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बस्तर के नक्सल पीड़ितों ने किया इंडिया गठबंधन के उपराष्ट्रपति पद प्रत्याशी का विरोध

बस्तर के नक्सल पीड़ितों ने किया इंडिया गठबंधन के उपराष्ट्रपति प्रत्याशी का विरोध

नई दिल्ली, 30 अगस्त 2025। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र से कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया, नई दिल्ली पहुंचे नक्सल हिंसा के पीड़ितों ने एक मार्मिक प्रेस वार्ता आयोजित कर अपनी पीड़ा और आक्रोश देश के सामने रखा। बस्तर शांति समिति के बैनर तले आयोजित इस प्रेस वार्ता में पीड़ितों ने इंडिया गठबंधन के उपराष्ट्रपति पद के प्रत्याशी बी. सुरेंद्रन रेड्डी की उम्मीदवारी का कड़ा विरोध किया और सभी सांसदों से अपील की कि वे उन्हें समर्थन न दें। पीड़ितों ने रेड्डी पर आरोप लगाया कि उनके एक फैसले ने बस्तर में नक्सलवाद को बढ़ावा दिया, जिसके परिणामस्वरूप हजारों परिवारों का जीवन तबाह हो गया।

बस्तर शांति समिति के प्रतिनिधियों ने बताया कि सलवा जुडूम, जो नक्सलवाद के खिलाफ आदिवासियों का एक शक्तिशाली जनांदोलन था, ने नक्सल संगठनों को कमजोर कर दिया था। यह आंदोलन नक्सलियों को लगभग खत्म करने की कगार पर ले आया था। लेकिन 2011 में तत्कालीन सुप्रीम कोर्ट जज बी. सुरेंद्रन रेड्डी के नेतृत्व में सलवा जुडूम पर प्रतिबंध लगा दिया गया। पीड़ितों का कहना है कि यह फैसला दिल्ली से लिया गया, बिना बस्तर के लोगों की स्थिति और उनकी जरूरतों को समझे। इस निर्णय ने माओवादियों को फिर से संगठित होने का मौका दिया, जिसका दंश बस्तर के लोग आज तक भुगत रहे हैं।

प्रेस वार्ता में बस्तर के सियाराम रामटेके ने अपनी आपबीती साझा करते हुए कहा कि वे एक साधारण किसान थे, जब माओवादियों ने उन पर तीन गोलियां चलाईं और पत्थरों से हमला कर उन्हें मृत समझकर छोड़ दिया। आज वे एक दिव्यांग की जिंदगी जी रहे हैं। सियाराम ने गुस्से और दर्द के साथ कहा कि यदि सलवा जुडूम पर प्रतिबंध न लगता, तो शायद उनकी यह हालत न होती। रेड्डी की उपराष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी की खबर ने उन्हें गहरा आघात पहुंचाया।

बस्तर के ही केदारनाथ कश्यप ने बताया कि सलवा जुडूम बंद होने के बाद माओवादियों ने उनके भाई, एक पुलिस कांस्टेबल, की क्रूरता से हत्या कर दी। नक्सलियों ने उनके भाई का पेट चीरकर आंतें निकाल दी थीं। केदारनाथ का मानना है कि यदि 2011 का वह फैसला न हुआ होता, तो 2014 तक बस्तर से नक्सली भाग चुके होते और उनके भाई की जान बच सकती थी।

शहीद जवान मोहन उर्क़े की विधवा पत्नी आरती ने आंसुओं के साथ अपनी कहानी सुनाई। उन्होंने बताया कि सलवा जुडूम पर प्रतिबंध के बाद माओवादियों ने उनके पति को पशुवत तरीके से मार डाला। उस समय उनकी गोद में तीन महीने का बच्चा था, जो आज 10 साल की बेटी है और कभी अपने पिता को नहीं देख सकी। आरती और उनकी बेटी ने इस प्रेस वार्ता में देश से गुहार लगाई कि उनकी पीड़ा को समझा जाए।

गीदमबाज हमले के पीड़ित महादेव दूसी ने टूटी-फूटी हिंदी और गोंडी में अपनी बात रखी। 2010 में दंतेवाड़ा में माओवादियों ने एक यात्री बस को निशाना बनाया, जिसमें 32 लोग मारे गए। इस हमले में महादेव ने अपना एक पैर खो दिया और आज अपाहिज जीवन जी रहे हैं। उन्होंने बताया कि सलवा जुडूम की समाप्ति ने नक्सलियों को और हिंसक बना दिया।

बस्तर शांति समिति के जयराम ने प्रेस वार्ता के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा कि ये पीड़ित अपनी पीड़ा और दुख लेकर दिल्ली आए हैं। वे चाहते हैं कि सांसद ऐसे किसी व्यक्ति का समर्थन न करें, जिसके फैसले ने बस्तर को दर्द और तबाही दी। समिति की बीमका राम वायके ने बताया कि पीड़ितों ने सभी सांसदों को पत्र लिखकर बी. सुरेंद्रन रेड्डी का समर्थन न करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि सलवा जुडूम पर प्रतिबंध के बाद से बस्तर के हजारों परिवार माओवादी आतंक का शिकार हो रहे हैं। रेड्डी की उम्मीदवारी ने इन परिवारों को गहरा आघात पहुंचाया है।