नई दिल्ली, 7 नवंबर 2026। भारत रत्न लालकृष्ण आडवाणी 8 नवंबर 2027 को अपने जीवन का 100वां जन्मदिन मनाएंगे। ऐसा अवसर सौभाग्शाली लोगों को ही मिलता है। भारतीय राजनीति में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जो किसी दल तक सीमित नहीं रहते बल्कि एक युग के प्रतीक बन जाते हैं। लालकृष्ण आडवाणी उन्हीं में से एक हैं। जनसंघ के शुरुआती दिनों से लेकर भारतीय जनता पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने तक आडवाणी ने न सिर्फ पार्टी को वैचारिक दिशा दी बल्कि उसे जनाधार भी दिया।
कभी ‘लौह पुरुष’ कहे गए, तो कभी पार्टी का चेहरा लेकिन भाजपा के कार्यकर्ताओं के लिए वे हमेशा ‘भीष्म पितामह’ रहे। 8 नवंबर 1927 को सिंध प्रांत (आज का पाकिस्तान) में जन्मे लालकृष्ण आडवाणी ने भारत विभाजन के बाद देश सेवा को अपना कर्मक्षेत्र चुना और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माध्यम से राष्ट्र सेवा की राह पकड़ी।
भले ही वे 1947 में देश के आजाद होने का जश्न भी नहीं मना सके। इसके पीछे की वजह यह थी कि उन्हें आजादी के महज कुछ घंटों में ही अपने घर को छोड़कर भारत रवाना होना पड़ा था। उस समय वह महज 14 साल के थे, उसी समय उन्होंने अपना जीवन हिंदुस्तान के नाम कर दिया। उन्होंने जनसंघ के माध्यम से सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। 1990 की ऐतिहासिक राम रथयात्रा ने उन्हें जननेता के रूप में स्थापित किया। देश के भीतर बदलते राजनीतिक हालात और वैचारिक संघर्षों के बीच आडवाणी का मुखर होना भाजपा के विस्तार से जुड़ता चला गया।
वरिष्ठ भाजपा नेता और देश के पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी को 31 मार्च 2024 को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 4 फरवरी 2024 को उन्हें भारत रत्न देने की घोषणा की थी। खराब स्वास्थ्य के चलते राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उनके आवास पर जाकर उन्हें यह सम्मान प्रदान किया था।

