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पीएम मोदी ने बस्तर में सुरक्षाबलों के साथ मनाई दीवाली

Ramesh Pandey
By Ramesh Pandey On नवम्बर 8, 2026
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पीएम मोदी ने बस्तर में सुरक्षाबलों के साथ मनाई दीवाली

रायपुर, 8 नवंबर 2026। नक्सलवाद के खात्मे के बाद पहली बार छत्तीसगढ़ की दीवाली ऐतिहासिक रही। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अचानक बस्तर पहुंचकर सुरक्षाबल के जवानों के साथ दीवानी मनाने की जानकारी दी तो सभी अचंभित हो उठे। बस्तरवासियों के लिए यह पहला मौका था जब उन लोगों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ दीवाली मनाई।

यह कार्यक्रम अचानक जानकारी में तब आया जब 8 नवंबर की सुबह करीब साढ़े 10 बजे पीआईबी कार्यालय ने जानकारी सार्वजनिक की। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर लिखा-

“मैं अपने वीर सुरक्षाबलों के साथ दीपावली मनाने के लिए बस्तर जा रहा हूं। यह वह क्षेत्र है, जहां कभी नक्सलवाद का प्रभाव था और अब विकास फल-फूल रहा है। मैं अपने वीर सुरक्षाकर्मियों के बलिदान, निःस्वार्थ सेवा और राष्ट्र के प्रति अटूट समर्पण को नमन करने जा रहा हूं। दीपावली के पावन अवसर पर बस्तर जा रहा हूं। कल तक जहां नक्सलियों का कहर था वहां आज विकास की बहार है। वीर जवानों, उनके बलिदान, त्याग और तपस्या को नमन करने जा रहा हूं।”

अपने कार्यक्रम के अनुसार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बस्तर पहुंचे और जवानों साथ दीवाली मनाई। सुरक्षा बलों के साहस को प्रधानमंत्री मोदी ने केवल सलाम किया बल्कि उनके साथ झूमकर, उन्हें मिठाई खिलाकर, भारत माता की जय के जयकारे लगाकर हौसला बढ़ाया।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन मेें कहा, माओवादी आतंक-नक्सलवाद के खिलाफ ये लड़ाई आसान नहीं थी। एक समय था, जब देश के करीब 20 राज्यों में 230 से ज्यादा जिले नक्सलवाद की चपेट में थे, नक्सलवाद से प्रभावित थे। शाम होने के बाद यहां जीवन ठहर जाता था, घरों से बाहर निकलना नामुमकिन हो जाता था। लोगों से उनका वोट डालने का अधिकार भी इन नक्सलियों ने छीन लिया था।

बिहार, महाराष्ट्र, ओडिशा, यूपी, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा वामपंथी उग्रवाद की चपेट में था। हजारों गाँव, करोड़ों की आबादी, एक साल में दो-दो हजार तक नक्सली हमले, एक साल में दो हजार हमले। आप याद करिए, 2010 में, यहीं पास ही दंतेवाड़ा में नक्सलियों से मुठभेड़ में CRPF के हमारे 76 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए। 2010 में ही, दंतेवाड़ा में ही एक और घटना में 44 निर्दोष नागरिकों की हत्या हुई थी। ये धरती हमारे वीरों के रक्त से अभिषिक्त हो गई थी।

लेकिन, महलों में रहने वाले किसी भी नामदार की सिसकी नहीं सुनाई दी। किसी भी महलों में रहने वाले नामदार की आंखों से एक बिंदु भी नहीं निकला था। आए दिन कहीं न कहीं ऐसे हमले होते रहते थे। दशकों तक ये सिलसिला चलता रहा, इस दौरान छत्तीसगढ़ में ही एक हजार से ज्यादा जवानों का बलिदान हुआ। IED के विस्फोटों में कितने ही जवानों को अपने हाथ-पैर गँवाने पड़े।

