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आपातकाल के 50 वर्ष: इतिहास में दर्ज है प्रतापगढ़ का आंदोलन, धर्माचार्य ओम प्रकाश पांडेय ने सुनाई जयप्रकाश आंदोलन की स्मृतियां

आपातकाल के 50 वर्ष: इतिहास में दर्ज है प्रतापगढ़ का आंदोलन, धर्माचार्य ओम प्रकाश पांडेय ने सुनाई जयप्रकाश आंदोलन की स्मृतियां

प्रतापगढ़, 24 जून 2025। भारत के इतिहास में आपातकाल (1975-1977) एक ऐसा काला अध्याय है, जिसने लोकतंत्र की नींव को हिलाने का प्रयास किया। आज, जब इस घटना को 50 वर्ष पूरे हो चुके हैं, नई पीढ़ी उस दौर की सच्चाई और संघर्ष की कहानियों को जानना चाहती है। प्रतापगढ़ के धर्माचार्य ओम प्रकाश पांडेय अनिरुद्ध रामानुज दास, जो उस समय बीए के छात्र थे और जयप्रकाश नारायण (जेपी) आंदोलन में सक्रिय थे, ने आपातकाल के अपने अनुभव साझा किए। उनकी स्मृतियों में वह दौर जीवंत हो उठता है, जब देश का नौजवान तानाशाही के खिलाफ सड़कों पर उतरा था।

जेपी आंदोलन की शुरुआत और संपूर्ण क्रांति का नारा

1970 के दशक में देश में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और आर्थिक संकट ने जनता को आक्रोशित कर दिया था। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने बिहार से शुरू हुए आंदोलन को राष्ट्रीय स्वरूप दिया। ओम प्रकाश पांडेय बताते हैं कि जेपी जब प्रयागराज आए, तो पत्रकारों ने उनसे पूछा, संपूर्ण क्रांति क्या है? जेपी ने जवाब दिया, यह लोहिया की सप्त क्रांति का विस्तार है, जिसका लक्ष्य देश में आमूल-चूल परिवर्तन है। इस नारे ने देश के युवाओं में जोश भर दिया। प्रतापगढ़ में भी सभी राजनीतिक दलों ने भेदभाव भुलाकर जन संघर्ष समिति का गठन किया, जिसके संयोजक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित सूर्यबली पांडेय को बनाया गया।

छात्रों ने भी आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। गनेशी लाल धर्मशाला में हुए चुनाव में ओम प्रकाश पांडेय को सर्वसम्मति से छात्र संघर्ष समिति का संयोजक चुना गया। आंदोलन जोर पकड़ रहा था। इसी दौरान सरला भदोरिया, कमांडर अर्जुन सिंह भदोरिया की पत्नी, बनारस से प्रतापगढ़ आईं। उनके स्वागत के लिए ओम प्रकाश और अरुण पांडे रिक्शे से प्रचार कर रहे थे, तभी कोतवाली के दरोगा के.एन. सिंह ने धारा 144 का हवाला देकर ओम प्रकाश को गिरफ्तार कर लिया। यह उनकी पहली गिरफ्तारी थी। स्थानीय नेता राजपति मिश्रा बाबा के हस्तक्षेप और जनदबाव के बाद उन्हें छोड़ दिया गया।

आंदोलन का चरम और गिरफ्तारिया

आंदोलन के दौरान प्रतापगढ़ में कई घटनाएं घटीं। एक दिन काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस से कमलापति त्रिपाठी के आने पर छात्रों ने काला झंडा दिखाया, जिसके बाद ओम प्रकाश सहित कई नेताओं को गिरफ्तार किया गया। हादी हाल के सामने तत्कालीन डीएम शहीदुल्ला की पत्नी का सरकारी गाड़ी से बैडमिंटन खेलने आने पर छात्रों ने घेराव किया। कप्तान के आश्वासन के बाद मामला शांत हुआ।

