अहमदाबाद, 10 जून 2026। इस सप्ताह अहमदाबाद के ईकेए एरीना में पहली विश्व योगासन चैंपियनशिप का समापन हुआ। भारत ने 100 से अधिक स्वर्ण पदकों के साथ अपनी बादशाहत कायम रखते हुए यह साबित कर दिया कि अपनी प्राचीन परंपराओं से जुड़े इस खेल में उसका दबदबा कितना मजबूत है। लेकिन पदक तालिका से परे एक और महत्वपूर्ण रुझान भी सामने आया और वह है-मध्य-पूर्व में योगासन को तेजी से मिल रही स्वीकार्यता।
ऐसे क्षेत्र में, जहां अब तक योग को मुख्य रूप से वेलनेस सेंटरों और फिटनेस स्टूडियो तक ही सीमित माना जाता था, वहां ओमान, जॉर्डन, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों की पहली विश्व योगासन चैंपियनशिप में भागीदारी इस बात का संकेत है कि योगासन अब एक प्रतिस्पर्धी खेल के रूप में अपना अलग पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना शुरू कर चुका है।
आंकड़े इस कहानी का एक हिस्सा बताते हैं। ओमान ने 21 पदकों के साथ चैंपियनशिप का समापन किया, जिसमें 8 रजत और 13 कांस्य पदक शामिल थे। इस प्रदर्शन के साथ वह प्रतियोगिता का सबसे सफल खाड़ी देश बनकर उभरा। जॉर्डन ने दो कांस्य पदक जीते, जबकि ईरान और यूएई के खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में महत्वपूर्ण अनुभव प्राप्त हुआ।
हालांकि अधिकारियों और खिलाड़ियों का मानना है कि अहमदाबाद की इस चैंपियनशिप का महत्व केवल पदकों तक सीमित नहीं है।
इस प्रतियोगिता में 78 देशों के 522 खिलाड़ियों ने भाग लिया, जिससे एक ऐसा वैश्विक मंच तैयार हुआ जिसका अनुभव कई उभरते हुए योगासन देशों को पहली बार मिला। जिन देशों में अभी खिलाड़ियों की विकास प्रणाली, कोचिंग संरचना और जमीनी स्तर पर भागीदारी कार्यक्रम विकसित हो रहे हैं, उनके लिए ऐसे आयोजन एक मानक तय करने के साथ-साथ प्रेरक शक्ति का भी काम करते हैं।
ओमान का प्रदर्शन इस बात का उदाहरण है कि खाड़ी क्षेत्र के कुछ हिस्सों में यह खेल कितनी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।
मस्कट के 15 वर्षीय भारतीय मूल के छात्र जय राजेश सोनेजी, जिन्होंने ओमान के लिए दो कांस्य पदक जीते, का मानना है कि इस चैंपियनशिप से मिली वैश्विक पहचान उनके देश में इस खेल के प्रति रुचि को और तेज़ी से बढ़ा सकती है।
सोनेजी ने कहा, “यह बेहद शानदार अनुभव है। मैं अपने प्रदर्शन से बहुत खुश हूं। दो कांस्य पदक जीतना मेरे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है।”
इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि उनके अनुसार इस प्रतियोगिता का प्रभाव केवल अहमदाबाद में हिस्सा लेने वाले खिलाड़ियों तक सीमित नहीं रहेगा।
उन्होंने कहा, यह आयोजन योग के प्रति अधिक जागरूकता पैदा करेगा और ओमान में अधिक लोगों को इस खेल से जुड़ने के लिए प्रेरित करेगा। मुझे उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में यह खेल और अधिक विकसित होगा।
यह आशावाद योगा ओमान की अध्यक्ष सल्हा हकीम भी साझा करती हैं, जो ओमान के 21 पदकों को कई वर्षों के सतत विकास और मेहनत का परिणाम मानती हैं।
उन्होंने कहा, हमें इस उपलब्धि पर बेहद गर्व है। पहली विश्व योगासन चैंपियनशिप में 21 पदक जीतना ओमान के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। यह हमारे खिलाड़ियों, कोचों और पूरी योगा ओमान टीम के समर्पण, अनुशासन और कड़ी मेहनत का प्रतिबिंब है।
ओमान के लिए यह प्रदर्शन एक व्यापक रुझान की भी ओर संकेत करता है। पिछले एक दशक में पूरे खाड़ी क्षेत्र में योग को लगातार बढ़ती स्वीकृति मिली है। इसके पीछे स्वास्थ्य और वेलनेस के प्रति बढ़ती जागरूकता, प्रवासी समुदायों की भूमिका तथा सक्रिय जीवनशैली को बढ़ावा देने वाली सरकारी पहलें प्रमुख कारण रही हैं। अब ऐसा प्रतीत होता है कि प्रतिस्पर्धी योगासन भी इसी मजबूत आधार का लाभ उठा रहा है।