आप 2004 से 2013 तक के आंकड़ें देखेंगे, तो हर साल जितने नक्सली मारे जाते थे, उससे ज्यादा संख्या में हमारे वीर जवान शहीद होते थे। नक्सली संगठनों के मुखिया इसे अपनी जीत समझते थे, जश्न मनाते थे। और दुर्भाग्य से तब की सरकारों द्वारा नक्सलवाद को लाइलाज बीमारी समझकर छोड़ दिया गया था। मेरे आदिवासी परिवारों को, उनके नसीब पर जीने के लिए छोड़ दिया गया था। और इसे स्वीकार कर लिया गया था कि ये तो बस ऐसे ही चलता रहेगा, गोलियां चलेगी, जवान मरेंगे, नागरिक पीटेंगे।

हम एक बहुत बड़े लक्ष्य को लेकर चल रहे थे। हमारा लक्ष्य था- किसी माँ की गोद सूनी न हो, कोई परिवार तबाही के भंवर में न फंसे, कोई बच्चा हथियार उठाकर हिंसा की राह पर न निकले, किसी युवा का भविष्य बर्बाद ना हो। इसलिए, जब तक ये लक्ष्य पूरा नहीं हो गया, हम संकल्प के साथ लगातार लगे रहे। कोई प्रचार-प्रसार नहीं, कोई दिखावा नहीं, हमने संवेदनशीलता के साथ काम करते हुए माओवादी आतंक की कमर तोड़ दी।

हमने सेवा भाव से नक्सल प्रभावित इलाकों में लोगों के जीवन को बदला। इसलिए, नक्सलवाद से पीड़ित लोग भी सरकार और सुरक्षाबलों के साथ मजबूती से खड़े हुये। आज यहां भी ऐसे नागरिक उपस्थित हैं, जिन्होंने इस बड़ी लड़ाई को जीतने में बहुत सहयोग किया है। मैं उन सबका भी आभार व्यक्त करता हूं।

नक्सली खत्म हुए हैं, लेकिन खतरा अभी टला नहीं

इन सफलताओं के बीच हमें एक और बात याद रखनी है, नक्सली खत्म हुए हैं, लेकिन खतरा अभी टला नहीं है। जंगलों से हथियारी नक्सली तो मिट गए, लेकिन दिमागी नक्सलियों ने कई संगठनों पर कब्जा कर रखा है। ये आज भी देश के संविधान और लोकतंत्र के खिलाफ लोगों को उकसा रहे हैं। कई राजनीतिक दलों में, अलग-अलग संगठनों में भी इन दिमागी नक्सलियों ने अपनी घुसपैठ कर ली है। हमें इन्हें पहचानना है, इन्हें परास्त करना है और देश को सुरक्षित करना है।

आज की उपलब्धियां हमें प्रेरणा देती हैं, लेकिन ये विराम नहीं हैं। मैं फिर कहता हूं, ये विराम नहीं है। ये जीत, ये सफलताएँ, ये मंच हैं नई उड़ान का, ये उड़ान राष्ट्र के उन सपनों की होगी, जिन्हें सदियों से हमारी पीढ़ियों ने देखा है। ये सपने उन सेनानियों के होंगे, जिन्होंने आज़ादी के लिए अनगिनत बलिदान दिये। ये सपने उन शूरवीर सैनिकों के होंगे, जिन्होंने सीमाओं पर माँ भारती के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग दिया।

ये सपने, उन वीर जवानों के होंगे, जिन्होंने नक्सलवाद और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अपनी जिंदगी न्योछावर कर दी। आप हर दिन इस भाव के साथ जीते हैं- तेरा गौरव अमर रहे माँ, तेरा गौरव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहें, तेरा गौरव अमर रहे माँ। अब समय है, आपका ये भाव नए विश्वास में बदले, अब समय राष्ट्र के लिए जीने का है, राष्ट्र को नई ऊंचाई पर पहुंचाने का है।

Ramesh Pandey

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रमेश पांडेय (Ramesh Pandey) एक अनुभवी पत्रकार हैं, जिन्हें डिजिटल मीडिया और क्षेत्रीय समाचार रिपोर्टिंग में 20 वर्षों का अनुभव है।