सरकार ने गेहूं और अन्य फसलों पर लेवी वसूली शुरू की, जिसका जन संघर्ष समिति ने विरोध किया। पंडित सूर्यबली पांडेय के नेतृत्व में सैकड़ों लोगों ने गिरफ्तारी दी। ओम प्रकाश और मास्टर रमाशंकर सिंह भी इसमें शामिल थे, लेकिन उन्हें विश्वनाथगंज के पास छोड़ दिया गया। अगले दिन कोहंडौर भेजे गए, फिर एसडीएम हसनैन रजा की कुर्सी पर अशोक पांडेय को बैठाकर प्रतीकात्मक विरोध किया गया, जिसके बाद जेल भेजा गया।

आपातकाल की घोषणा और दमन

18 मार्च 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में राजनारायण द्वारा इंदिरा गांधी के खिलाफ दायर याचिका का मुकदमा चल रहा था। 12 जून को जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसमें इंदिरा गांधी की सांसद सदस्यता रद्द कर दी गई। इस फैसले ने सरकार को हिला दिया। 25-26 जून 1975 की रात इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर दी।

प्रतापगढ़ में भी दमन चरम पर था। 26 जून की रात सर्वोदय भवन में बैठक हुई, जिसमें पंडित सूर्यबली पांडेय ने आंदोलन को तेज करने का आह्वान किया। रात में ही रामसेवक त्रिपाठी को गिरफ्तार कर लिया गया। विद्या शंकर पांडेय, कृपा शंकर ओझा, और सूर्यबली पांडेय सहित कई नेता मीसा और डीआईआर के तहत जेल भेजे गए। ओम प्रकाश और मास्टर रमाशंकर सिंह भूमिगत होकर आंदोलन चलाते रहे।

भूमिगत आंदोलन और जनसमर्थन

भूमिगत रहते हुए ओम प्रकाश ने गांव-गांव जाकर लोगों को संगठित किया। एक बार गजराही में गणेश मिश्रा से मिलने गए, लेकिन वह इलाहाबाद में थे। बरसात की अंधेरी रात में धनसारी गांव तक पैदल गए, जहां रास्ते में सांप और पानी भरे गड्ढों का सामना करना पड़ा। मास्टर रमाशंकर सिंह ने हौसला बढ़ाया। पत्रकार मयन बहादुर सिंह और रविंद्र सनातन ने भी आंदोलनकारियों की मदद की।

एक बार मयन बहादुर सिंह के घर कोतवाल शिवनंदन सिंह छापा मारने पहुंचे, लेकिन ओम प्रकाश और रमाशंकर वहां से निकल चुके थे। स्थानीय लोगों का समर्थन आंदोलन की रीढ़ था। साप्ताहिक अखबार लोक मित्र को भी सरकारी दबाव में बंद कर दिया गया।

व्यक्तिगत बलिदान और पारिवारिक संकट

आंदोलन के दौरान ओम प्रकाश के परिवार पर भी संकट आया। उनके गांव के घर में डकैती पड़ी, जिसमें बहनों और पत्नी के आभूषण लूट लिए गए। मां शारदा देवी पांडेय ने पुलिस से कहा, मेरी दुश्मन इंदिरा गांधी है, क्या उसे गिरफ्तार कर सकते हो? डकैती का मामला आज तक अनसुलझा है। छोटी बहन का गवना होने वाला था, जिसके लिए मां ने पिताजी से अलीगढ़ जेल में जाकर पेरोल के कागज पर दस्तखत करवाए। पिताजी ने पहले मना किया, लेकिन मां के आग्रह पर मान गए।

आपातकाल का अंत और सबक

1977 में आपातकाल हटा और जनता पार्टी की सरकार बनी। पंडित सूर्यबली पांडेय को लोकसभा का टिकट आफर हुआ, लेकिन उन्होंने विनोबा भावे के विचारों का हवाला देकर चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया। रूपनाथ सिंह यादव ने चुनाव जीता।

धर्माचार्य ओम प्रकाश पांडेय कहते हैं, आपातकाल लोकतंत्र पर कलंक है। यह दौर हमें सिखाता है कि स्वतंत्रता और लोकतंत्र को कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए। उनकी स्मृतियां नई पीढ़ी को प्रेरित करती हैं कि तानाशाही के खिलाफ एकजुटता और बलिदान कितने महत्वपूर्ण हैं। प्रतापगढ़ का यह आंदोलन उस दौर की एक छोटी, लेकिन सशक्त गाथा है, जो देश के लोकतांत्रिक इतिहास का अभिन्न हिस्सा है।