओं को गंभीरता से लेना बंद कर सकते हैं, यदि उनकी भाषा केवल सनसनीखेज बयानों तक सीमित रहती है।
राहुल गांधी ने अपने राजनीतिक करियर में कई बार सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर जोर दिया है। गरीबी, बेरोजगारी, और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर उनके विचार प्रगतिशील और समावेशी रहे हैं। उनकी बयानबाजी में बार-बार हिंसक और उत्तेजक शब्दों का प्रयोग उनकी छवि को धूमिल करता है। यह एक विरोधाभास है कि एक ओर वह शांति, प्रेम और एकता की बात करते हैं, और दूसरी ओर उनकी भाषा में आक्रामकता झलकती है।
2019 के लोकसभा चुनाव में “चौकीदार चोर है” जैसे नारे ने कांग्रेस को अल्पकालिक लोकप्रियता दिलाई, लेकिन यह सत्ताधारी दल के खिलाफ व्यक्तिगत हमले के रूप में देखा गया। नतीजतन, यह नारा कांग्रेस के लिए उल्टा पड़ गया, क्योंकि जनता ने इसे गंभीरता के बजाय नकारात्मकता के रूप में लिया। इसी तरह, “एटम बम” और “हाइड्रोजन बम” जैसे शब्दों का प्रयोग भी गंभीर मुद्दों को हल्का कर सकता है।
भारतीय लोकतंत्र में भाषा की मर्यादा का महत्व अत्यधिक है। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, और सरदार पटेल जैसे नेताओं ने अपनी बात को तर्क और सभ्यता के साथ रखा। उनकी भाषा में शालीनता थी, जो समाज को एकजुट करने में सहायक थी। आज के दौर में, जब सोशल मीडिया और न्यूज चैनल्स ने राजनीतिक विमर्श को और जटिल बना दिया है, नेताओं को अपनी भाषा पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
नेताओं को अपनी बात को सकारात्मक और समाधान-उन्मुख तरीके से प्रस्तुत करना चाहिए। उदाहरण के लिए, वोट चोरी जैसे गंभीर मुद्दे को उठाने के लिए राहुल गांधी तथ्यों और सबूतों पर आधारित भाषा का प्रयोग कर सकते थे, बजाय “एटम बम” जैसे अतिशयोक्तिपूर्ण शब्दों के।
भारत जैसे देश में, जहां विभिन्न धर्म, जाति और संस्कृतियां एक साथ रहती हैं, नेताओं की भाषा ऐसी होनी चाहिए जो सामाजिक एकता को बढ़ावा दे। हिंसक शब्दावली इसके विपरीत काम करती है। राहुल गांधी जैसे नेता न केवल भारत में, बल्कि वैश्विक मंच पर भी भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनकी भाषा उनकी और देश की छवि को प्रभावित करती है। हिंसक शब्दावली अंतरराष्ट्रीय समुदाय में गलत संदेश दे सकती है।
राहुल गांधी को अपनी बात को तथ्यों, आंकड़ों और ठोस सबूतों के साथ प्रस्तुत करना चाहिए। इससे उनकी विश्वसनीयता बढ़ेगी और जनता उनकी बात को गंभीरता से लेगी। उनकी भाषा में सकारात्मकता और समाधान का पुट होना चाहिए। उदाहरण के लिए, “हाइड्रोजन बम” जैसे शब्दों के बजाय वे कह सकते थे कि उनकी पार्टी एक “क्रांतिकारी खुलासा” करने जा रही है, जो लोकतंत्र को मजबूत करेगा।
कांग्रेस पार्टी को अपने नेताओं के लिए भाषा और संचार का प्रशिक्षण आयोजित करना चाहिए, ताकि वे अपनी बात को प्रभावी और मर्यादित ढंग से रख सकें।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
















