रमेश पांडेय
आत्मनिर्भर भारत के लिए तीन बिंदु पर अमल करना जरुरी है। पहला खाद्यान्न की सुरक्षा अर्थात कृषि उपज का सुरक्षित भंडारण किया जाना, दूसरा रसोई में अपने देश का ईंधन और तीसरा खेत में अपने देश का उर्वरक। भारत जैसे कृषि और श्रम प्रधान देश के लिए आत्मनिर्भरता के ये मानबिंदु होने चाहिए। देश की आजादी के 80 साल बीतने को है पर दुर्भाग्य है कि हमारे देश में अभी तक न तो कृषि उपज का सुरक्षित भंडारण किये जाने की व्यवस्था है, न ही रसोई में अपने देश का ईंधन है और न ही खेत में अपने देश का उर्वरक है।
देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वर्ष 2047 तक विकसित भारत का सपना देखा है, पर यह सपना सच तभी होगा जब इन तीन मानबिंदुओं पर प्राथमिकता से काम होगा। विकसित भारत का सपना तभी पूरा होगा जब भारत खाद्यान्न निर्यातक देश बनेगा। आज हमारे देश में दाल की खमी है, खाद्य तेल की कमी है। हमारे देश की रसोई रिफाइंड आयल से तैयार हो रही है। यह स्थिति दुर्भाग्यजनक है। फसलों में डालने के लिए उर्वरक नहीं है। भारत के किसानों को इसके लिए दूसरे देशों पर निर्भर होना पड़ रहा है। यह स्थिति तभी सुधरेगी जब अपने देश में उर्वरक कारखानों की स्थापना हो, सुरक्षित खाद्य भंडारण गृह हों।
बात 11 अक्टूबर 2026 की रात की है। देश के दो स्थानों हरियाणा और पंजाब से दुखद तस्वीर देखने को मिली। हरियाणा के करनाल में बेमौसम बारिश से अनाज मंडी में रखा करोड़ों रुपये की कीमत का धान भीग गया। पंजाब के फाजिल्का की अनाज मंडी में पानी भरने से वहां रखा लाखों क्विंटल अनाज खराब हो गया। बारिश के बाद अनाज मंडी में पानी भर गया था। यह तो चंद उदाहरण हैं। छत्तीसगढ़ में खुले में रखे होने के कारण 40 हजार मैट्रिक टन धान सड़ गया। करोड़ों रुपये की कीमत के धान चूहे खा गये। कमोवेश यही हाल देश के अन्य राज्यों की भी है।
आप हैरत में पड़ जाएंगे कि देश में प्रतिवर्ष हजारों करोड़ रुपये के खाद्यान्न की बरबादी किस कदर हो रही है। दूसरी तरफ कृषि सेक्टर को मजबूत करने की बड़ी-बड़ी बातें हो रही हैं। देश में अब जलवायु संकट पैदा हो चुका है। कहीं सूखा है तो कहीं बाढ़ है। महाराष्ट्र में वर्ष 2026 में 75 प्रतिशत हिस्सा सूखे की चपेट में हैं। वहां रबी की फसल पूरी तरह से चौपट हो चुकी है। राज्य का 82 फीसदी कृषि क्षेत्र वर्षा के जल पर निर्भर है। केवल 18 प्रतिशत हिस्सा सिंचित क्षेत्र है।
छत्तीसगढ़ के बस्तर व अन्य कुछ एक क्षेत्रों में बाढ़ से करोड़ो रुपये की कीमत की फसल बरबाद हो गयी। सब्जी की खेती पूरी तरह से चौपट हो गयी। भारत जैसे देश में जहां किसान अकुशल हैं, परंपरागत खेती करते हैं। वहां सरकार को इस क्षेत्र को भी प्राथमिकता देने की आवश्यकता है।
सरकार अपने तरीके से काम तो कर रही है पर योजनाएं सिर्फ कागजी आंकड़ा पेश करने तक सीमित हैं। धरातल पर आम किसानों तक उसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। देश में कृषि क्षेत्र में इतना पोटेंशियल है कि वहां रोजगार सृजन की असीम संभावना है। देश की जीडीपी, राज्यों की जीएसडीपी बढ़ाने में कृषि क्षेत्र में अपार क्षमता है। केन्द्र और राज्य की सरकार को इस दिशा में विशेष फोकस करने की जरुरत है।
