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आकांक्षा साहू ने हासिल की पीएचडी की उपाधि

आकांक्षा साहू ने नरवा-गरूवा योजना पर किया शोध, हासिल की पीएचडी की उपाधि

रायपुर, 1 मार्च 2026। सुश्री आकांक्षा साहू ने भूपेश बघेल के मुख्यमंत्रित्व काल में छत्तीसगढ़ शासन की महत्वाकांक्षी योजना ‘नरवा, गरूवा, घुरूवा और बाड़ी’ पर शोध किया है। इस शोध पर हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग ने सुश्री आकांक्षा साहू को पीएचडी की उपाधि प्रदान की है। विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित पीएचडी वायवा के बाद उन्हें यह उपाधि औपचारिक रूप से प्रदान की गई।

पीएचडी वायवा में बाह्य परीक्षक के रूप में प्रो. मोहन काशीकर, आरटीएम नागपुर विश्वविद्यालय महाराष्ट्र से शामिल हुए। उन्होंने शोध कार्य की विस्तार से समीक्षा की और इसे ग्रामीण विकास के संदर्भ में महत्वपूर्ण अध्ययन बताया।

आकांक्षा साहू का शोध विषय था छत्तीसगढ़ शासन की नरवा, गरूवा, घुरूवा और बाड़ी योजना का राज्य के ग्रामीण क्षेत्र के सामाजिक एवं आर्थिक विकास में योगदान का एक अध्ययन। यह शोध दुर्ग जिले के विशेष संदर्भ में रहा। इस शोध में दुर्ग जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में योजना के क्रियान्वयन, उसके सामाजिक प्रभाव, आर्थिक सशक्तिकरण तथा ग्रामीण जीवन स्तर में आए बदलावों का विश्लेषण किया गया है।

शोध निर्देशक डॉ. डी.एन. सूर्यवंशी सेवानिवृत्त प्राचार्य, सुराना महाविद्यालय दुर्ग रहे। शोध केंद्र निर्देशक डॉ. प्रमोद यादव, विभागाध्यक्ष राजनीति विज्ञान विभाग, सुराना महाविद्यालय रहे। शोध के दौरान योजनाओं के जमीनी प्रभावों का अध्ययन करने के लिए विभिन्न ग्राम पंचायतों का सर्वेक्षण, हितग्राहियों से संवाद और सरकारी आंकड़ों का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया।

जल संरक्षण (नरवा), पशुपालन संवर्धन (गरूवा), जैविक खाद निर्माण (घुरूवा) और पोषण वाटिका (बाड़ी) जैसे घटकों का समेकित प्रभाव ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने पर शोध में तथ्यात्मक निष्कर्ष प्रस्तुत किए गए हैं।

सुराना महाविद्यालय के प्राचार्य एवं समस्त प्राध्यापकों ने डॉ. आकांक्षा साहू की इस उपलब्धि पर हर्ष व्यक्त करते हुए उन्हें बधाई दी है। परिवार के सदस्यों और मित्रों ने भी शुभकामनाएं प्रेषित कर उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की।

डॉ. आकांक्षा साहू ने अपनी सफलता का श्रेय माता-पिता के आशीर्वाद, परिवार के सहयोग और निरंतर कड़ी मेहनत को दिया। उन्होंने कहा कि ग्रामीण विकास की योजनाओं पर शोध करना उनके लिए एक सामाजिक दायित्व भी था, ताकि नीति और क्रियान्वयन के बीच की दूरी को समझा जा सके।