जॉर्डन का अनुभव भी इसी तरह की कहानी बयां करता है। कांस्य पदक विजेता माया अलोस्ताथ का मानना है कि जॉर्डन में योग धीरे-धीरे अपनी सीमित पहचान से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा, जॉर्डन में योग हर साल बढ़ रहा है। अधिक लोग यह समझने लगे हैं कि योगासन केवल लचीलापन या शारीरिक मुद्राओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्म-अन्वेषण, संतुलन और आंतरिक शक्ति का भी माध्यम है।
माया का यह आकलन मध्य-पूर्व के कई देशों में दिखाई दे रहे व्यापक बदलाव को दर्शाता है, जहां नई पीढ़ी तेजी से ऐसी गतिविधियों को अपना रही है जो शारीरिक फिटनेस के साथ मानसिक स्वास्थ्य और संतुलन को भी बढ़ावा देती हैं। माया के लिए विश्व चैंपियनशिप ने यह भी दिखाया कि योग विभिन्न संस्कृतियों के लोगों को एक सूत्र में बांधने की क्षमता रखता है।
उन्होंने कहा, यह चैंपियनशिप केवल पदक जीतने के बारे में नहीं है। यह योग की भावना के माध्यम से दुनिया भर के लोगों को एक साथ लाने का अवसर है। इस चैंपियनशिप का वास्तविक महत्व उन अनुभवों और सीख में निहित है, जिन्हें प्रतिभागी अपने-अपने देशों में लेकर लौटे। जहां ओमान और जॉर्डन जैसे देश पदकों के साथ वापस गए, वहीं अन्य देशों को अंतरराष्ट्रीय स्तर के निर्णायक मानकों, कोचिंग पद्धतियों और प्रतिस्पर्धी ढांचे को करीब से समझने का अवसर मिला।
यदि योगासन को कुछ उत्साही लोगों तक सीमित रहने के बजाय स्थायी राष्ट्रीय कार्यक्रमों के रूप में विकसित होना है, तो इस प्रकार का ज्ञान और अनुभव अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। इस आयोजन ने एक और अहम चीज प्रदान की—वैश्विक दृश्यता।
उभरते हुए योगासन देशों के लिए विश्व चैंपियनशिप में भागीदारी एक ऐसी वैधता और पहचान प्रदान करती है, जो नए खिलाड़ियों, प्रायोजकों, स्कूलों और संस्थागत सहयोग को आकर्षित करने में मदद कर सकती है।
कई प्रतिनिधियों का मानना था कि इस चैंपियनशिप से मिली व्यापक प्रसिद्धि अधिक बच्चों और युवाओं को योगासन को केवल मनोरंजक गतिविधि के रूप में नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय अवसरों वाले एक प्रतिस्पर्धी खेल के रूप में देखने के लिए प्रेरित करेगी।
योगासन जैसे-जैसे वैश्विक स्तर पर व्यापक मान्यता प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, मध्य-पूर्व जैसे क्षेत्र उसके विस्तार में और अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। युवा
आबादी, वेलनेस के प्रति बढ़ती रुचि और खेलों में बढ़ते निवेश का संयोजन ऐसे अनुकूल हालात पैदा कर रहा है, जिन्हें कई विशेषज्ञ भविष्य के विकास के लिए बेहद सकारात्मक मानते हैं।
अहमदाबाद में जीते गए पदक निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धियां थीं। लेकिन पहली विश्व योगासन चैंपियनशिप की सबसे बड़ी विरासत शायद वह आत्मविश्वास है, जो इसने मध्य-पूर्व के उभरते देशों को दिया—यह विश्वास कि वे प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं, प्रतिभाओं को विकसित कर सकते हैं और योगासन के वैश्विक भविष्य का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं।
यदि यह गति और उत्साह आगे भी बना रहा, तो संभव है कि भविष्य में अहमदाबाद को केवल पहली विश्व योगासन चैंपियनशिप के आयोजन स्थल के रूप में ही नहीं, बल्कि उस आयोजन के रूप में भी याद किया जाए जिसने पूरे मध्य-पूर्व में योगासन के उभार को नई रफ्तार दी।
